प्रधान संपादक की कलम से

ऐसे वक्त में जब हर पक्ष के साथ संतुलन बनाकर चलना मुश्किल दिखता है, यह समानता इस बात को रेखांकित करती है कि बंटी हुई दुनिया में भारत एक पुल की भूमिका निभा सकता है.

1 अप्रैल 2026 अंक
1 अप्रैल 2026 अंक

- अरुण पुरी

अगर कोई सिर्फ बमों के वजन और मिसाइलों की मारक दूरी नापे तो युद्ध के दौर में किसी कॉन्क्लेव का होना बेकार की कवायद लग सकता है. लेकिन जो लोग विचारों की ताकत समझते हैं वे जानते हैं कि हर चीज की शुरुआत वहीं से होती है. युद्ध और शांति दोनों की. टकराव पहले सोच और शब्दों में जन्म लेते हैं. और अगर उन्हें समझदारी से दिशा दी जाए तो वही संवाद का रास्ता भी बन सकते हैं.

जब हमने इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 की थीम 'ब्रेकथ्रू ऐंड ब्रेकडाउंस' रखी, तब हमारे सामने दुनिया के बड़े रुझान थे. पहला हिस्सा साफ दिख रहा था: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) ने इंसानियत को एक नए दायरे में पहुंचा दिया है. दूसरा हिस्सा, ब्रेकडाउंस, दुनिया की बिगड़ती जियोपॉलिटिक्स को दिखाने के लिए था. हमें तब अंदाजा न था कि कॉन्क्लेव से ठीक पहले डोनाल्ड ट्रंप इस पहलू को इतनी साफ और ठोस तरह से सामने ले आएंगे.

जैसे-जैसे घटनाएं आगे बढ़ीं, युद्ध का साया गहराता गया. इस अंक में दर्ज हमारे मेहमानों ने हर बात उस समय कही, जब पश्चिम एशिया में मिसाइलें और ड्रोन उड़ रहे थे और दुनिया ऊर्जा संकट की तरफ जा रही थी. ऐसे तनाव भरे माहौल में यह कॉन्क्लेव बड़े मंच में बदल गया, जहां देश-दुनिया की नामचीन हस्तियों ने युद्ध और कूटनीति, व्यापार और कारोबार और टेक्नोलॉजी की बदलती सरहदों पर अपने अलग-अलग विचार और नजरिए रखे.

भारत में अमेरिका के राजदूत सार्जियो गोर ने ऐसी बात कही, जिसकी गूंज युद्ध में शामिल कई बड़े पक्षों के सुर से मिलती दिखी: भारत से दोस्ती. उन्होंने इसे सिर्फ मौजूदा टकराव तक सीमित नहीं रखा, बल्कि टेक्नोलॉजी में लंबे वक्त की साझेदारी के बड़े फ्रेम में देखा, जिसे भारत और अमेरिका मिलकर आकार दे सकते हैं.

गोर ने कहा, ''अमेरिका-भारत रिश्तों में हम टूटन नहीं, नई कामयाबियां देख रहे हैं.'' उन्होंने आने वाले दौर की 'पैक्स सिलिका' की बात की. यानी सिलिकॉन इकोसिस्टम को रणनीतिक तरीके से साथ लाने की ऐसी कोशिश, जिसमें अमेरिका के सबसे भरोसेमंद शुरुआती साझेदारों में भारत होगा. उनका इशारा था कि यही सोच हाल में हुई ट्रेड डील को भी सहारा देगी.

दिलचस्प यह रहा कि इज्राएल और ईरान के राजनयिकों ने भी अपने-अपने सत्र में भारत के साथ रिश्तों पर लगभग एक जैसी बात की. इज्राएल के राजदूत रूवेन अजार ने भारत के साथ 'खास रणनीतिक साझेदारी' की बात कही और भारत के बहुपक्षीय रुख को 'वाजिब और अलग पहचान वाला' बताया. वहीं ईरान के मोहम्मद फतह अली ने भी कहा कि होर्मुज जल संधि पर भारत को जो छूट अब भी मिल रही है, वह 'पुरानी दोस्ती और साझा हितों' का संकेत है. ऐसे वक्त में जब हर पक्ष के साथ संतुलन बनाकर चलना मुश्किल दिखता है, यह समानता इस बात को रेखांकित करती है कि बंटी हुई दुनिया में भारत एक पुल की भूमिका निभा सकता है.

लोगों का काफी ध्यान उन नाटकीय पलों पर गया, जो ट्रंप की करीबी लॉरा लूमर ने मंच पर दिए. उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति का संदेश पढ़कर सुनाया: ''मैं भारत से प्यार करता हूं. मैं मोदी से प्यार करता हूं, और मैं भारतीय लोगों से प्यार करता हूं.'' मौके के हिसाब से उन्होंने भारत पर सीधा हमला करने का सुर कुछ हल्का रखा. उनकी आपत्ति सिर्फ एच-1बी वीजा पर दिखी. लेकिन माहौल और गरमा गया, जब उनके इस्लामोफोबिया पर उनसे सीधा सवाल किया गया. दूसरी तरफ, ईरान के सुप्रीम लीडर के प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल माजिद हकीम इलाही पर उतना ध्यान नहीं गया.

शांत और संयमित अंदाज में बोलने वाले इलाही को उस वक्त जोरदार तालियां मिलीं, जब उन्होंने आयतुल्ला खामेनेई के भारत से रिश्ते, यहां के सेकुलर ढांचे के प्रति सम्मान और महात्मा गांधी के लिए उनकी गहरी प्रशंसा का जिक्र किया. उधर, यूरोपीय प्रतिनिधियों की बातों में एक ऐसे महाद्वीप की झलक दिखी, जो तेजी से बदलती दुनिया के बीच अपनी रणनीति को लेकर गहरे मंथन में है.

दुनिया की जियोपॉलिटिकल उथल-पुथल ने दिग्गज उद्यमियों की बातों को और ज्यादा जरूरी बना दिया. वैश्विक ऊर्जा असुरक्षा का जिक्र करते हुए वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने संसाधनों के राष्ट्रवाद की वकालत की. उनका कहना था कि भारत संसाधनों की कमी से नहीं, इरादों की कमी से पीछे है. ऊर्जा, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन, ये सभी खाड़ी क्षेत्र के संकट के केंद्र में हैं. यही करण अदाणी के कारोबार की भी बुनियाद हैं. ऐसे में अदाणी पोर्ट्स ऐंड एसईजेड लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर के तौर पर उन्होंने सीधी लेकिन अहम बात कही: ''किसी भी देश के लिए अपना इन्फ्रास्ट्रक्चर होना बेहद जरूरी है, ताकि उसकी सप्लाइ चेन स्थिर रहे.''

एआइ पर भी काफी गहरी और दिलचस्प चर्चा हुई. इसमें उत्साह भी था और डर भी. जैसा मैंने अपने स्वागत भाषण में कहा, ''एआइ आग की तरह है. उसमें आपका खाना पकाने की भी कुव्वत है और घर जला देने की भी.'' हार्वर्ड बिजनेस स्कूल की प्रोफेसर क्रिस्टीना एम. वॉलेस ने कहा कि जिन लोगों की रुचियां ज्यादा विविध होती हैं, वे उस दुनिया में बेहतर ढंग से खुद को ढाल सकते हैं, जो 'हर हफ्ते बदल रही है.' ओपनएक्सओ और सिंगुलैरिटी यूनिवर्सिटी के संस्थापक सलीम इस्माइल ने इसी अनुकूलन की बात संस्थाओं के स्तर पर रखी. उनका कहना था कि बदलावकारी टेक्नोलॉजी को पहले किनारों पर अपनाना चाहिए, ताकि सिस्टम के 'इम्यून रिस्पॉन्स' से बचा जा सके.

उन्होंने ऐपल की मिसाल दी. युद्ध से लेकर सर्जरी तक, कई शानदार प्रस्तुतियों ने दिखाया कि टेक्नोलॉजी किस तरह पूरे-पूरे क्षेत्रों को बदल रही है. सिग्नल फाउंडेशन की प्रेसिडेंट मेरिडित व्हिटेकर, जो टेक्नोलॉजी के खतरनाक पहलुओं पर खुलकर बोलती रही हैं, उन्होंने एजेंटिक एआइ से साइबर सिक्योरिटी पर मंडराते खतरे को लेकर चेतावनी दी. 

दूसरे सत्रों में भी दक्षिण भारत की चुनावी लड़ाई से लेकर दुबई के रियल एस्टेट बाजार की मजबूती तक और अनिश्चित करेंसी माहौल में सोने की अहमियत तक, विभिन्न मुद्दों पर बातचीत हुई. सिनेमा की दुनिया की नुमाइंदगी करते अनिल कपूर अपने लंबे करिअर को लेकर बेहद विनम्र अंदाज में दिखे. अक्षय कुमार ने कॉमेडी की कला पर गंभीरता से बात की और उसे ऐक्टिंग की 'सबसे मुश्किल विधा' बताया. खेल की दुनिया से उभरते क्रिकेट सितारे संजू सैमसन और अभिषेक शर्मा ने उस कठिन मेहनत को याद किया, जिसने उन्हें वर्ल्ड कप की कामयाबी तक पहुंचाया.

मिसाइलों की उड़ान कभी भी अपने आप शांति की तरफ नहीं मुड़ती. संतुलन वापस लाने के लिए टूटन और उथल-पुथल के दौर में विचारों का आदान-प्रदान कोई अतिरिक्त चीज नहीं, बल्कि बुनियादी जरूरत है. यह अंक शांति के उन दुर्लभ लेकिन जरूरी हथियारों का संकलन है: विचार और संवाद.

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