हर मौसम में फबता सूबेदार

अनिल कपूर ने कहा, "नया जानने की चाहत बनाए रखें. मैं अच्छा श्रोता हूं और उन लोगों को ध्यान से सुनता हूं जो कहीं ज्यादा समझदार, कहीं ज्यादा अक्लमंद हैं.’’

CINEMA: The Ageless Rebel Rewriting the Rules of Stardom
अनिल कपूर

अनिल कपूर, अभिनेता

अनिल कपूर 70 के करीब पहुंच रहे हैं, लेकिन उनके स्टारडम में कोई कमी आती नहीं दिखती. उन्हें मुख्य भूमिकाएं लगातार मिल रही हैं; सबसे ताजातरीन है सूबेदार, जिसमें उनके खामोश और नाराज शख्स के किरदार ने खासा ध्यान खींचा.

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में उन्होंने कहा कि लंबे वक्त तक टिके रहने का राज स्पष्टता है. उन्होंने कहा, ''मैं अपनी जिंदगी में कभी किसी गलतफहमी में नहीं रहा... मैं वही रोल करता हूं जो मेरी उम्र पर फबते हैं.’’ उन्होंने कहा कि इसका दूसरा पहलू ज्यादा मुश्किल है:

बेहतर है कि ऐसे सवाल पूछे जाएं, ''आप पिता के रोल क्यों कर रहे हैं? आप हीरो से ज्यादा जवान दिखते हैं’’, बजाय इसके कि दर्शक कहें, ''क्या कर रहे हो? अपनी उम्र तो देखो.’’ लेकिन आज भी उनमें जवानी वाली चमक कैसे बरकरार है? इसका राज है जिम में अपने से कम उम्र के साथियों को कड़ी टक्कर देना.

लंबे वक्त तक टिके रहने के लिए खुद को नए सिरे से गढ़ना जरूरी है, लेकिन इतना ही जरूरी अपनी कला को विकसित करना भी है, फिर भले ही आपने दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, कई सारे फिल्मफेयर अवार्ड जीत लिए हों और स्लमडॉग मिलियनेयर की ऑस्कर और स्क्रीन ऐक्टर्स गिल्ड अवार्ड जीतने वाली टीम का हिस्सा रहे हों. कपूर का तरीका सीधा-सादा है:

नया जानने की चाहत बनाए रखें. उन्होंने कहा, ''मैं अच्छा श्रोता हूं और उन लोगों को ध्यान से सुनता हूं जो कहीं ज्यादा समझदार, कहीं ज्यादा अक्लमंद हैं.’’ वे फिल्में देखते हैं, यात्राएं करते हैं, और युवा निर्देशकों के साथ काम करते हैं. दोहराव से बचना उनकी फितरत है. उन्होंने कहा, ''हमेशा सोच-समझकर तय करता हूं कि कुछ नया करना है...मैं नाकाम होने के लिए तैयार हूं.’’ वे स्वीकार करते हैं कि कुछ जोखिमों के नतीजे फौरन सामने नहीं आते, लेकिन वे ''वक्त की कसौटी पर जरूर खरे उतरेंगे.’’

इसी फितरत ने उनके चार दशक लंबे करिअर को गढ़ा, जो फॉमूर्लों के बजाय फिल्मकारों और कहानियों की बुनियाद पर बना है. कई पीढ़ियों के फिल्मकारों के साथ काम करने का अनुभव याद करते हुए उन्होंने कहा, ''मेरे लिए फिल्ममेकर और अच्छी कहानी की समझ हमेशा अहम रही है.’’ शुरुआत में कपूर ने खुद अपनी कामयाबी का रास्ता गढ़ा.

उस दौर में जब हीरो क्लीन-शेव्ड हुआ करते थे, उन्होंने मूंछ और हल्की दाढ़ी रखने का फैसला किया ताकि उन किरदारों के हिसाब से ज्यादा उम्र के लग सकें जिन्हें देने से उन्हें इनकार किया जा रहा था. यही लुक उनकी पहचान बन गया. उन्होंने कहा, ''यह हल्की दाढ़ी तो मेरी पहचान का हिस्सा बन गई... लेकिन मूंछ—कोई भी उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं था. वे कहते थे कि मूंछ वाला कोई भी बड़ा स्टार नहीं बन सकता.’’ उन्होंने उन्हें गलत साबित कर दिया.

इसी खुलेपन के चलते उन्होंने स्लमडॉग मिलियनेयर में काम करने का फैसला किया. कपूर ने कोई फीस लिए बिना हामी भर दी. इस फिल्म से उन्हें इतने सालों के दौरान रॉयल्टी में 5,00,000 पाउंड (करीब 6.2 करोड़ रुपए) मिले. उन्होंने बताया, ''मुझे घूमने-फिरने और (नए लोगों से) मिलने का मौका मिला, और  मेरा नजरिया काफी खुला. मैंने 300 ऐसे लोगों के साथ काम किया जिन्हें मैं जानता नहीं था, और फिर मैंने 24 (सीरीज) की. मैं एलए (लॉस एंजेलिस) में रहा. यह बहुत बड़ा अनुभव था.’’

यह उस शख्स के लिए कोई खराब सफर नहीं था जो 70 के दशक में भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान के ऐक्टिंग कोर्स में जगह हासिल करने में नाकाम रहा था. उन्होंने कहा, ''आप जिंदगी में हर किस्म की असुरक्षाओं से गुजरते हैं लेकिन आखिर में आपकी कड़ी मेहनत और लगन ही है’’ जो मायने रखती है. 

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