अपने संसाधनों की खोज-खबर
अनिल अग्रवाल ने बार-बार उन बातों की ओर इशारा किया जिन्हें वे गहरी जड़ें जमा चुकी ढांचागत कमियों, मंजूरी में देरी, जरूरत से ज्यादा नियम-कायदों और निजी उद्यमों पर संस्थागत भरोसे की कमी मानते हैं.

अनिल अग्रवाल: चेयरमैन, वेदांता समूह
अब जब भू-राजनीतिक तनाव भारत की ऊर्जा संबंधी कमजोरियों को उजागर कर रहे हैं, ऐसे में वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने एक सीधा संदेश दिया है: आयातित संसाधनों पर भारत की निर्भरता एक नीतिगत विफलता है, न कि कोई भौगोलिक बाध्यता.
इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में उन्होंने संसाधनों की कमी की आम चर्चा को नजरअंदाज करते हुए दलील दी कि भारत में दरअसल प्राकृतिक संसाधन भरपूर हैं. उन्होंने कहा कि समस्या यह है कि देश संसाधनों को कुशलतापूर्वक नहीं निकाल पा रहा और दक्षता से उनका उपयोग करने में असमर्थ है.
भारत का 60 फीसद से ज्यादा आयात खनिज और ऊर्जा से जुड़े होने के कारण उन्होंने इस मसले को नियमित सुधार के बजाए रणनीतिक तौर पर अनिवार्य बताया.
अग्रवाल ने बार-बार उन बातों की ओर इशारा किया जिन्हें वे गहरी जड़ें जमा चुकी ढांचागत कमियों, मंजूरी में देरी, जरूरत से ज्यादा नियम-कायदों और निजी उद्यमों पर संस्थागत भरोसे की कमी मानते हैं. उनका तर्क है कि इसके फलस्वरूप क्षमता का बहुत कम इस्तेमाल हो पाता है, खासतौर पर सरकारी कंपनियों में.
सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों को खरीदने और उनका विस्तार करने के वेदांता के अनुभव का जिक्र करते हुए उन्होंने दावा किया कि इनमें से कई उद्यम अपनी पूरी क्षमता से बहुत कम पर काम करते हैं; अक्सर इसकी वजह तकनीकी बाधाओं के बजाए नौकरशाही की सुस्ती होती है.
दक्षता के अलावा अग्रवाल जोरदार आर्थिक राष्ट्रवाद के प्रति भी मुखरता से बोले. उनका कहना था कि वैश्विक ताकतों की इसमें थोड़ी भी दिलचस्पी नहीं है कि भारत ऊर्जा और खनिज के मामले में आत्मनिर्भर बने; इसके बजाए वे यही चाहती हैं कि भारत आयात पर निर्भर बड़ा बाजार ही बना रहे. चाहे इसे एक रणनीतिक अंतर्दृष्टि के तौर पर देखा जाए या फिर महज बयान के तौर पर, यह बात घरेलू क्षमता-निर्माण के लिए उनके व्यापक तर्क को ही आगे बढ़ाती है.
अग्रवाल का मुख्य सुझाव यह है कि सरकार कारोबार के साथ जिस तरह से पेश आती है, उसमें बुनियादी बदलाव किए जाएं. उन्होंने जोर दिया कि 'ज्यादा नियंत्रण वाले रेगुलेटरी सिस्टम’ की जगह भरोसे पर आधारित ऐसा ढांचा तैयार किया जाए, जो सेल्फ-सर्टिफिकेशन और कम से कम दखल पर आधारित हो.
वेदांता के संस्थापक ने एक और बारीक बदलाव की ओर इशारा किया—भारतीय उद्यमियों में जोखिम उठाने की घटती भावना. उन्होंने तर्क दिया कि जहां पहले की पीढ़ियां बढ़ोतरी पर जोरदार तरीके से दांव लगाने को तैयार रहती थीं, वहीं आज के निवेशक ज्यादा सतर्क हैं—जिसकी एक वजह सिस्टम से जुड़ी रुकावटें हैं. उन्होंने सुझाव दिया कि अगर भारत तेल, गैस और खनन जैसे सेक्टरों में बड़े पैमाने पर निवेश चाहता है तो इस रुझान को पलटना बहुत जरूरी होगा.
अग्रवाल ने खासतौर पर पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं को कम करके आंका जो अक्सर संसाधनों से जुड़ी परियोजनाओं को रोक देती हैं. उनका तर्क था कि तकनीक काफी हद तक जोखिम कम कर सकती है और खनन को जरूरी आर्थिक गतिविधि के तौर पर देखा जाना चाहिए, न कि बोझ के रूप में. यह रुख, भले ही विवादित हो, बड़े पैमाने पर घरेलू उत्पादन तेज करने के उनके जोर के अनुरूप है.
सत्र का संदेश स्पष्ट था: भारत में संसाधनों, पूंजी या क्षमता की कमी नहीं है. अग्रवाल के अनुसार, देश में कमी एक ऐसे सिस्टम की है जो अपने कारोबारों पर यह भरोसा करता हो कि वे काम करेंगे.