बड़ी उपलब्धियों और भारी व्यवधानों का दौर
हमारी जिंदगियों में अप्रत्याशित रूप से कहीं गहरे तक घुस रहे एआइ और दूसरी ओर एक-दूसरे के खिलाफ जंग छेड़ते मुल्कों के बीच दुनिया के बारे में एक समझ पैदा करने का उपक्रम

- अरुण पुरी
इंडिया टुडे कॉन्क्लेव का 23वां संस्करण एक खास मौका है. इंडिया टुडे (अंग्रेजी) मैगजीन ने अपने प्रकाशन के 50 साल पूरे कर लिए हैं. आज अगर आप इंडिया टुडे समूह को देखें, तो यह एक मल्टी-मीडिया ताकत बन चुका है, जो 75 करोड़ लोगों तक पहुंचता है. लेकिन इसकी शुरुआत एक अकेली पत्रिका से हुई थी—एक ऐसा स्रोत, जहां से सब कुछ आगे बढ़ा.
आज वह नींव 50 साल गहरी हो चुकी है. इस आधी सदी में प्रधान संपादक के रूप में मुझे इतिहास को बहुत करीब से देखने का मौका मिला. इन दशकों में मैंने एक ऐसे देश को देखा है जो कि आश्चर्यजनक ढंग से अपने कायापलट में सक्षम है.
एक ऐसा मुल्क जो कभी सिर्फ एलडीसी (कम विकसित देश) ही नहीं, बल्कि आरडीसी (विकास से इनकार करने वाला देश) भी कहा जाता था. आज वही भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है. यह सफर आसान नहीं था. आतंकवाद, सामाजिक उथल-पुथल, ध्रुवीकरण, दंगे, कत्लो-गारत, प्राकृतिक आपदाएं और युद्ध. इन सबके बीच भारत ने खुद को संभाले रखा. सबसे बड़ी बात यह कि हम एक लोकतंत्र के रूप में टिके रहे, कमियों के बावजूद मजबूत. और यही अपने आप में गर्व और आभार की वजह है.
इस बार का कॉन्क्लेव मानो इतिहास के साथ तय हुआ था. 'ब्रेकथ्रू ऐंड ब्रेकडाउन' यानी बड़ी उपलब्धियां और बड़े व्यवधान थीम कई महीने पहले तय कर ली गई थी. तब यह अंदाजा नहीं था कि हमारे आसपास ही एक बड़ा युद्ध छिड़ जाएगा, जो हमें याद दिलाएगा कि वैश्विक स्थिरता कितनी नाजुक है. इस युद्ध ने एक तरफ कॉन्क्लेव के कार्यक्रम को प्रभावित किया, कई विदेशी वक्ता नहीं आ सके. दूसरी तरफ, इससे बेहतर समय और क्या हो सकता था जब हम दुनिया को बिना किसी भ्रम के देखें और सोचें कि हम किस दिशा में जा रहे हैं. यही हमेशा हमारे कॉन्क्लेव का मकसद रहा है. हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां मानव इतिहास के सबसे बड़े ब्रेकथ्रू—आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस—को देख रहे हैं. और उसी समय, मानव सभ्यता के सबसे पुराने ब्रेकडाउन—युद्ध—को भी.
विज्ञान, तकनीक और आर्थिक ताकत आज जिस रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं, वह हैरान करने वाली है. लेकिन इसी के साथ संस्थाएं कमजोर पड़ रही हैं, नियम ढीले हो रहे हैं और वैश्विक व्यवस्था दरक रही है. यही हमारे समय का सबसे बड़ा विरोधाभास है. हमारी मेधा भले आर्टिफिशियल हो गई हो लेकिन हमारी प्रवृत्तियां अब भी आदिम ही हैं. हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां एक छोटी-सी गलती—चाहे कूटनीतिक हो या तकनीकी—सालों की प्रगति को किनारे लगा सकती है. विडंबना यह है कि हमारी सबसे उन्नत तकनीकें ही आज युद्ध के तरीके तय कर रही हैं. अब विकास और विघटन अलग-अलग नहीं, बल्कि साथ-साथ चल रहे हैं.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब प्रयोग से निकलकर इस्तेमाल के दौर में पहुंच चुका है. यह उत्पादकता, रचनात्मकता, शासन और रोजमर्रा की जिंदगी...सबको बदल रहा है. जो क्षमताएं कभी बड़े संस्थानों तक सीमित थीं, अब आम लोगों तक पहुंच रही हैं. भारत के पास इस बदलाव से बड़ा फायदा उठाने का मौका है. हमारे पास बड़ा पैमाना है, कौशल है और मजबूत डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर है. हम अब सिर्फ तकनीक के उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसे आकार देने वाले भी बन रहे हैं.
लेकिन तकनीक अपने साथ खतरे भी लाती है. एआइ काम, असमानता और सामाजिक स्थिरता को लेकर मुश्किल सवाल खड़े करता है. उत्पादकता बढ़ने का मतलब यह नहीं कि समृद्धि सब तक पहुंचेगी. अगर समाज दौलत तेजी से बनाए लेकिन उसे बांटने में पीछे रह जाए, तो प्रगति आसानी से पीछे भी जा सकती है. एआइ आग की तरह है. यह आपका खाना पकाने तो आपका घर जलाने में भी सक्षम है.
डीपफेक कुछ ही सेकंड में किसी की भी साख खत्म कर सकते हैं. एल्गोरिद्म समाज को इतनी तेजी से बांट सकते हैं कि हम उसे ठीक भी न कर पाएं. अगर हम दक्षता के नाम पर अपने मूल्यों से समझौता कर लेते हैं तो असली नुक्सान हमारा ही होगा. इस बदलाव और उथल-पुथल के बीच हमें अपनी नैतिकता और स्वतंत्र सोच को मजबूती से थामे रखना होगा.
कभी-कभी मुझसे पूछा जाता है, क्या एक दिन कोई रोबोट इंडिया टुडे के संपादक की जगह ले लेगा? मेरी पत्नी शायद कहेंगी कि अगर कोई रोबोट उनकी हर बात बिना सवाल माने, तो उसके साथ रहना ज्यादा आसान होगा! लेकिन पत्रकारिता सिर्फ जानकारी प्रोसेस करने का काम नहीं है. यह उस पल की नब्ज पकड़ने का काम है—माहौल, आवाजें, भावनाएं और तनाव को समझना. यह काम कोई मशीन पूरी तरह नहीं कर सकती.
एआइ पत्रकारों को बेहतर कहानियां कहने में जरूर मदद करेगा, लेकिन स्टीयरिंग पर इंसान ही रहेगा और एक पैर हमेशा ब्रेक पर होगा. इसलिए मुझे लगता है कि मेरी नौकरी अभी सुरक्षित है. और मेरी पत्नी को भी अभी मुझे झेलना पड़ेगा, कम से कम तब तक, जब तक एआइ और बेहतर न हो जाए.
तकनीक से आगे बढ़ें, तो दुनिया में बड़े भू-राजनीतिक बदलाव भी दिख रहे हैं. कभी विकास का इंजन रहा भूमंडलीकरण अब दबाव में है. सप्लाइ चेन टूट रही हैं. व्यापार राजनीति का हिस्सा बन रहा है. सुरक्षा के नाम पर दक्षता की बलि दी जा रही है. लेकिन इस उथल-पुथल में एक मौका भी छिपा है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दूसरी पारी में अमेरिका की ताकत को फिर से स्थापित करने की कोशिश ने पुरानी वैश्विक व्यवस्था को हिला दिया है. इससे दुनिया अब ज्यादा मल्टीपोलर, प्रतिस्पर्धी और लचीली बन रही है. भारत जैसे देशों के लिए इसमें आर्थिक, कूटनीतिक और रणनीतिक जगह बन रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह पक्का किया है कि आज भारत की आवाज पहले से कहीं ज्यादा प्रभावी हो.
फिर भी कुछ गहरे संकट हैं जिनका सामना करना जरूरी है. जलवायु परिवर्तन अब दूर का खतरा नहीं, बल्कि आज की हकीकत है. चरम मौसम, पानी की कमी और खाद्य संकट अर्थव्यवस्था और राजनीति को बदल रहे हैं. दुख की बात यह है कि समाधान मौजूद हैं लेकिन सामूहिक इच्छाशक्ति कमजोर है. और फिर सबसे बड़ा संकट है, विश्वास का टूटना. संस्थाओं पर भरोसा, जानकारी पर भरोसा, नेतृत्व पर भरोसा—सब कमजोर पड़ रहे हैं.
लोकतंत्र एक झटके में खत्म नहीं होता. वह धीरे-धीरे कमजोर होता है—जब संवाद की जगह शोर ले लेता है, असहमति को देशद्रोह माना जाने लगता है और सच वैकल्पिक हो जाता है. लोकतंत्र को ऑक्सीजन चाहिए—और वह है अभिव्यक्ति की आजादी और मजबूत मीडिया. यही वजह है कि इंडिया टुडे कॉन्क्लेव जैसे मंच अहम हैं.
दो दशकों से ज्यादा समय से यह मंच नेताओं, विचारकों और आलोचकों को एक साथ लाता रहा है, सहमति बनाने के लिए नहीं, बल्कि समझ को तेज करने के लिए. आज, जब दुनिया ब्रेकथ्रू और ब्रेकडाउन के बीच खड़ी है, यह भूमिका और भी जरूरी हो जाती है. असल सवाल यह नहीं कि दुनिया बदलेगी या नहीं, वह पहले ही बदल चुकी है. असली सवाल यह है कि क्या हम इन उपलब्धियों को स्थायी प्रगति में बदल पाएंगे, बिना खतरनाक व्यवधान को न्योता दिए? क्या नवाचार के साथ समावेशन संभव है? क्या विकास के साथ स्थिरता जुड़ सकती है? क्या ताकत का इस्तेमाल संयम के साथ हो सकता है?
इन सवालों के जवाब शायद आपको पसंद न आएं. लेकिन उनसे भागा नहीं जा सकता क्योंकि ऐसे समय में सबसे बड़ा खतरा तोड़फोड़/बदलाव नहीं, बल्कि सुस्ती और गफलत है. हम एआइ की शक्ल में इतिहास की सबसे असाधारण खोज/विकास के दौर से गुजर रहे हैं. फिर भी हम मानव सभ्यता के प्राचीनतम व्यवधान यानी युद्ध के गवाह बन रहे हैं.
लोकतांत्रिक सत्ताएं कोई रातोरात नष्ट नहीं होतीं, उनका क्रमिक क्षरण होता है. लोकतंत्र को खुली हवा की दरकार है. और वह ऑक्सीजन है अभिव्यक्ति की आजादी तथा फलता-फूलता मीडिया.