जिताऊ चेहरे के लिए लाखों जतन

उत्तर प्रदेश की प्रमुख पार्टियों को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले जीतने की क्षमता वाले उम्मीदवारों की तलाश. इसके लिए वे डेटा, सर्वे और जमीनी फीडबैक के सहारे रणनीति और संगठन दोनों स्तर पर जुटीं

लखनऊ स्थित समाजवादी पार्टी के कार्यालय में नेताओं और कार्यकर्ताओं को संबोधित करते पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव का मुकाबला नारों और बड़े मुद्दों के अलावा सही उम्मीदवार चुनने की क्षमता का भी होगा. प्रदेश की राजनीति में उम्मीदवारों का चुनाव हमेशा से जटिल रहा है क्योंकि यहां जातीय समीकरण, स्थानीय गुटबाजी, संसाधन और संगठनात्मक ताकत जैसे कई कारक एक साथ काम करते हैं.

पूर्व में सही उम्मीदवारों के चलते स्थानीय स्तर पर चुनाव का पूरा समीकरण बदलते देखा गया है. यही वजह है कि चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में राजनैतिक दलों के बीच 'जिताऊ उम्मीदवार' की तलाश एक तरह की प्रतिस्पर्धा बन गई है. कोई पार्टी डिजिटल डेटा और सर्वे पर भरोसा कर रही है तो कोई अपने विशाल संगठनात्मक नेटवर्क के जरिए फीडबैक जुटा रही है.

समाजवादी पार्टी (सपा) ने इस दिशा में सबसे बड़ा कदम उठाते हुए चुनावी रणनीति के लिए पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म इंडियन पॉलिटिकल ऐक्शन कमेटी यानी आइ-पैक को जिम्मा सौंपने का निर्णय लिया है. जानकारों के अनुसार फरवरी महीने की शुरुआत में दिल्ली में दोनों के बीच समझौता अंतिम रूप ले चुका है.

आइ-पैक, जिसे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने सह-स्थापित किया था, पहले भी देश के कई बड़े चुनावी अभियानों का हिस्सा रह चुकी है. फिलहाल कंपनी पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चुनावी काम में व्यस्त है, इसके बाद सपा के अभियान को संभालने की इसकी योजना है. कंपनी की ओर से विनेश चंदेल को राज्य में टीम का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी दी गई है. सपा के भीतर इस रणनीति को पार्टी के डिजिटल और संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.

हाल में विधानसभा के बजट सत्र के दौरान सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पार्टी के कुछ विधायकों की आइ-पैक प्रतिनिधियों के साथ बैठक भी कराई. इसमें सोशल मीडिया रणनीति पर जोर दिया गया. एक विधायक के मुताबिक, ''आइ-पैक के प्रतिनिधि को यह तक पता था कि कौन-सा विधायक सोशल मीडिया पर कितना सक्रिय है और किस तरह की पोस्ट करता है. हमें बताया गया कि 2027 के चुनाव में सोशल मीडिया नैरेटिव बहुत महत्वपूर्ण होगा.''

डिजिटल प्रचार के साथ पार्टी 2027 के चुनाव में टिकट वितरण को भी पूरी तरह डेटा और सर्वे आधारित बनाने की तैयारी में है. जानकारी के मुताबिक, मार्च महीने में ही कुछ एजेंसियों के माध्यम से राज्य में विस्तृत सर्वे शुरू कराया जाएगा. इसमें हर विधानसभा क्षेत्र में दावेदारों की सूची बनाई जाएगी और लोकप्रियता, जातीय समीकरण, संगठन पर पकड़, वित्तीय क्षमता, सोशल मीडिया उपस्थिति और बूथ प्रबंधन क्षमता जैसे पैमानों पर उनका मूल्यांकन किया जाएगा. 

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पार्टी के अंदर साफ संकेत दे दिए हैं कि इस बार टिकट किसी की सिफारिश पर नहीं दिया जाएगा. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता की मानें तो ''अखिलेश ने साफ कह दिया है कि उम्मीदवार वही होगा जिसकी जीत की संभावना सबसे ज्यादा होगी. बड़े नेताओं की सिफारिश भी अंतिम कसौटी नहीं होगी.'' पार्टी 2022 के विधानसभा चुनाव में जिन सीटों पर मामूली अंतर से हार गई थी, उन पर खास ध्यान देने की योजना बना रही है.

ऐसे क्षेत्रों में दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवारों का रिपोर्ट कार्ड तैयार किया जाएगा और यह देखा जाएगा कि पिछले तीन साल में उनकी सक्रियता कितनी रही है. पार्टी का मानना है कि अगर इन सीटों पर सही चेहरा उतारा गया तो चुनावी समीकरण बदल सकते हैं. हालांकि सपा के सामने चुनौतियां भी कम नहीं. कई सीटों पर पुराने नेताओं का दबाव, संभावित गठबंधन और क्षेत्रीय क्षत्रपों की महत्वाकांक्षा उम्मीदवार चयन को जटिल बना सकती है. फिर भी पार्टी का मानना है कि डेटा आधारित चयन से आंतरिक असंतोष को कम करने में मदद मिल सकती है.

उधर, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी उम्मीदवार चयन को लेकर बेहद सतर्क नजर आ रही है. पार्टी ने जमीनी स्तर पर राजनैतिक माहौल का आकलन करने और मौजूदा विधायकों के प्रदर्शन की समीक्षा के लिए एक निजी सर्वे एजेंसी को नियुक्त किया है. इस एजेंसी में आइआइटी, आइआइएम जैसे देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के शोधार्थी और सर्वेयर शामिल हैं, जो राज्य के अलग-अलग हिस्सों में जाकर स्थानीय लोगों से बातचीत कर रहे हैं. भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के अनुसार, ''यह सर्वे राज्य संगठन की तरफ से हासिल फीडबैक से अलग है.

केंद्रीय नेतृत्व चाहता है कि उम्मीदवारों के बारे में एक स्वतंत्र और निष्पक्ष आकलन भी सामने आए.'' पार्टी में यह कवायद इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणामों ने भाजपा के लिए कुछ चेतावनी के संकेत छोड़े थे. विधानसभा क्षेत्र के आधार पर विश्लेषण करें तो भाजपा को केवल 162 सीटों पर बढ़त मिली थी, जबकि समाजवादी पार्टी 183 सीटों पर आगे रही थी. कांग्रेस को भी करीब 40 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी. यानी विपक्षी गठबंधन कुल मिलाकर 224 सीटों पर आगे था, जो सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत के आंकड़े से काफी ज्यादा है. 

राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही वजह है कि भाजपा उम्मीदवार चयन में किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती. 2022 के चुनाव में पार्टी ने बड़ी संख्या में विधायकों का टिकट काट दिया था और नए चेहरों को मौका दिया था. उस प्रयोग को पार्टी की जीत का एक अहम कारण माना गया था. इस बार भी अगर सर्वे में किसी विधायक के खिलाफ असंतोष दिखा तो उसका टिकट कट सकता है. लखनऊ में बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एस.के. पांडे कहते हैं, ''आज चुनाव केवल विचारधारा या लहर से नहीं जीते जाते. चुनाव प्रबंधन, डेटा विश्लेषण और सही उम्मीदवार चयन की भूमिका बहुत बढ़ गई है. भाजपा ने पिछले दशक में इस मॉडल को व्यवस्थित रूप से अपनाया है और अब अन्य दल भी उसी रास्ते पर चल रहे हैं.''

भाजपा की रणनीति केवल सर्वे एजेंसियों तक सीमित नहीं. पार्टी अपने संगठनात्मक ढांचे के माध्यम से भी जमीनी फीडबैक जुटा रही है. राज्य भर के करीब 1.65 लाख बूथों पर तैनात 20 लाख से ज्यादा कार्यकर्ताओं से मौजूदा विधायकों और संभावित उम्मीदवारों के बारे में जानकारी ली जा रही है. कार्यकर्ताओं से यह भी पूछा जा रहा है कि विधायक कितनी बार क्षेत्र में आते हैं, जनता की समस्याएं सुनते हैं या नहीं और सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों तक कितना पहुंच रहा है.

जानकारी के अनुसार, जिन विधायकों पर काम न करने, भ्रष्टाचार या घमंड भरा व्यवहार के आरोप मिल रहे हैं, उनकी रिपोर्ट अलग से बन रही है. ऐसे क्षेत्रों में नए उम्मीदवार उतारने की संभावना ज्यादा है. भाजपा 'विस्तारक' नाम के स्वतंत्र संगठनात्मक कार्यकर्ताओं को भी मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है, जो अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर स्वतंत्र रिपोर्ट तैयार करेंगे. राजनैतिक विश्लेषक इसे भाजपा की 'मल्टी लेयर्ड स्ट्रैटेजी' बताते हैं. उनका कहना है कि पार्टी कई स्तरों पर फीडबैक लेकर यह सुनिश्चित करना चाहती है कि किसी महत्वपूर्ण सीट पर गलत आकलन न हो जाए.

कांग्रेस भी इस बार अपने सीमित संगठनात्मक आधार के बावजूद नई रणनीति के साथ मैदान में उतरने की कोशिश कर रही है. पार्टी ने फैसला किया है कि विधानसभा चुनाव से करीब एक साल पहले ही सभी विधानसभा क्षेत्रों में प्रभारियों की नियुक्ति की जाएगी. इन प्रभारियों को क्षेत्र में संगठन मजबूत करने, मतदाताओं से संपर्क बढ़ाने और स्थानीय मुद्दे समझने की जिम्मेदारी दी जाएगी.

प्रदेश कांग्रेस प्रभारी अविनाश पांडे के अनुसार, ''हम हर विधानसभा क्षेत्र में ऐसे लोगों को जिम्मेदारी दे रहे हैं जो जमीन पर काम कर सकें. जो प्रभारी अपने क्षेत्र में संगठन और जनसंपर्क मजबूत करेंगे, उन्हें आगे चलकर चुनाव लड़ने का मौका भी दिया जा सकता है.'' कांग्रेस की यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी केवल दो सीटों पर जीती थी. पार्टी अब संगठन सुदृढ़ीकरण अभियान से नए कार्यकर्ताओं और संभावित उम्मीदवारों को तैयार करने की कोशिश कर रही है.

वहीं बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की रणनीति कुछ हद तक अलग है. पार्टी परंपरागत रूप से चुनाव से काफी पहले विधानसभा क्षेत्रों में प्रभारी नियुक्त करती है और बाद में उन्हीं में से किसी को प्रत्याशी बनाती है. हाल के महीनों में बसपा ने कुछ सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा भी कर दी है ताकि उन्हें क्षेत्रों में काम करने का पर्याप्त समय मिले.

ब्राह्मणों और मुसलमानों पर दांव लगाते हुए, पार्टी ने जौनपुर की मुंगरा बादशाहपुर सीट से विनोद मिश्र, जालौन की माधोगढ़ से आशीष पांडे, आजमगढ़ की दीदारगंज से अबुल कैस आजमी और सहारनपुर ग्रामीण से फिरोज आफताब को उम्मीदवार बनाया है. हालांकि बसपा की रणनीति को लेकर राजनैतिक विश्लेषकों की राय बंटी हुई है.

कुछ का मानना है कि जल्दी उम्मीदवार घोषित करने से संगठन को समय मिलता है, जबकि अन्य का कहना है कि चुनाव से काफी पहले नाम घोषित करने से बाद में बदलाव की स्थिति भी बन सकती है. 

आने वाले महीनों में सर्वे रिपोर्ट और जमीनी आंकड़े सामन आने के साथ यह साफ होता जाएगा कि किस पार्टी ने 2027 के चुनाव के लिए उम्मीदवार चयन की जटिल प्रक्रिया को कितने बेहतर तरीके से संभाला है.

कारगर साबित हुई थी भगवा रणनीति 

भाजपा 
सर्वे और संगठन के इनपुट के आधार पर वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 104 विधायकों के टिकट काटे थे. इसने स्थानीय स्तर पर सत्ता विरोधी लहर को काफी हद तक कुंद किया था. इनमें 80 सीटों पर भाजपा जीती थी. चुनाव में पार्टी ने 173 सीटों पर नए प्रत्याशी उतारे थे. इनमें से 99 उम्मीदवार जीते. हालांकि यह रणनीति वहां कारगर साबित नहीं हुई जिन सीटों पर 2017 के चुनाव में भाजपा को हार मिली थी. हारी 85 सीटों में 69 नए चेहरों पर दांव लगाया गया, उनमें सिर्फ 19 ही बाजी पलटकर चुनाव जीत सके. भाजपा ने 370 सीटों पर चुनाव लड़कर 255 सीटें जीती थीं. 

सपा
2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने 347 सीटों पर चुनाव लड़कर 111 सीटें जीती. सपा ने अपने कोटे की सीटों में सर्वाधिक 53 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार, 45 यादव, 20 ठाकुर और 21 ब्राह्मण उम्मीदवारों को उतारा था. अनुसूचित जाति की 85 सीटों के अलावा 70 सीटों पर अति पिछड़े, तीन कायस्थ और तीन सिख समुदाय के उम्मीदवारों को भी टिकट दिए थे.

बसपा
2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़कर महज एक सीट ही जीत सकी थी. पार्टी के 290 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी. केवल 18 सीटों पर पार्टी के उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे थे. संगठन फीडबैक के आधार पर इस चुनाव में बसपा ने आरक्षित सीटों से इतर भी कुल 93 सीटों पर दलित उम्मीदवार उतारे थे. इसके बाद 86 सीटों पर मुस्लिम और 70 पर ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था. 

कांग्रेस
2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस कुल 399 सीटों पर चुनाव लड़कर महज दो सीट ही जीतने में कामयाब हुई थी. पार्टी के 387 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी. केवल चार विधानसभा सीटों पर ही कांग्रेस के प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे थे. व्यक्तिगत रूप से उम्मीदवारों का इंटरव्यू और सर्वे के आधार पर कांग्रेस ने 147 सवर्ण, 83 ओबीसी और मुस्लिम व अन्य अल्पसंख्यक समुदाय से कुल 76 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था.

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