आईने से प्यार करने वाले मर्द

संवरने का आनंद सिर्फ महिलाएं ही क्यों लें? पुरुष भी ब्यूटी सैलून और त्वचा की नियमित देखभाल में सुख तलाश रहे हैं- जिससे भारत में पुरुष सौंदर्य का 2.3 अरब डॉलर का उद्योग तेजी से बढ़ रहा है.

lifestyle: MALE GROOMING
स्किनकेयर इन्फ्लुएंसर सनी वाल्मीकि 

सत्रह साल के रोहन मल्होत्रा (बदला हुआ नाम), जो दिल्ली के एक नामी स्कूल में पढ़ते हैं, उनके लिए स्किनकेयर सिर्फ देखभाल नहीं, एक तरह की परफॉर्मेंस है. सुबह की शुरुआत चारकोल क्लीन्जर से होती है, फिर एक्सफोलिएटिंग टोनर का एक स्वाइप और उसके बाद सनस्क्रीन, जिसे वे लगभग किसी रस्म की तरह दोबारा लगाते हैं.

क्लास के बीच-बीच में वे शीशे में खुद को देखते हैं, अपने करीने से सेट किए गए घुंघराले बालों पर थोड़ा जेल लगाते हैं और चेहरे पर सिट्रस फेस स्प्रे छिड़कते हैं. शाम का अंत शीट मास्क, अंडर-आई पैच और कोरियन पॉप स्टार्स से प्रेरित बेहद सधे हुए हेयर रूटीन के साथ होता है.

रोहन हंसते हुए कहते हैं, ''अच्छा दिखना ही कॉन्फिडेंस है,’’ और मेज पर रखे सीरम्स को ऐसे सजाते हैं जैसे वे कोई ट्रॉफी हों. रोहन और शहरों में रहने वाले उनके जैसे कई किशोरों के लिए ब्यूटी अब दिखावे की चीज नहीं रह गई है. यह खुद को जताने का तरीका, सोशल पहचान और आईने के सामने हर दिन होने वाला एक छोटा-सा निजी मंचन है.

मुंबई या गुरुग्राम के किसी आधुनिक मेन्स सैलून में जाइए, आप तुरंत समझ जाएंगे कि भारत में पुरुषों की ग्रूमिंग कितनी दूर निकल आई है. अब यह सिर्फ बाल कटवाने और शेव कराने तक सीमित नहीं रही. पुरुषों के मोटे बॉडी हेयर के लिए खास बनाए गए वैक्सिंग स्ट्रिप्स, 'सीईओ ग्लो थेरेपी’ के नाम से बेचे जा रहे डी-टैन फेशियल, देर रात तक स्क्रीन देखने से आंखों के नीचे आई थकान कम करने के लिए कोलेजन बढ़ाने वाले अंडर-आई मास्क, और यहां तक कि 'स्पोर्ट्स फुट स्क्रब’ वाले पेडिक्योर स्टेशन—ये सब अब आम सर्विस बन चुके हैं.

प्रीमियम स्पा अब हॉट ऑयल और सीरम के साथ बीयर्ड स्पा ट्रीटमेंट बेच रहे हैं. वहीं नायका जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के पुरुष सेक्शन में अब बीबी (ब्यूटी बाम) क्रीम, ऐंटी-एक्ने सीरम, टिंटेड मॉइस्चराइजर, कंसीलर और ब्रो जेल जैसे प्रोडक्ट्स आसानी से मिल रहे हैं.

अब ज्यादा पुरुष फेशियल, बॉडी पॉलिशिंग, डीप-क्लीन पेडिक्योर और हेयर स्पा बुक कर रहे हैं. वे ऐसे कंप्रेशन वेस्ट पहन रहे हैं जो शरीर को ज्यादा स्लीक दिखाते हैं. साथ ही अंगूठियां, चेन और ईयररिंग्स पहनना भी आम होता जा रहा है. खुशबू की दुनिया में भी बड़ा बदलाव आया है.

देश के सबसे चर्चित मेल स्किनकेयर इन्फ्लुएंसर्स में शामिल सचिन परमार कहते हैं, ''पुरुष अब फेशियल, शीट मास्क या बेसिक मेकअप आजमाने में सहज हो रहे हैं. पहले उन्हें लगता था कि स्किनकेयर सिर्फ महिलाओं के लिए है. अब उन्हें समझ में आ रहा है कि अपनी त्वचा का ख्याल रखना किसी जेंडर से जुड़ी चीज नहीं है. पुरुष भी साफ-सुथरे, सलीकेदार दिखना चाहते हैं न कि सिर्फ डिफॉल्ट रूप से रफ-टफ.’’

सौंदर्य की बढ़ती चाहत

इस नई प्रवृत्ति को देखते हुए ब्यूटी और वेलनेस बाजार ने भी तेजी से करवट ली है. कंसल्टिंग फर्म आइएमएआरसी के मुताबिक, भारत का पुरुष ग्रूमिंग बाजार 2024 में लगभग 2.3 अरब डॉलर (करीब 21,169 करोड़ रुपए) तक पहुंच गया. अनुमान है कि 2033 तक यह लगभग दोगुना होकर 4.3 अरब डॉलर (करीब 39,577 करोड़ रुपए) तक पहुंच जाएगा.

पिछले एक दशक में पुरुषों के लिए खास तौर पर बने ग्रूमिंग प्रोडक्ट्स बेचने वाली कई भारतीय कंपनियां उभरी हैं—जैसे द मैन कंपनी, बीयर्डो और बॉम्बे शेविंग कंपनी. पुरुष ग्राहकों की बढ़ती हिस्सेदारी को देखते हुए ऑनलाइन रिटेलर नायका ने 2018 में नायका मैन लॉन्च किया, जहां प्रोडक्ट्स के साथ ग्रूमिंग, हाइजीन और पर्सनल केयर पर एक्सपर्ट सलाह भी मिलती है. अब पुरुषों के ग्रूमिंग प्रोडक्ट्स भारतीय ब्यूटी इंडस्ट्री के मुख्य घटक बन चुके हैं.

हालांकि शुरुआत में कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती खुद ग्राहक ही थे. जब हितेश ढींगरा ने द मैन कंपनी की शुरुआत की, तो उनका मकसद भारतीय पुरुषों को सिर्फ डिओडोरेंट और शेविंग क्रीम तक सीमित खरीदारी से आगे ले जाना था. वहीं बॉक्वबे शेविंग कंपनी के संस्थापक और सीईओ शांतनु देशपांडे ने डिजिटल विज्ञापनों के जरिए एक तरह का 'एजुकेशन कैंपेन’ चलाया, ऐसी कैटेगरी में जहां ग्राहक आम तौर पर यह भी खुलकर नहीं बताते कि वे क्या खरीदते हैं.

बीयर्डो के संस्थापक आशुतोष वालानी और प्रियंक शाह को भारतीय पुरुषों को यह समझाने में समय लगा कि बीयर्ड ऑयल और बीयर्ड वॉश जैसी चीजें दिखावे की नहीं, बल्कि असली ग्रूमिंग जरूरतें हैं. उन्हें सस्ते, बिना ब्रांड वाले तेलों से मुकाबला करना पड़ा और शुरुआत में बड़े सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट के बिना ही भरोसा बनाना पड़ा.

अब तस्वीर बदल रही है. झिझक धीरे-धीरे खत्म हो रही है. स्किनकेयर इन्फ्लूएंसर सनी वाल्मीकि कहते हैं, ''पुरुषों के लिए मेकअप भी जल्द ही मुख्यधारा में आ जाएगा. ग्रूमिंग अब जेंडरलेस होती जा रही है.’’ दिल्ली के 35 वर्षीय कम्युनिकेशन प्रोफेशनल अक्षत कपूर मानते हैं कि भारत में पुरुषों का सजना-संवरना कोई नई बात नहीं है. ''महाराजा और मुगल शासक भी बेहद सजे-धजे रहने वाले पुरुष थे.

लेकिन ब्रिटिश दौर में मर्दानगी की धारणा बदल गई. जो आदमी सैलून जाता, उसे नाजुक समझा जाता था. फिर 'मेट्रोसेक्सुअल’ दौर आया, जहां पुरुष अपने लुक्स पर ध्यान देने लगे. वही सोच आज हमें आगे बढ़ा रही है.’’ जीवा ज्वेलरी ब्रांड के संस्थापक इशेंद्र अग्रवाल कहते हैं कि युवा पीढ़ी को ऐसे प्रोडक्ट्स बेचना अब आसान हो गया है. जीवा ने अपनी वेबसाइट पर पुरुषों के लिए अलग सेक्शन बनाया है.

अग्रवाल कहते हैं, ''जेन-ज़ी और मिलेनियल्स ज्वेलरी को स्टेटस नहीं, सेल्फ-एक्सप्रेशन के तौर पर देखते हैं. आज पुरुष ऐसे पीस चाहते हैं जो उनकी पर्सनैलिटी से मेल खाते हों, न कि सिर्फ उनके जेंडर से.’’ इसका उदाहरण मुंबई के 21 वर्षीय ज्वेलरी डिजाइनर रोहन एस. के एक रील में दिखता है. सफेद टी-शर्ट और स्ट्रेट-फिट जींस में वे स्टर्लिंग सिल्वर चेन, एक अंगूठी और पतली कफ पहनते नजर आते हैं. कैप्शन है: 'ज्वेलरी पहनने के लिए रैपर होना जरूरी नहीं है.’

अब अलग नहीं
कभी जो ब्रांड पूरी तरह महिलाओं से जुड़े माने जाते थे, वे भी अब अपनी मार्केटिंग बदल रहे हैं. क्लोविया, जो कभी महिलाओं की लिंजरी के लिए जानी जाती थी, अब पुरुषों के लिए इनरवियर और नाइटवियर भी बेच रही है. स्किनकेयर ब्रांड, जो पहले गुलाब की खुशबू वाले लोशन सिर्फ महिलाओं के लिए बनाते थे, अब वही खुशबू मिनिमल, यूनिसेक्स पैकेजिंग में पेश कर रहे हैं.

दुकानों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर धीरे-धीरे 'हिज’ और 'हर्स’ प्रोडक्ट्स की सीमा धुंधली होती जा रही है. देशभर में अब गुलाबी सुगंध वाले स्क्रब, गुलाब जल मिस्ट, जैस्मीन बॉडी वॉश, चंदन-गुलाब तेल और फ्लोरल फुट रिचुअल्स पुरुषों के वीकेंड स्पा रूटीन का हिस्सा बन रहे हैं. अर्बन कंपनी जो पहले घर पर केवल महिलाओं के लिए ब्यूटी सर्विस देती थी, अब पुरुषों के लिए अलग ग्रूमिंग सेक्शन चलाती है.

इसमें बीयर्ड स्क‌िंल्प्टग, ऐंटी-पॉल्यूशन फेशियल, स्वीडिश मसाज, फुट स्पा, फुट स्टीमिंग, डी-टैन मास्क, बॉडी पॉलिशिंग और ब्राइटनिंग पेडिक्योर जैसी सेवाएं शामिल हैं, जिनमें मास्क, स्क्रब और लंबे रिफ्लेक्सोलॉजी मसाज भी होते हैं. लुक्स सैलून में पुरुषों के मेन्यू में अब क्लैरिफाइंग फेशियल, ब्लैकहेड एक्सट्रैक्शन, मैनीक्योर, पेडिक्योर और ग्रे-ब्लेंडिंग हेयर कलर तक शामिल हैं. 

पुरुषों के बीच बढ़ती इस दिलचस्पी को सोशल मीडिया का इन्फ्लुएंसर इकोसिस्टम भी हवा दे रहा है. इंस्टाग्राम के एक्सप्लोर टैब पर 'मेल ग्रूमिंग’ सर्च कीजिए, और ऐसी दुनिया खुलती है जहां पुरुष सिर्फ कॉस्मेटिक्स आजमा ही नहीं रहे, बल्कि उन्हें अच्छी तरह समझ भी रहे हैं. कुछ सेकंड स्क्रोल कीजिए और क्रिएटर्स को ब्लेमिश जेल मिलाते, कंसीलर लगाते, ब्लैकहेड हटाने के तरीके बताते और लिप बाम की टेक्सचर व टिंट की तुलना करते देखेंगे.

मेल स्किनकेयर इन्फ्लुएंसर्स अंकुश बहुगुणा (@wingitwithankush)  और एलन चौधरी (@allen_choudhary) जैसे क्रिएटर्स—जिनके फॉलोअर्स लाखों में हैं—के कमेंट सेक्शन में पुरुष सवाल पूछते नजर आते हैं: ''क्या यह ऑयली स्किन के लिए ज्यादा ड्यूई तो नहीं?” ''क्या यह मेरे गेहुंए रंग से मैच करेगा?” ''क्या इसे ऑफिस में इस्तेमाल करना ठीक रहेगा?”

विज्ञापन पेशे से जुड़ी मालविका शर्मा कहती हैं, ''जब पुरुष सोशल मीडिया पर दूसरे पुरुषों को खुले तौर पर अपनी स्किनकेयर रूटीन, इस्तेमाल किए जाने वाले प्रोडक्ट्स और रेटिनॉल, नियासिनामाइड या गोजी बेरी एक्सट्रैक्ट जैसे इंग्रीडिएंट्स की बात करते देखते हैं, तो यह धीरे-धीरे सामान्य लगने लगता है.””

टूट रहीं रूढ़ियां
अब डर्मेटोलॉजिस्ट भी इस बदलाव का हिस्सा बन चुके हैं. वे पुरुषों की स्किनकेयर पर सवाल-जवाब सत्र आयोजित कर रहे हैं और इस बात पर जोर दे रहे हैं कि पुरुषों से यह उम्मीद करना सही नहीं कि वे वही प्रोडक्ट्स इस्तेमाल करें जो महिलाएं करती हैं. हालांकि यह बदलाव हर जगह समान नहीं है.

खासकर छोटे शहरों और पारंपरिक कार्यस्थलों में रूढ़ियां अब भी मजबूत हैं. इसका अनुभव 40 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर रविंद्र बंसल (बदला हुआ नाम) ने किया. ज्वेलरी क्रिएटर्स को ऑनलाइन देखने के बाद उन्होंने एक पतली सिल्वर चेन और ज्योमेट्रिक रिंग खरीदी. वे कहते हैं, ''मुझे पहली बार लगा कि मैं सच में खुद जैसा दिख रहा हूं.’’

लेकिन कुछ ही हफ्तों में सहकर्मियों ने उन्हें 'हीरो बनने की कोशिश’ कहकर चिढ़ाना शुरू कर दिया. एचआर ने उन्हें मेल भेजा कि उनका लुक 'वर्कप्लेस एक्सपेक्टेशन’ से मेल नहीं खाता. एक महीने बाद 'रिस्ट्रक्चरिंग’ के नाम पर उनकी नौकरी चली गई.

मानसिक स्वास्थ्य प्लेटफॉर्म नियामा डिजिटल हेल्थकेयर के मुख्य चिकित्सा निदेशक डॉ. श्रीकांत श्रीनिवासन कहते हैं कि ऐसी कहानियां समाज में मौजूद गहरे तनाव को दिखाती हैं. वे कहते हैं, ''भारतीय पुरुषों को मर्दानगी के एक सख्त खाके में पाला जाता है—भावनाहीन, संयमित और हमेशा मजबूत. ग्रूमिंग या ज्वेलरी जैसी कोई भी कोमल या अभिव्यक्तिपूर्ण चीज कमजोरी समझी जाती है.’’ लेकिन उनके अनुसार बदलाव की शुरुआत हो चुकी है: ''युवा पुरुष अब पूछ रहे हैं कि सेल्फ-केयर को जेंडर से क्यों जोड़ा जाए.’’

मेकअप और ग्रूमिंग के प्रति ज्यादा सहज होना पुरुषों को अपनी भावनात्मक संवेदनशीलता को भी खुलकर स्वीकार करने में मदद देता है. स्किनकेयर इन्फ्लुएंसर सनी वाल्मीकि ने भी बदलाव महसूस किया है. वे कहते हैं, ''कुछ साल पहले अगर कोई लड़का 'सीरम’ का जिक्र करता, तो लोग अजीब नजरों से देखते. अब आप पुरुषों को स्किनकेयर, मानसिक स्वास्थ्य, थेरेपी और बर्नआउट पर खुलकर बात करते देखते हैं. यह बड़ी बात है.’’ आखिर ऐसा क्यों हो कि यह अधिकार सिर्फ महिलाओं के हिस्से में आए? लड़के भी खूबसूरत दिखना चाहते हैं.  

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