पुराने का साथ छोड़ जेन ज़ी को प्रोत्साहन
नेपाल में अब जब युवा नेतृत्व कमान संभालने की तैयारी में है तो पड़ोसी देश से राजनयिक संबंध मजबूत करना भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए

- रणजीत राय
महज चार साल पहले अस्तित्व में आई राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने हालिया चुनावों में भारी बहुमत से जीत हासिल की है, जिससे नेपाल के राजनैतिक परिदृश्य में बड़ा बदलाव आने वाला है. तीन दशकों से अधिक समय तक राजनीति में खासा दबदबा रखने वाली प्रमुख पुरानी पार्टियों—नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) और माओवादी—का संसद के निचले सदन में प्रतिनिधित्व महज दो अंकों में सिमट गया है.
माओवादी नेता प्रचंड को छोड़कर, इन पार्टियों के लगभग सभी वरिष्ठ नेताओं को हार का मुंह देखना पड़ा है. उनकी जगह नए, युवा नेताओं (नए सांसदों की औसत आयु 43 वर्ष है) के समूह ने ले ली है जो काफी पढ़े-लिखे हैं, तकनीकी कौशल रखते हैं, व्यावहारिक हैं और किसी खास विचाराधारा से बंधे नहीं हैं.
आरएसपी के करिश्माई नेता और भावी प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने भारत से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की है और काठमांडू के मेयर के तौर पर अपने कार्यों की वजह से खासे चर्चित रहे हैं. कई नए नेता विदेश में रह चुके हैं और वहां काम भी कर चुके हैं, जैसे आरएसपी संस्थापक रबी लामिछाने अमेरिका में रहते थे. चुनाव नतीजे साबित करते हैं कि जनता ने पुराने दिग्गजों को सिरे से नकार दिया है और पूरे देश को नई पीढ़ी के नेताओं ने काफी अपेक्षाएं हैं.
दरअसल, आरएसपी ने 8-9 सितंबर, 2025 के उन जेन-ज़ी प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व किया था जो देश की शासन व्यवस्था में सार्थक बदलाव की मांग कर रहे थे. हालांकि, विरोध प्रदर्शनों का तात्कालिक कारण यही था कि ओली सरकार ने कुछ लोकप्रिय सोशल मीडिया ऐप्स के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी थी. लेकिन विरोध प्रदर्शनों के दौरान #nepokids हैशटैग वायरल होने ने साफ कर दिया कि भ्रष्टाचार और असमानता जैसे मुद्दों को लेकर जनता उनसे बेहद नाराज थी.
इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि 20 फीसद बेरोजगारी के कारण देश की एक-तिहाई आबादी को विदेश में काम तलाशने के लिए मजबूर होना पड़ा. नए नेतृत्व का मुख्य एजेंडा भ्रष्टाचार मुक्त शासन और आर्थिक विकास सुनिश्चित करना है.
यह चुनाव कुछ अन्य वजहों से भी महत्वपूर्ण है. बालेंद्र शाह ने घनी आबादी वाले मधेस प्रांत में खुद को माटी के लाल के तौर पर पेश कर न केवल जातीय और क्षेत्रीय विभाजन घटाया, बल्कि पूरे देश को एकजुट करने में भी सफल रहे. मधेसी अधिकारों की जंग लड़ने में आगे रहने वाली दक्षिणी क्षेत्र तराई की क्षेत्रीय पार्टियों का प्रदर्शन निराशाजनक रहा. राजशाही की बहाली की मांग करने वाली राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी को भी करारी हार का सामना करना पड़ा. उसे सीधे चुनाव में केवल एक सीट ही मिल पाई है.
भारत के लिए मौजूदा घटनाक्रम के मद्देनजर अपनी पड़ोसी-प्रथम नीति पर पुनर्विचार करना जरूरी हो गया है. जाने-पहचाने पुराने नेताओं के विपरीत नए नेताओं के भारत के साथ मजबूत संबंध नहीं हैं. हालांकि वे नेपाल की प्रगति और समृद्धि के लिए भारत की अहमियत को अच्छी तरह समझते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही रबी-बालेंद्र से सौहार्दपूर्ण टेलीफोन से बातचीत कर चुके हैं.
इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए बातचीत का विस्तार होना चाहिए. खाड़ी देशों से भारतीयों के साथ नेपाली नागरिकों की निकासी एक ऐसा मसला है जिस पर अगर अनुरोध किया जाए तो हम मदद कर सकते हैं. सहयोग का एक अन्य प्रमुख क्षेत्र संयुक्त आयोग की जल्द बैठक बुलाकर विकास साझेदारी और कनेक्टिविटी कार्यक्रमों को मजबूत करना हो सकता है. जलविद्युत सहयोग पहले से ही सकारात्मक ढंग से आगे बढ़ रहा है, लेकिन 6000 मेगावाट वाली पंचेश्वर बहुउद्देशीय जलविद्युत परियोजना पर त्वरित कार्रवाई जरूरी है.
नेपाली स्टार्टअप को भारत के स्टार्टअप से जोड़ने वाले स्टार्टअप पार्टनरशिप नेटवर्क जैसे कार्यक्रमों का विस्तार किया जा सकता है. यही नहीं, 1950 की शांति व मैत्री संधि और सीमा विवाद जैसे कुछ संवेदनशील राजनैतिक मुद्दों पर मजबूत बहुमत वाली सरकार के साथ उचित समय पर चर्चा शुरू करने का मौका भी मिल सकता है.
हालांकि, नेपाल में कम्युनिस्ट दलों की हार चीन के लिए एक बड़ा झटका है, खासकर यह देखते हुए कि वह वर्षों से नेपाल में एक एकीकृत कम्युनिस्ट गुट विकसित करने की कोशिशों में जुटा था. ऐसे में बहुत संभव है कि बेल्ट ऐंड रोड की कुछ संयुक्त परियोजनाओं की समीक्षा की जाए. बहरहाल, नेपाल में यह बदलाव उत्साह, आशा और उम्मीद की रोशनी लेकर आया है. पुराना नेतृत्व सत्ता से बेदखल हो चुका है. एक नए युग का सूत्रपात होने वाला है. भारत को नए नेतृत्व को अपना पूरा सहयोग और समर्थन देना चाहिए.
रणजीत राय नेपाल के राजदूत रह चुके हैं और 'काठमांडू डिलेमा: रिसेटिंग इंडिया-नेपाल टाइज' पुस्तक के लेखक हैं