झटपट टिकट की नई व्यवस्था
कुछ महीनों में लॉन्च होने जा रहा भारतीय रेल का नया रिजर्वेशन सिस्टम 40 साल पुराने ढांचे की जगह लेगा. इसे तेज, स्केलेबल तकनीक के साथ तैयार किया गया है, ताकि बढ़ती मांग और डिजिटल खतरों से निबटा जा सके

कई बरसों से भारतीय रेल की टिकट बुकिंग व्यवस्था शिकायतों के घेरे में रही है. यात्रियों का आरोप रहा है कि सिस्टम धीमा है, बार-बार गड़बड़ी करता है और भरोसेमंद नहीं है. यही वजह है कि ई-टिकटिंग का संचालन करने वाली इंडियन रेलवे कैटरिंग ऐंड टूरिज्म कॉर्पोरेशन (आइआरसीटीसी) को सोशल मीडिया पर अक्सर सफाई देनी पड़ती है.
कोलकाता के मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव अवीक बनर्जी, जिन्हें पश्चिम बंगाल में अक्सर ट्रेन से यात्रा करनी पड़ती है, कहते हैं, ''टिकट बुकिंग के पीक टाइम, जैसे सुबह 8 बजे अगर पहली कोशिश में टिकट बुक हो जाए तो इसे किस्मत ही कहेंगे. काउंटर की लाइनें भी कम नहीं हुई हैं. कभी सर्वर डाउन रहता है और जब दोबारा शुरू होता है, तब तक कन्फर्म टिकट खत्म हो चुके होते हैं.'' भारत में जिसने भी कभी रेलवे टिकट बुक करने की कोशिश की है, उसके लिए यह परेशानी नई नहीं है. लेकिन अब इसमें बदलाव आने वाला है.
भारतीय रेल अपने पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम (पीआरएस) के बड़े आधुनिकीकरण पर करीब 1,000 करोड़ रुपए खर्च कर रही है, जिस पर रोजाना लगभग 2.3 करोड़ यात्रियों को ढोने वाले विशाल रेलवे नेटवर्क की टिकटिंग व्यवस्था टिकी हुई है. जब नया सिस्टम कुछ महीनों में शुरू होगा तो यात्रियों को साधारण लेकिन अहम बदलाव महसूस हो सकता है: टिकट बुक करते समय बॉट्स से हारने की समस्या कम हो जाएगी (देखें: पुराना बनाम नया). कम से कम नई तकनीक मौजूदा क्षमता से पांच गुना ज्यादा बुकिंग संभाल सकेगी, साथ ही इसे हैक या इसका दुरुपयोग करना मुश्किल होगा और अपग्रेड करना आसान.
अफसरों का कहना है कि पीआरएस का यह अपग्रेड वेटिंग लिस्ट का संकट खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम है. यह लक्ष्य लंबी अवधि में ही पूरा हो पाएगा, क्योंकि इसके लिए सॉफ्टवेयर के साथ ट्रेनों और सीटों की संख्या बढ़ाना जरूरी है. रेलवे के सॉफ्टवेयर विंग सेंटर फॉर रेलवे इन्फॉर्मेशन सिस्टम्स (सीआरआइएस या क्रिस) के एक शीर्ष अधिकारी कहते हैं, ''परियोजना काफी आगे बढ़ चुकी है. अभी हम परीक्षण कर रहे हैं. अप्रैल से जून के बीच यह पूरी तरह लागू हो जाएगी.''
डिजिटल कोर का पुनर्निर्माण
इस बड़े अपग्रेड को रेलवे बोर्ड ने पीआरएस मॉडर्नाइजेशन फेज-2 नाम से 2022 में मंजूरी दी और इसके लिए 183 करोड़ रुपए मंजूर किए. इसे लागू करने का जिम्मा क्रिस को दिया. अगस्त 2026 तक लॉन्च का शुरुआती लक्ष्य है. नए सिस्टम में रियल-टाइम डायनेमिक ट्रैफिक मैनेजमेंट, मल्टीलिंगुअल इंटरफेस और सबसे अहम वेंडर पर निर्भरता खत्म करने की व्यवस्था के साथ इसकी क्षमता मौजूदा 25,000 टिकट प्रति मिनट से बढ़कर 1,25,000 टिकट प्रति मिनट तक पहुंच जाएगी.
नया सिस्टम सिर्फ टिकट बुकिंग सुपरफास्ट ही नहीं करेगा बल्कि पीआरएस टिकटिंग सिस्टम की खामियों को भी दूर करेगा जिसकी जरूरत लंबे समय से थी. मिसाल के तौर पर, भारतीय रेल को कई बार पता चला कि 'बुकिंग' के लिए बने ऑटोमेटेड ऐप—जिनके नाम कथित तौर पर 'गदर', 'स्पेसएक्स' और 'एवेंजर' थे—एजेंटों के नेटवर्क को सब्सक्रिप्शन पर बेचे जा रहे थे.
इनके जरिए असली यात्री के ब्राउजर खोलने से पहले ही टिकटों का बड़ा हिस्सा कब्जे में ले लिया जाता था. ये टूल्स टिकट विंडो खुलने से पहले ही यात्रियों का ब्यौरा लोड कर देते हैं और तत्काल टिकट की बुकिंग खुलते ही, आइआरसीटीसी के कैप्चा और बैंक ओटीपी को बाइपास करते हुए रिजर्वेशन कर लेते हैं और आम आदमी तब तक नाम ही टाइप कर पाता है.
बदतर यह कि आधार से प्रमाणित आइआरसीटीसी यूजर आइडी भी 360 रुपए में बेची जा रही थीं, वह भी टेलीग्राम और व्हाट्सऐप के 40 से ज्यादा ग्रुप के जरिए. उदाहरण के लिए, मुंबई में 2018 में एक मामले में सामने आया कि एक व्यक्ति 5,400 से ज्यादा एजेंटों का नेटवर्क चला रहा था जो सॉफ्टवेयर के जरिए आइआरसीटीसी के कैप्चा को भी पार कर लेता था और यात्रियों की जानकारी खुद भर देता था.
वह हर महीने करीब 35 लाख रुपए की कमाई कर रहा था. तत्काल बुकिंग शुरू होने के पहले पांच मिनट में होने वाले लॉगइन प्रयासों में लगभग आधे बॉट्स के जरिए हो रहे थे. आइआरसीटीसी की कार्रवाई में करीब 2.5 करोड़ फर्जी यूजर आइडी ब्लॉक की गईं. अब रेलवे ई-टिकट बुकिंग में आधार आधारित प्रमाणीकरण का इस्तेमाल कर रहा है जो मददगार है लेकिन नई व्यवस्था शातिरों के हाथ सिस्टम के दुरुपयोग पर लगाम लगाएगी.
इस परिवर्तन में रेलवे के ऊपर से नीचे तक राउटर बदलने से लेकर टर्मिनल पर बेहतर बैंडविड्थ कनेक्टिविटी देना शामिल है. रेलवे टिकटिंग विकेंद्रीकृत और टियर में बंटा तंत्र है (देखें: कैसे काम करेगा नया टिकटिंग सिस्टम). साइट के शीर्ष पर सेंट्रल डेटा सेंटर होगा जिसके पास खाली सीटों की मूल इन्वेंट्री होगी. इसके बाद रीजनल नोड्स और इनके नीचे स्टेशन और काउंटर लेवल का सिस्टम होगा जहां क्लर्क यात्रियों का ब्योरा भरकर बुकिंग कन्फर्म करता है.
हर लेयर पर राउटर ट्रैफिक कंट्रोलर की तरह काम करेंगे जिसमें बुकिंग रिक्वेस्ट ऊपर सेंट्रल सर्वर तक जाएगी और फिर लौटकर टर्मिनल पर आएगी. जब यात्री बुकिंग करेगा सिस्टम इसे कुछ सेकंड के लिए होल्ड करेगा—जब रिक्वेस्ट टर्मिनल से सर्वर के बीच होगी तो उसे अस्थायी रूप से लॉक किया जाएगा—ताकि बुकिंग कन्फर्म होने और सर्वर से वापस आने के बीच कोई दूसरा सीट पर दावा न कर सके. इस पूरी चेन में हर पॉइंट पर आधुनिकतम उपकरण और तेज तथा भरोसेमंद इंटरनेट कनेक्शन दिए जा रहे हैं. जोनल स्तर पर 5,788 में से 3,178 राउटर बदले जा चुके हैं, 5,000 में से 3,475 बुकिंग टर्मिनल नए ऐप्लिकेशन पर स्थानांतरित हो चुके हैं और मुख्य सॉफ्टवेयर अंतिम परीक्षण के करीब है.
पीआरएस 1985 से चल रहा है. इसे मूल रूप से शायद 10-15 साल के लिए बनाया गया था, लेकिन यह लगभग 40 साल तक चलता रहा, जिससे यह दुनिया के सबसे पुराने और सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले टिकटिंग सिस्टमों में से एक बन गया. इसका सॉफ्टवेयर फॉर्ट्रान-77 में लिखा गया था. यह शुरुआती हाइ लेवल प्रोग्रामिंग लैंग्वेज में से एक थी, जिसे 1957 में आइबीएम ने विकसित किया था. लेकिन नया प्लेटफॉर्म रेड हैट्स लाइनक्स एन्वायरनमेंट व अन्य जैसे ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर पर चलेगा.
इसका मतलब है सॉफ्टवेयर कोड और उसकी एक्सेस किसी एक कंपनी के पास नहीं होगी. कोई भी सर्टिफाइड वेंडर इसके लिए हार्डवेयर की आपूर्ति, सपोर्ट और इस पर डेवलप कर सकता है. अगर कोई मैन्युफैक्चरर मार्केट छोड़ देता है या बहुत महंगा हो जाता है तो रेलवे दूसरे के पास जा सकता है और इसके लिए उसे नए सिरे से काम शुरू नहीं करना होगा.
लंबे समय से वह इस तरह के बंधन से आजाद होना चाहता था. नए सिस्टम में टिकट बुकिंग प्रति मिनट पांच गुना बढ़ाना मुमकिन होगा: पुराने सिस्टम में सर्वर बढ़ाने के बावजूद क्षमता विस्तार नहीं किया जा सकता, नए में डिमांड के मुताबिक विस्तार संभव है.
आरक्षित ही नहीं अनारक्षित टिकट प्रणाली (यूटीएस) जिससे करोड़ों प्लेटफॉर्म टिकट और जनरल क्लास टिकट जारी होते हैं, को भी 200 करोड़ रुपए के अलग प्रोजेक्ट के तहत नए सिरे से तैयार किया जा रहा है. इसका पहला चरण अक्तूबर 2021 में पूरा हुआ था. दूसरे चरण में ओपन-स्टैंडर्ड तकनीक पर आधारित नया ऐप्लिकेशन आर्किटेक्चर तैयार किया जा रहा है. पूरे 31 दिसंबर तक पूरे देश में जारी करने का लक्ष्य है.
सिस्टम की हिफाजत
यह पूरी कवायद इसलिए संभव हो पा रही है क्योंकि भारतीय रेल के पास अब संसाधन हैं—बीते 10 साल में हर वर्ष पूंजीगत व्यय में वृद्धि—और राजनैतिक इच्छाशक्ति के रूप में बड़े कदम उठाने वाले रेलमंत्री भी हैं. इस साल के बजट में रेलवे के लिए रिकॉर्ड 2.78 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है. यह बात दूसरे घटक के रूप में और स्पष्ट होती है और वह है भारतीय रेलवे इन्फॉर्मेशन सिक्योरिटी ऑपरेशंस सेंटर (आइआर-एसओसी), जिसे 600 करोड़ रुपए की लागत से तैयार किया जा रहा है.
दुनिया भर में रेलवे नेटवर्क-यूक्रेन और बेलारूस से लेकर ईरान तक-साइबर हमलों का निशाना बन चुके हैं. आइआर-एसओसी रेलवे के डिजिटल ढांचे के हर कोने पर नजर रखेगा, किसी भी घुसपैठ या सुरक्षा उल्लंघन की पहचान करेगा और खतरे से जुड़ी जानकारी इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम (सीईआरटी-इन) और नेशनल क्रिटिकल इन्फॉर्मेंशन इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोटेक्शन सेंटर (एनसीआइआइपीसी) जैसी राष्ट्रीय एजेंसियों के साथ साझा करेगा. एसओसी को हब-ऐंड-स्पोक मॉडल पर बनाया जा रहा है.
इसका केंद्र रेल भवन में होगा, जहां से देशभर में फैले 26 सब-एसओसी से जुड़ा नेटवर्क संचालित होगा. ये सब-एसओसी सभी जोनल रेलवे मुख्यालयों, उत्पादन इकाइयों और शोध संस्थानों में होंगे. दो स्थानों को छोड़कर सभी सब-एसओसी पर हार्डवेयर लग गया है, 14 जगहों पर कनेक्टिविटी शुरू हो गई है.
रेलवे जिस पैमाने पर डिजिटल अपग्रेड कर रहा है वह भारी-भरकम है. इसका लक्ष्य है कि अगले 40 साल तक रेल यात्रा मजबूत और भरोसेमंद आधारभूत ढांचे पर हो.