ऊर्जा संकट से निबटने की तैयारी

दुनिया भर के तेल और गैस बाजार में जंग की वजह से मचा हड़कंप. भारत को इनकी सप्लाइ पक्की करने के साथ लागत का गुणा-गणित करना पड़ रहा

थाइ मालवाहक जहाज पर 11 मार्च को होरमुज जलडमरूमध्य में हमले के बाद उठता धुंआ

आठ मार्च को तेल की कीमतें थोड़ी देर के लिए एक मनोवैज्ञानिक स्तर से ऊपर चली गईं, जो 2022 में रूस-यूक्रेन लड़ाई के शुरुआती दिनों के बाद से इस स्तर के पार नहीं गई थीं. पश्चिम एशिया में संघर्ष तेजी से बढ़ने के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 डॉलर (लगभग 9,200 रु.) प्रति बैरल के पार निकल गईं, और तब से इनमें बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव हो रहा है.

होरमुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ने वाला समुद्री रास्ता है जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है. लेकिन 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इज्राएल के हमलों के बाद इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो गई है. आक्रमण के बाद ईरान ने तेल अवीव के साथ-साथ खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों, रिफाइनरियों और नागरिक ढांचों पर जवाबी हमले किए.

उग्रपंथी गुटों की चेतावनी पर कि इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों को निशाना बनाया जा सकता है, शिपिंग कंपनियों ने किसी तरह का औपचारिक अवरोध न होने पर भी वहां से आवजाही बंद कर दी है. युद्ध में जोखिम बीमे की लागत बढ़ गई है, जिससे ढुलाई और मुश्किल हो गई है. नई दिल्ली के लिए यह संकट सीधे-सीधे आर्थिक खतरा है.

भारत 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है और इसमें से लगभग आधी सप्लाइ होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आती है. लिहाजा सरकार ने आपातकालीन उपाय—प्राकृतिक गैस सप्लाइ को रेगुलेट करने और एलपीजी का उत्पादन बढ़ाने से लेकर रूस से कच्चा तेल खरीदने के विकल्प फिर से खोलने तक—शुरू कर दिए हैं ताकि अर्थव्यवस्था को लंबे समय के ऊर्जा झटकों से महफूज किया जा सके. 

वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव से जाहिर होता है कि लड़ाई तेजी से बढ़ती जा रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को शुरू में उम्मीद थी कि 28 फरवरी के हमले, जिनमें सर्वोच्च नेता अली खामेनेई समेत कई बड़े ईरानी नेता मारे गए थे, से देश का नेतृत्व कमजोर हो जाएगा. लेकिन 9 मार्च को तेहरान ने मारे गए सर्वोच्च नेता के बेटे मोजतबा खामेनेई को देश का नया सुप्रीम लीडर बना दिया—जिससे लगातार विरोध और लड़ाई लंबी खिंचने का संकेत मिला.

दुनिया भर में सप्लाइ में लगातार अड़चन के डर से ब्रेंट क्रूड कुछ समय के लिए 120 डॉलर (11,000 रु.) प्रति बैरल तक पहुंच गया. ट्रंप के यह कहने के बाद कि जंग 'बहुत जल्द' खत्म हो सकती है, 10 मार्च तक कीमतें 90 डॉलर (8,280 रु.) से नीचे आ गईं, लेकिन विश्लेषक चेतावनी देते हैं कि बाजार बहुत ज्यादा नाजुक बने हुए हैं. अगर होरमुज के रास्ते जहाजों की आवाजाही अटकी रही तो कीमतें आसानी से 120 डॉलर के पार जा सकती हैं.

सप्लाइ में सीधी बाधाओं से अमेरिका काफी हद तक बचा हुआ है क्योंकि वह खुद तेल का बड़ा उत्पादक है. लेकिन महंगे तेल—खासकर महंगाई—का परोक्ष असर उसकी अर्थव्यवस्था को भी चोट पहुंचाएगा, क्योंकि वह उपभोक्ता और औद्योगिक सामान के मामले में आयात पर निर्भर है. चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देश आयातित तेल पर बहुत अधिक निर्भर हैं और उनको ज्यादा खतरा है. यूरोप की कमजोरी दूसरी तरह की है. पश्चिम एशिया में लड़ाई अगर लंबी चली तो प्राकृतिक गैस की कीमतें बढ़ सकती हैं और वह आपूर्ति शृंखला बिगड़ सकती है जिसे रूस से ऊर्जा आयात में कटौती के बाद यूरोप फिर से बनाने की कोशिश कर रहा है.

भारत को आर्थिक चोट 
भारत के लिए जोखिम ऊर्जा की ज्यादा कीमतों के कारण बढ़ने वाले आर्थिक बोझ का है. सिर्फ वित्त वर्ष 25 में भारत का तेल आयात बिल लगभग 137 अरब डॉलर (12.6 लाख करोड़ रु.) था. विश्लेषकों का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमतों में 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी भी भारत के सालाना आयात बिल को लगभग 14 अरब डॉलर (1.3 लाख करोड़ रु.) तक बढ़ा सकती है, यानी करीब 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी. प्राकृतिक गैस की कीमतों में भी ऐसे ही जोखिम हैं. वित्त वर्ष 25 में भारत का गैस आयात बिल लगभग 15.2 अरब डॉलर (1.4 लाख करोड़ रु.) था, और हर एक डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट (एमएमबीटीयू) की बढ़ोतरी से देश की आयात लागत में लगभग 1.2 अरब डॉलर (11,000 करोड़ रु.) या 8 प्रतिशत का इजाफा हो सकता है. 

ऐसी किसी भी बढ़ोतरी का असर व्यापक अर्थव्यवस्था में हो सकता है. 2025 में ज्यादातर समय देश खाद्य वस्तुओं की बढ़ी हुई कीमतों से जूझता रहा, हालांकि कुल मिलाकर महंगाई प्रबंधित करने लायक रही जिससे भारतीय रिजर्व बैंक ने साल के दौरान ब्याज दरों में 125 आधार अंक की कमी की. तेल-गैस की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी इस पर पानी फेर सकती है. भारतीय स्टेट बैंक में समूह के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष कहते हैं, ''तेल की कीमतों में वृद्धि से अर्थव्यवस्था में लागत के कारण बढ़ने वाली महंगाई में इजाफा होता है. तेल कीमतों में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से महंगाई में 35-40 आधार अंक की वृद्धि हो सकती है. तेल के ऊंचे दाम वित्त वर्ष 27 में आर्थिक वृद्धि को 20-25 आधार अंक तक धीमा कर सकते हैं.'' 

गैस सप्लाइ को ठीक करना
हालांकि, इसका तात्कालिक प्रभाव एक जैसा नहीं रहा है. पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर अभी कोई असर नहीं आया है. लेकिन एअर इंडिया ने 12 मार्च से घरेलू उड़ानों के टिकटों पर 399 रुपए का फ्यूल सरचार्ज लगाने और अंतरराष्ट्रीय रूट पर भी धीरे-धीरे चार्ज बढ़ाने का ऐलान किया है. लंबी दूरी की फ्लाइटों के टिकट 50 डॉलर (4,600 रु.) तक महंगे हो जाएंगे.

मुंबई, हैदराबाद, चेन्नै और बेंगलूरू समेत कई बड़े शहरों में लिक्वफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) के वितरण में रुकावट की भी खबरें आई हैं. ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने पहले ही खुदरा कीमतों को एडजस्ट करना शुरू कर दिया है. 7 मार्च को, बिना सब्सिडी वाले 14.2 किलो के घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत 60 रुपए बढ़ाकर दिल्ली में 913 रुपए कर दी गई. कमर्शियल एलपीजी के दाम और ज्यादा बढ़े, राजधानी में 19 किलो का सिलेंडर 114.5 रुपए बढ़कर अब 1,883 रुपये का हो गया है.

ज्यादा व्यवधान की आशंकाओं को देखते हुए केंद्र ने 10 मार्च को प्राकृतिक गैस के उत्पादन और सप्लाइ को रेगुलेट करने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम लागू किया. नए प्राकृतिक गैस (आपूर्ति नियमन) आदेश, 2026 में अलग-अलग सेक्टर में गैस आवंटन के लिए चार श्रेणी का प्राथमिकता सिस्टम शुरू किया गया है.

सबसे अधिक प्राथमिकता वाली श्रेणी में शामिल हैं, घरों के लिए पाइप से प्राकृतिक गैस, परिवहन में इस्तेमाल सीएनजी, एलपीजी उत्पादन और गैस पाइपलाइन चलाने के लिए जरूरी ईंधन. दूसरी श्रेणी में उर्वरक संयंत्र आते हैं. तीसरी श्रेणी में चाय बागान, मैन्युफैक्चरिंग इकाइयां और राष्ट्रीय गैस ग्रिड से जुड़े दूसरे उद्योग शामिल किए गए हैं, जबकि चौथी श्रेणी में शहरी गैस वितरण नेटवर्क से जुड़े औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ता रखे गए हैं.

सरकार ने सार्वजनिक और निजी दोनों रिफाइनरियों को एलपीजी का उत्पादन अधिक से अधिक बढ़ाने का निर्देश दिया है. इनसे प्राप्त सप्लाइ खास तौर पर देश की तीन सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों को दी जाएगी. हॉस्पिटैलिटी जैसे गैर-घरेलू सेक्टर के लिए इन कंपनियों के तीन कार्यकारी निदेशकों की एक कमेटी एलपीजी मांग की समीक्षा करेगी. लेकिन होटल और रेस्टोरेंट मालिकों ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक सप्लाइ की किल्लत रही या कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हुई तो उन्हें कुछ समय के लिए बंद रखना पड़ सकता है.

रूस के तेल का विकल्प
इस संकट ने उस रणनीतिक विकल्प को फिर से खोल दिया है जो हाल में कम हो गया था—रूस से कच्चे तेल की खरीद. 6 मार्च को अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने 30 दिन की अस्थायी छूट जारी की, जिसमें भारतीय रिफाइनरी कंपनियों को रूस से कच्चा तेल खरीदने की इजाजत दी गई. इसका मकसद ''दुनिया के बाजार में तेल की धार बनाए रखना था.'' वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इस छूट को 'शॉर्ट-टर्म' उपाय बताया और कहा कि इससे मॉस्को को बहुत फायदा नहीं होगा क्योंकि यह सिर्फ समुद्र में फंसे जहाजों पर लागू होगा.

यह कदम भारत के साथ अंतरिम व्यापार करार की ट्रंप की घोषणा के कुछ ही हफ्ते बाद आया है, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि रूस से कच्चे तेल की खरीद रोकने पर भारत सहमत हो गया है. लेकिन ताजा अमेरिकी घोषणा ने भारत में एक बार फिर से राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है.

कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर सरकार का मजाक उड़ाया, और तर्क दिया कि 1.4 अरब लोगों के देश को अपनी ऊर्जा खरीद के लिए वॉशिंगटन की 'मंजूरी' की जरूरत नहीं है.

दिसंबर, 2025 तक भारत के तेल आयात में रूस का हिस्सा 31.5 प्रतिशत था, उसके बाद इराक का 24 फीसदी, सऊदी अरब का 13.8 फीसदी और यूएई का 11.2 प्रतिशत हिस्सा था. केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक इस साल जनवरी तक रूस का हिस्सा घटकर 20.5 प्रतिशत रह गया था. पश्चिम एशिया में जंग से वैश्विक ऊर्जा बाजार में मॉस्को की स्थिति मजबूत हो सकती है.

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पहले ही इशारा कर चुके हैं कि जरूरत पड़ने पर उनका देश यूरोप को तेल और गैस की सप्लाइ करने को तैयार है—लेकिन कुछ शर्तों पर. भारत के लिए फिलहाल स्थिति संभालने लायक बनी हुई है. लेकिन दुनिया के सबसे नाजुक तेल मार्ग में से एक में अगर लंबे समय तक बाधा बरकरार बनी रही तो भारत पर जोखिम का साया मंडरा सकता है.

तेल की कीमतें 8-9 मार्च को कुछ समय के लिए 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई थीं, हालांकि बाद में उनमें थोड़ी नरमी आई. विश्लेषकों का कहना है कि अगर मुश्किलें जारी रहीं, तो कीमतें फिर बढ़ सकती हैं

खाद्य कीमतें ऊंची होने के बावजूद 2025 में भारत की कुल महंगाई काबू में रही. लेकिन ऊर्जा की कीमतें बढ़ने से स्थिति पलट सकती है. 

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