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बुमराह अपने दौर से भी बड़े खिलाड़ी बन चुके हैं. सिर्फ एक दशक में उन्होंने वह कर दिखाया जो क्रिकेट इतिहास में किसी गेंदबाज ने नहीं किया.

25 मार्च 2026 अंक
25 मार्च 2026 अंक

—अरुण पुरी

इस खेल में आम तौर पर सारी शोहरत बल्लेबाज ले जाता है. क्रीज पर खड़े होकर चौतरफा धुआंधार करते हुए उसका अंदाज किसी योद्धा जैसा दिखता है. कैमरे भी उसके खूबसूरत शॉट्स पर फिदा रहते हैं. क्रिकेट का कोई नौसिखुआ भी समझ लेता है कि असल आनंद तो चौकों और छक्कों का ही है. टी20 फॉर्मेट तो जैसे इसी तमाशे के लिए बना है.

छोटी बाउंड्री, फील्डिंग पर खास किस्म की बंदिशें...ये सब एक तरह से बल्लेबाजी का ही इकबाल बुलंद करते हैं. ऐसे माहौल में गेंदबाज अक्सर सिर्फ सहायक भूमिका में ही सिमटकर रह जाते हैं. लेकिन भारत के पास अब इस नियम का एक अनोखा अपवाद है. जसप्रीत बुमरा ऐसे गेंदबाज हैं जो पीढ़ी में शायद एकाध बार ही पैदा होते हैं.

जब वे गेंदबाजी के लिए दौड़ते हैं तो इसका शानदार सबूत लगभग हर बार मिलता है. 8 मार्च को टी20 वर्ल्ड कप फाइनल में भी यही दिखा, जब उन्होंने न्यूजीलैंड की बल्लेबाजी के चारों ओर मानो जादू का घेरा खींच दिया. उस रात भारत ने अपनी आठवीं आइसीसी ट्रॉफी जीती और उसके पीछे कई वजहें थीं.

उनमें लगातार आक्रामकता पर टिकी नई बल्लेबाजी सोच, बड़े हिटर्स की लंबी फौज और राख से उठते फीनिक्स की तरह धधकती फॉर्म में लौटे संजू सैमसन भी शामिल थे. लेकिन इतिहास की नजर हमें कुछ और याद दिलाती है. आज से पहले हमने अपने आवरण पर सिर्फ एक गेंदबाज अनिल कुंबले को जगह दी थी. अब वह वक्त फिर आ गया है.

बुमराह अपने दौर से भी बड़े खिलाड़ी बन चुके हैं. सिर्फ एक दशक में उन्होंने वह कर दिखाया जो क्रिकेट इतिहास में किसी गेंदबाज ने नहीं किया—अपने करिअर के अलग-अलग पड़ावों पर तीनों फॉर्मेट में दुनिया का नंबर एक गेंदबाज बनना. यह उपलब्धि इसलिए और बड़ी है क्योंकि हर फॉर्मेट में गेंदबाज के सामने अलग तरह की चुनौती होती है.

भारतीय कप्तान सूर्यकुमार यादव उन्हें 'एक राष्ट्रीय धरोहर’ कहते हैं. दुनिया भर में उनके साथी खिलाड़ी और उनसे पहले के दिग्गज मानते हैं कि वे सिर्फ आज के क्रिकेट में सबसे ऊपर नहीं खड़े, बल्कि सर्वकालिक महान गेंदबाजों की कतार में भी शामिल हो चुके हैं.

इंग्लैंड के पूर्व तेज गेंदबाज स्टीव फिन कहते हैं, ''बाकी सभी इंसान हैं. अच्छे गेंदबाज होते हैं, महान गेंदबाज होते हैं, और फिर एक होते हैं जसप्रीत बुमरा.’’ उनके हमवतन स्टुअर्ट ब्रॉड तो बुमरा को इतिहास का सबसे महान तेज गेंदबाज मानते हैं. और सिर्फ वही नहीं, डेनिस लिली, ग्लेन मैक्ग्रा, वकार यूनुस, वसीम अकरम, डेल स्टेन और जेम्स एंडरसन जैसे दिग्गज भी उनकी तारीफ में खुलकर बोलते हैं.

ऐसा इसलिए है क्योंकि बुमराह की कला किसी एक फॉर्मेट की सीमाओं में बंधती ही नहीं. टेस्ट क्रिकेट में बल्लेबाज जोखिम से बच सकता है, इसलिए गेंदबाज को उसकी रक्षा पंक्ति में दरार ढूंढ़नी पड़ती है. टी20 में तस्वीर उलट जाती है. वहां गेंदबाज को ही जोखिम कम रखने के लिए मजबूर होना पड़ता है.

लेकिन जब बुमरा अपने छोटे, हिरण जैसे हल्के रन-अप के साथ गेंदबाजी के लिए आते हैं, तो फॉर्मेट की बाकी शर्तें जैसे बेअसर हो जाती हैं. उनकी हर गेंद किसी भटकते हुए हथियार की तरह लगती है, जो अलग-अलग ट्रैजेक्टरी पर जा सकती है. हर गेंद थोड़ी अलग, लेकिन नतीजा अक्सर एक ही: विकेट मिलने की संभावना. उन्हें देखना आंखों और दिमाग, दोनों के लिए सुखद अनुभव है. जैसे कोई शतरंज का ग्रैंडमास्टर एथलीट का रूप धरकर मैदान में उतर आया हो.

आंकड़े इस असल बात को पूरी तरह नहीं पकड़ पाते. वे चाहें तो 150 किमी प्रति घंटे से ऊपर की रफ्तार निकाल सकते हैं, लेकिन उनकी असली तेजी दिमाग की रफ्तार है. उनकी रणनीतिक समझ, मैच के दौरान ही चालें बुनने की क्षमता बल्लेबाजों को पारी शुरू होने से पहले ही मात देने लगती है. फाइनल के बाद उन्होंने कहा था, ''मैंने देखा कि न्यूजीलैंड कैसे गेंदबाजी कर रहा था.

जब आप बहुत तेज गेंदबाजी करने की कोशिश करते हैं, तो शॉट लगाना आसान हो जाता है.’’ इसलिए उन्होंने तय किया कि वे 'रफ्तार बदलते रहेंगे.’ लेकिन इरादा भर काफी नहीं होता, खासकर जब गलती की कोई गुंजाइश न हो. बुमरा के मामले में सटीक कंट्रोल उन्हें उस फॉर्मेट में भी घातक हथियार बना देता है, जो आम तौर पर गेंदबाजों के लिए जाल माना जाता है.

टी20 गेंदबाजी अक्सर नकारात्मक युक्तियों की सीमा तक पहुंच जाती है. लेकिन बुमरा को आप 'लगभग वाइड’ गेंदें फेंकते नहीं देखते. वे ऐसा क्यों करें, जब वे ज्योमेट्री की किताब से निकली हुई सी लगने वाली यॉर्कर फेंक सकते हैं? फाइनल में उन्होंने तीन बार स्टंप उखाड़े. जिस मैच में कुल 414 रन बने और 27 छक्के लगे, उसमें बुमरा ने सिर्फ 15 रन दिए. यानी 3.75 रन प्रति ओवर.

पूरे टूर्नामेंट में, जो टी20 के मानकों से भी ज्यादा 'छक्कों की दावत’ जैसा था, उनकी इकोनॉमी 6.21 रही. 2024 के कप में यह 4.17 थी. लेकिन यह आंकड़ा भी पूरी कहानी नहीं कहता. इसमें विकेटों का एक छुपा हुआ किस्सा भी है. जब बल्लेबाज बुमरा के खिलाफ हर गेंद पर चौकन्ना रहने को मजबूर हो जाता है, तो जोखिम दूसरे छोर पर खिसक जाता है और अक्सर विकेट वहीं गिरता है.

इस हफ्ते की हमारी आवरण कथा आपको उस चमक-दमक के पीछे के इंसान तक ले जाती है: एक ऐसी मां के बेटे तक, जिसने अकेले दम पर परिवार संभाला. अहमदाबाद के साधारण घर में पला-बढ़ा वह शांत लड़का, जिसने शुरुआती दौर में कोचों की यह सलाह नहीं मानी कि अपना ऐक्शन बदल लो. वही युवा स्टार, जिसे चोटों के बावजूद डटे रहना पड़ा. इसी आवरण कथा की दूसरी स्टोरी विश्व विजेता एकादश के दूसरे खिलाड़ियों की कहानी बताती है.

यह भारतीय टीम एक नई सोच के साथ तैयार की गई थी. अब वह पुराना दौर खत्म हो चुका था, जब टीम एक-दो बड़े बल्लेबाजों पर निर्भर रहती थी. उसकी जगह अब ऐसे बल्लेबाजों की लंबी कतार थी, जो नंबर 9 तक लगातार हमला जारी रख सकते थे. यह इंग्लैंड के 'बैजबॉल’ का भारतीय रूप था, जिसकी जड़ें दरअसल 1992 के वनडे वर्ल्ड कप में न्यूजीलैंड की अपनाई गई रणनीति तक जाती हैं.

संयोग देखिए, फाइनल में इस सोच का शिकार न्यूजीलैंड ही बना. कोच गौतम गंभीर ने इसे 'हाइ रिस्क, हाइ रिवॉर्ड’ का तरीका कहा. इस सोच में जान डाली खिलाड़ियों के उस जिंदादिल समूह ने जिसमें ईशान किशन, सूर्यकुमार यादव, संजू सैमसन, अक्षर पटेल और हार्दिक पंड्या जैसे नाम शामिल थे.

इनमें से कई खिलाड़ियों के सामने खुद को साबित करने की चुनौती भी थी. हम बता रहे हैं कि कैसे हर खिलाड़ी ने अपने अंदाज में जवाब दिया, और किस तरह इन सबने मिलकर टीम को उसके हिस्सों के कुल जोड़ से कहीं बड़ा बना दिया.

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