दवा है चमत्कार नहीं
वजन घटाने के लिए इस्तेमाल होने की वजह से जैसे-जैसे नई मेटाबॉलिक दवाओं की बिक्री बढ़ रही है, डॉक्टर आगाह कर रहे कि तराजू का पलड़ा ऊपर उठ जाने भर से सेहत नहीं बनती.

सेहतः मेटाबॉलिक मेडिसिन
तमिलनाडु की राजधानी चेन्नै में लॉजिस्टिक्स मैनेजर, 42 वर्षीय राघवन अय्यर को लगा था कि ओरल सेमाग्लूटाइड उनकी बढ़ते वजन की परेशानी खत्म कर देगा. यह प्रेस्क्रिप्शन दवा टाइप-2 डायबिटीज और वजन बढ़ने को नियंत्रित करने के लिए दी जाती है.
उन्होंने साल भर पहले राइबेलसस शुरू किया. यह उसी दवा परिवार की कम डोज वाली टैबलेट है, जिसमें इंजेक्शन के रूप में चर्चित वजन घटाने वाली दवाएं ओजेंपिक और वेगोवी आती हैं. नतीजे तेजी से दिखे: छह महीने में लगभग 20 किलो वजन कम हो गया. लेकिन तेजी से मांसपेशियां घटने के कारण जोड़ों में दर्द शुरू हो गया. बीच-बीच में जब-तब खाने की इच्छा भी लौट आती थी. वे कहते हैं, ''वजन तो घट गया, लेकिन बेचैनी बनी रहती थी.’’
अय्यर उन हजारों भारतीयों में शामिल हैं जिन्होंने 'मेटाबॉलिक मेडिसिन’ की इस नई लहर का फायदा उठाया है. मेटाबॉलिज्म शरीर में होने वाली वे रासायनिक प्रक्रियाएं हैं, जो हॉर्मोन की मदद से खाने को ऊर्जा में बदलती हैं जिससे शरीर का काम चलता रहता है. इन दवाओं की खासियत यह है कि ये मेटाबॉलिक विकारों—जैसे अत्यधिक वजन, हाइ ब्लड प्रेशर और हाइ ब्लड शुगर—पर सीधे हॉर्मोन स्तर पर असर डालती हैं.
यही समस्याएं आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज में बदल सकती हैं. राइबेलसस, ओजेंपिक, वेगोवी जैसी दवाएं दरअसल पेप्टाइड (जीएलपी-1) रिसेप्टर एगोनिस्ट या सेमाग्लूटाइड की अलग-अलग किस्में हैं. ये दवाएं आंत से जीएलपी-1 हॉर्मोन के स्राव को बढ़ाती हैं. यह हॉर्मोन इंसुलिन के स्राव को ट्रिगर करता है और भोजन के पाचन की रक्रतार धीमी करता है, जिससे भूख कम लगती है.
इसी श्रेणी में एक और दवा है माउनजैरो, जिसमें टिरजेपैटाइड होता है. यह इंजेक्शन के रूप में दी जाती है और जीएलपी-1 के साथ-साथ जीआइपी हॉर्मोन पर भी काम करती है. इसे भी टाइप-2 डायबिटीज और ज्यादा वजन के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है.
इन दवाओं को भले ही जीवन बदल देने वाला बताया जा रहा हो और लोग खुशी-खुशी ऐसी 'मैजिक पिल’ ले रहे हों जिससे मोटापा दूर हो जाता है, लेकिन डॉक्टरों की चिंता बढ़ रही है. उनका कहना है कि 'वजन घटाने की दवा’ से ऐसा लगने लगा है कि एक जटिल और जीवनभर चलने वाली समस्या को बस एक गोली निगलकर खत्म किया जा सकता है.
लेकिन शरीर का जीवविज्ञान इतना सीधा नहीं होता. मुंबई के वॉकहार्ट हॉस्पिटल्स में कंसल्टेंट डायबिटीज और बैरियाट्रिक सर्जन डॉ. रमन गोयल कहते हैं कि स्थायी तौर पर वजन घटाने और बेहतर सेहत के लिए कहीं ज्यादा कुछ किए जाने की दरकार है.
वजन घटाने वाली गोलियों के खतरे
इन दवाओं के बिना सोचे-समझे इस्तेमाल से उबकाई होना, दस्त या कब्ज तो सामान्य शिकायतें हैं. गंभीर जोखिमों में पैंक्रिएटाइटिस, गॉलब्लैडर की बीमारी, गुर्दे को नुक्सान और डायबिटिक रेटिनोपैथी का बढ़ना शामिल है, जिससे आंखों की रोशनी प्रभावित हो सकती है. वेगोवी के अमेरिकी लेबल में अवसाद या आत्महत्या के विचारों की निगरानी की चेतावनी भी दी गई है.
जीएलपी-1 दवाओं से तेजी से वजन घटने पर मांसपेशियों का नुक्सान भी हो सकता है, खासकर जब भूख कम होने की भरपाई पर्याप्त प्रोटीन से न की जाए. मुंबई में 49 साल के एक चार्टर्ड अकाउंटेंट ने आठ महीने से कम समय में 22 किलो वजन घटाया. इसके बाद उन्हें लगातार घुटनों में दर्द और चक्कर आने लगे. उनके डॉक्टर बताते हैं, ''स्कैन में मांसपेशियों की कमी और हड्डियों के घनत्व में शुरुआती गिरावट दिखी.’’
अमेरिका की दवा नियामक संस्था फूड ऐंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) डॉक्टरों को इन दवाओं को लिखने से पहले साफ चेतावनी देती है: अगर मरीज या उसके परिवार में थायरॉयड कैंसर का इतिहास है तो यह दवा सख्त मना है. भारत में इन दवाओं के लिए मोटापा या डायबिटीज की शर्त तो है, लेकिन कोई मानकीकृत चेकलिस्ट नहीं है. बेसलाइन जांच जैसे ब्लड शुगर टेस्ट, हाइ-रिस्क मरीजों की आंखों की जांच, किडनी फंक्शन टेस्ट और पेट की इमेजिंग अलग-अलग क्लिनिक में अलग तरीके से की जाती हैं.
लखनऊ के एक डॉक्टर बताते हैं कि उन पर एक प्रभावशाली राजनैतिक पहुंच वाले मरीज को राइबेलसस लिखने का दबाव डाला गया. जरूरी जांच जैसे गर्दन और पेट का अल्ट्रासाउंड, ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट और आंखों की जांच नहीं हुई. कुछ महीने बाद उस मरीज की नजर धुंधली होने लगी और थायरॉयड बढ़ गया.
अब मामला अदालत में है. डॉक्टर कहते हैं, ''दवा लिखना समस्या नहीं थी. समस्या थी जांच न होना.’’ वे जोड़ते हैं कि भारत के ढीले-ढाले नियामकीय माहौल में डॉक्टर मुश्किल में फंस जाते हैं. एक तरफ मरीज की मांग, दूसरी तरफ संस्थागत दबाव और स्पष्ट प्रोटोकॉल की कमी.
अब विशेषज्ञों को डर है कि वजन घटाने वाली सस्ती जेनरिक दवाएं आने के बाद गोलियां खाने का चलन और बढ़ सकता है. मार्च 2026 में पेटेंट खत्म होने के बाद भारतीय नियामकों ने सेमाग्लूटाइड के जेनरिक संस्करणों को मंजूरी दे दी है. डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज और सन फार्मा जैसी कंपनियां ओजेंपिक और वेगोवी जैसी दवाओं के अपने संस्करण 50 से 60 फीसद कम कीमत पर लॉन्च कर सकती हैं.
मोटापे की बढ़ती मुसीबत
भारत इस समय मेटाबॉलिक हेल्थ संकट के दौर से गुजर रहा है. 2025 के आइसीएमआर-इंडियाबी विश्लेषण के मुताबिक 43.3 फीसद भारतीय वयस्क ऐसे हैं जिन्हें मेटाबॉलिकली ओबेस नॉन-ओबेस (मोनो) कहा जाता है. इन लोगों का बॉडी मास इंडेक्स सामान्य होता है, यानी लंबाई के हिसाब से वजन ठीक दिखता है. लेकिन कमर का घेरा ज्यादा होता है, ब्लड शुगर बढ़ा रहता है, हाइ ब्लड प्रेशर या इंसुलिन रेजिस्टेंस जैसी समस्याएं होती हैं.
इसके अलावा 28.3 फीसद लोग मेटाबॉलिकली ओबेस ओबेस (एमओओ) श्रेणी में आते हैं. इनमें टाइप-2 डायबिटीज का खतरा सबसे ज्यादा होता है. यह वह स्थिति है जब इंसुलिन, जो खून में मौजूद ग्लूकोज को कोशिकाओं तक पहुंचाकर ऊर्जा में बदलता है, ठीक से काम नहीं कर पाता. इससे फैटी लिवर, किडनी और दिल की बीमारियों का जोखिम भी बढ़ जाता है.
भारत की खास मेटाबॉलिक प्रोफाइल इस चुनौती को और जटिल बना देती है. फोर्टिस सी-डॉक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर डायबिटीज, मेटाबॉलिक डिजीज और एंडोक्राइनोलॉजी के चेयरमैन डॉ. अनूप मिश्र कहते हैं कि भारतीयों में मेटाबॉलिक जोखिम कम उम्र में ही शुरू हो जाता है. वे बताते हैं कि सामान्य ग्लूकोज स्तर से डायबिटीज तक पहुंचने की रफ्तार पश्चिमी देशों के मुकाबले लगभग दोगुनी है.
यही हालात मेटाबॉलिक दवाओं की तेज रफ्तार बढ़त की वजह बने हैं. डॉ. मिश्र कहते हैं, ''मेटाबॉलिक मेडिसिन भारत में चर्चा का विषय इसलिए बनी है क्योंकि असली वैज्ञानिक प्रगति—खासकर जीएलपी-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट दवाएं और लगातार ग्लूकोज मॉनिटरिंग—के साथ व्यावसायिक प्रचार, सोशल मीडिया और स्वास्थ्य चिंता एक साथ आ गई हैं.’’
फार्मा कंपनी एली लिली की दवा माउनजैरो ने अकेले अक्तूबर 2025 में 100 करोड़ रुपए की बिक्री दर्ज की. इसके बाद नोवो नॉर्डिस्क ने दिसंबर 2025 में ओजेंपिक लॉन्च किया, जो मुख्य रूप से डायबिटीज के लिए लिखी जाती है, और अपनी मोटापा रोधी दवा वेगोवी की कीमत भी घटाई. राइबेलसस की बिक्री भी तेजी से बढ़ी है. तीन साल पहले लॉन्च के एक साल के भीतर इसकी बिक्री 47 करोड़ रुपए से बढ़कर 363 करोड़ रुपए तक पहुंच गई थी.
आने वाले समय में और नई दवाएं बाजार में उतर सकती हैं. एली लिली की एक बहुप्रतीक्षित दवा ऑरफॉर्गलिप्रॉन है, जो डायबिटीज और वजन घटाने के लिए बनाई जा रही है. मौजूदा सेमाग्लूटाइड या जीएलपी-1 दवाएं इंजेक्शन के रूप में दी जाती हैं, लेकिन यह पूरी तरह ओरल दवा होगी. अगर इसे मंजूरी मिलती है तो भारत में इसका बड़ा बाजार हो सकता है.
दवा कंपनियां अब ट्रिपल-हॉर्मोन एगोनिस्ट पर भी काम कर रही हैं, जो एक साथ जीएलपी-1, जीआइपी और ग्लूकागॉन पर असर डालती हैं. ग्लूकागॉन वह हॉर्मोन है जो खून में ग्लूकोज स्तर बढ़ाकर ऊर्जा संतुलन बनाए रखता है. ऐसी दवाएं तेजी से चर्बी घटाने और दिल तथा मेटाबॉलिक स्वास्थ्य के संकेतकों में बेहतर सुधार का दावा करती हैं. इसी श्रेणी की एक दवा रेटाट्रूटाइड है, जिसने ट्रायल में औसतन 23 फीसद से ज्यादा वजन घटाने के नतीजे दिखाए हैं.
सिर्फ गोली काफी नहीं
इन तथाकथित 'वजन घटाने वाली दवाओं’ से पैदा हो सकने वाले स्वास्थ्य संकट ने डॉक्टरों को दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया है. पुणे के मणिपाल हॉस्पिटल में इंटरनल मेडिसिन के प्रमुख डॉ. प्रसाद बिवरे कहते हैं, ''अब हम मेटाबॉलिक बीमारी को शरीर की ऊर्जा नियंत्रित करने वाली प्रणाली में गड़बड़ी के रूप में समझते हैं. इंसुलिन जैसे हॉर्मोन तय करते हैं कि शरीर ईंधन यानी भोजन को कैसे संभाले. भीतर की सूजन इंसुलिन रेजिस्टेंस और नसों से जुड़ी बीमारियों की ओर धकेलती है. आप एक स्तंभ ठीक करके बाकी को नजरअंदाज नहीं कर सकते.’’
डॉक्टरों का जोर है कि लंबे समय तक वजन स्थिर रखने के लिए सिर्फ भूख कम करना काफी नहीं. संतुलित और योजनाबद्ध पोषण, पर्याप्त प्रोटीन, रेजिस्टेंस ट्रेनिंग, नियमित नींद, इलेक्ट्रोलाइट और किडनी की निगरानी, ये सब उतने ही जरूरी हैं. एक और बड़ा सवाल है: दवा बंद करने के बाद क्या होगा? ज्यादातर मरीजों को एग्जिट या मेंटेनेंस प्लान के बारे में सही सलाह नहीं दी जाती. इससे वजन दोबारा बढ़ने का खतरा और उसके साथ भावनात्मक तनाव भी बढ़ सकता है.
इसी वजह से अब मनोचिकित्सा मेटाबॉलिक मेडिसिन का अहम हिस्सा बनती जा रही है. नई दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल में मेंटल हेल्थ और बिहेवियरल साइंसेज विभाग के प्रमुख डॉ. समीर मल्होत्रा आगाह करते हैं कि शरीर में तेजी से बदलाव भावनात्मक अस्थिरता पैदा कर सकता है. वजन फिर बढ़ने का डर या दवा पर मानसिक निर्भरता विकसित हो सकती है.
फोर्टिस एस्कॉर्ट्स, नई दिल्ली की मनोचिकित्सक डॉ. पल्लवी शर्मा कहती हैं, ''सीबीटी-ई (कॉग्निटिव बिहेवियर थेरैपी फॉर ईटिंग डिसऑर्डर्स) मरीजों को खाने के पैटर्न सामान्य करने, भावनात्मक ट्रिगर संभालने और वजन बढ़ने के डर से निबटने में मदद करती है.’’ लिहाजा ऐसी दवा शुरू करने से पहले मनोवैज्ञानिक आकलन जरूरी है.
पोषण अब भी बुनियाद है. मैक्स साकेत की क्लिनिकल न्यूट्रिशनिस्ट कल्पना गुप्ता कहती हैं, ''मरीज बहुत कम प्रोटीन लेते हैं और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट ज्यादा खाते हैं.’’ चूंकि जीएलपी-1 दवाएं भूख को तेजी से दबाती हैं, इसलिए निगरानी में पोषण जरूरी है, वरना मांसपेशियों की कमी, थकान और माइक्रोन्यूट्रिएंट की कमी हो सकती है. डॉ. बिवरे कहते हैं कि भारत में यह बात और अहम हो जाती है.
''हमारे खाने में रिफाइंड अनाज और चीनी ज्यादा है, जो ग्लाइसेमिक लोड बढ़ाते हैं और मेटाबॉलिक सुधार को मुश्किल बनाते हैं. छोटे लेकिन सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य बदलाव—जैसे मोटे अनाज, दालें, संतुलित थाली जिसमें पर्याप्त प्रोटीन और हेल्दी चिकनाई हो—ब्लड शुगर की तेज बढ़त को कम कर सकते हैं.’’
डॉ. अनूप मिश्र चेताते हैं, ''ज्यादा वजन वाले हर आदमी को जीएलपी-1 दवा की जरूरत नहीं है. इलाज का फैसला क्लिनिकल मानकों और काॢडयोमेटाबॉलिक जोखिम के आधार पर होना चाहिए.’’ कुल मिलाकर संदेश साफ है: मेटाबॉलिक दवाएं असरदार हैं लेकिन तभी जब उन्हें पूरे शरीर को ध्यान में रखकर, लंबी अवधि की रणनीति के हिस्से के रूप में इस्तेमाल किया जाए. सिर्फ एक शॉर्टकट या खाने की आदतों से बचने का आसान रास्ता समझदारी का नहीं.
हर ज्यादा वजन वाले व्यक्ति को जीएलपी-1 दवा की जरूरत नहीं. इलाज का फैसला क्लिनिकल मानकों और कार्डियोमेटाबॉलिक जोखिम के आधार पर होना चाहिए.