और फंस गए मतदाता
तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव सिर पर. उधर चुनाव आयोग की मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया और फिर मामला अदालत में पहुंच जाने के चलते लाखों मतदाताओं के नाम अधर में

भारत के निर्वाचन आयोग ने चार महीने तक चली विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) की कड़ी प्रक्रिया के बाद 28 फरवरी को पश्चिम बंगाल की संशोधित मतदाता सूची प्रकाशित कर दी. मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) मनोज कुमार अग्रवाल ने एसआइआर के बाद मतदाताओं की संख्या 7.04 करोड़ बताई, जो प्रक्रिया शुरू होने से पहले की 7.66 करोड़ की तुलना में 8.06 फीसद कम है.
इसमें से करीब 61.8 लाख नाम हटाए गए हैं (देखें: भेंट चढ़े छंटनी की). लेकिन सबसे बड़ी बात है कि करीब 60 लाख अन्य मतदाताओं को 'विचाराधीन' श्रेणी में रखा गया है, जिनके मताधिकार न्यायिक अधिकारियों की तरफ से उनकी किस्मत का फैसला किए जाने तक स्थगित रहेंगे. चुनाव के नियमों के तहत लोकसभा या विधानसभा चुनावों में नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि से 10 दिन पहले राज्य की मतदाता सूची को फ्रीज कर दिया जाता है.
इसका मतलब है कि आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में केवल उन्हीं मतदाताओं को वोट देने का अधिकार होगा जिनके मामले निर्धारित समयसीमा से पहले निबटा दिए जाएंगे. न्यायिक अधिकारी (अब तक 630 अधिकारी नियुक्त किए गए हैं) कितनी जल्दी इन मामलों को निबटाते है, अंतत: चुनावी परिदृश्य उसी पर निर्भर करेगा.
पश्चिम बंगाल की एसआइआर प्रक्रिया विशाल जनसांख्यिकी और संरचना के कारण राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रही. एक और खास बात यह रही कि इसकी अंतिम मतदाता सूची विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने से कुछ ही सप्ताह पहले सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जारी की गई. 'विचाराधीन' मतदाताओं को मुख्यत: चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ने 'तार्किक विसंगतियों' या 2002 की पुरानी मतदाता सूचियों से 'असंबद्ध' होने की वजह से चिह्नित किया था.
मसौदा सूची आने के बाद प्रशासन ने करीब 1.36 करोड़ मतदाताओं को 'तार्किक विसंगतियों' के आधार पर नोटिस भेजे और 32 लाख 'असंबद्ध' मतदाताओं को समन भेजा. तार्किक विसंगतियों में वर्तनी अलग होना, आयु/संबंधों का मिलान न हो पाना और अन्य कारण शामिल थे जो पुराने डिजिटलीकरण की त्रुटियों, प्रवासन या अन्य घटनाक्रम (विवाह के बाद महिलाओं के निवास/उपनाम बदलने जैसे कारणों) का नतीजा हो सकते हैं. 'असंबद्ध' टैग एसआइआर में 2002-04 की पुरानी गहन-संशोधित सूचियों में शामिल प्रविष्टियों पर जोर दिए जाने के कारण लगा है. अंतत: 28 फरवरी को यह संख्या घटकर 60 लाख से थोड़ी ज्यादा रह गई.
कानूनी लड़ाई
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर बंगाल को जानबूझकर 'निशाना बनाने' और एसआइआर के नाम पर वैध मतदाताओं, खासकर महिलाओं तथा अल्पसंख्यकों के नाम
सूची से हटाने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट से दखल की गुहार लगाई. उन्होंने मुर्शिदाबाद (11 लाख मामले) और मालदा (करीब 8,28,000) जैसे मुस्लिम बहुल जिलों का हवाला दिया, जहां 'तार्किक विसंगतियां' सबसे ज्यादा सामने आई थीं. इससे पहले, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में यह आरोप लगाते हुए याचिका दायर की कि चुनाव आयोग की तरफ से 8,000 से ज्यादा 'माइक्रो ऑब्जर्वर' तैनात किया जाना एक सियासी साजिश है.
यह ऑब्जर्वर मुख्यत: भाजपा शासित राज्यों से बुलाए गए थे और उन्हें राज्य के वैधानिक मतदाता पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) के निर्णयों को पलटने का अधिकार दिया गया था. बतौर मिसाल उन्होंने इस बात का जिक्र भी किया कि उनके अपने निर्वाचन क्षेत्र भवानीपुर में 47,000 से ज्यादा मतदाताओं के नाम काटे गए हैं.
उन्होंने तर्क दिया कि एसआइआर प्रक्रिया असल में नागरिकता/पहचान की छानबीन में तब्दील हो रही है, जिसे कठोर दस्तावेजी साक्ष्यों और कंप्यूटर एल्गोरिदम के जरिए अंजाम दिया जा रहा है. वहीं, चुनाव आयोग ने दावा किया कि माइक्रो ऑब्जर्वर इसलिए तैनात किए गए क्योंकि राज्य सरकार पर्याप्त कर्मचारी उपलब्ध कराने में विफल रही.
राज्य और चुनाव आयोग के बीच गंभीर 'अविश्वास' देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक असाधारण कदम उठाया और विचाराधीन प्रक्रिया का नियंत्रण न्यायपालिका को सौंप दिया. पश्चिम बंगाल, झारखंड और ओडिशा के 500 से ज्यादा सेवारत और सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को आधार और राशन कार्ड जैसे दस्तावेजों के सत्यापन के लिए तैनात किया गया ताकि 60 लाख लंबित मतदाताओं की किस्मत का फैसला किया जा सके. अब जिन लोगों के नाम का सत्यापन हो जाएगा, उन्हें नामांकन से पहले प्रकाशित होने वाली निरंतर पूरक मतदाता सूचियों के माध्यम से वोट देने का हक मिल जाएगा.
चुनाव आयोग के सूत्रों का कहना है कि 'संदिग्ध' मतदाताओं में एक बड़ा हिस्सा अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों का हो सकता है. असम में ऐसे हजारों 'डी' वोटर्स को 1997 से मतदान से वंचित किया जा चुका है. उनके मामले विदेशी न्यायाधिकरणों (एफटी) में वर्षों से लंबित हैं. मतदान का अधिकार केवल नागरिकता की पुष्टि होने पर ही बहाल किया जाता है; जिन लोगों को विदेशी घोषित किया जाता है, उन्हें हिरासत और निर्वासन की कार्यवाही का सामना करना पड़ता है. पश्चिम बंगाल के लिए नियुक्त न्यायिक अधिकारी अब एसआइआर ढांचे के तहत ऐसी ही जांच करेंगे, जो मतदान का अधिकार बहाल करने से पहले नागरिकता का सत्यापन करके एक तरह से एफटी की तरह ही कार्य करेंगे.
बिहार में शुरुआत
एसआइआर प्रक्रिया का पहला चरण 24 जून, 2025 को बिहार में शुरू हुआ था और इस वर्ष अप्रैल से पूरे देश में विस्तारित होने वाला है, जो तीसरे चरण की शुरुआत होगी. राज्य में मतदाताओं की संख्या 7.89 करोड़ से घटकर लगभग 7.42 करोड़ हो गई है, यानी कुल 47 लाख नाम हटाए गए हैं. 4 नवंबर 2025 से एसआइआर प्रक्रिया का दूसरा चरण नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में शुरू हुआ, जिनमें चुनाव वाले पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल शामिल हैं. चुनावी राज्य असम में विशेष गहन पुनरीक्षण के बजाय विशेष पुनरीक्षण (एसआर) कराया गया क्योंकि राज्य में 2019 में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) प्रक्रिया पहले हो चुकी थी, जिसकी फिलहाल न्यायिक जांच जारी है.
चुनाव आयोग ने तर्क दिया कि प्रशासनिक व्यवस्था को दुरुस्त किया जाना है. इसका उद्देश्य 'फर्जी मतदाताओं' (मृत, दूसरी जगह जाकर बसे और डुप्लिकेट प्रविष्टियों) को हटाकर मतदाता सूची साफ-सुथरी करना और तार्किक विसंगतियां दूर करना था. भारत में 2002-04 के बाद से घर-घर जाकर मतदाता सूची का संशोधन नहीं हुआ था.
भरोसे का अभाव
आलोचकों और विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रक्रिया परोक्ष रूप से 'नागरिकता पहचान' है. सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग को आड़े हाथ लिया कि उसने साक्ष्यों को साबित करने का बोझ नागरिकों पर डाल दिया है और कठोर एल्गोरिदम फिल्टर इस्तेमाल किया जा रहा है. इससे ग्रामीण और वंचित तबके के मतदाताओं को उम्र में मामूली अंतर या वर्तनी की गलतियों जैसे स्वाभाविक डेटा भिन्नता का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. लंबे समय से मतदान करते आ रहे मतदाताओं को अचानक 2002 के दस्तावेज पेश करने पड़े वरना उनके नाम सूची से बाहर हो जाते. शादी के बाद नाम बदलने वाली महिलाएं, प्रवासी श्रमिक, गरीब और अल्पसंख्यक इससे सबसे ज्यादा परेशान हुए. कुछ खास जिलों में बड़ी संख्या में 'विचाराधीन' मामले सामने आने और प्रवासियों/अल्पसंख्यकों से जुड़ी चर्चाओं ने इन आरोपों को और हवा दी कि मतदाता सूची में संशोधन को पक्षपातपूर्ण तरीके से चुनाव को प्रभावित करने का हथियार बनाया जा रहा है.
अपनी ओर से चुनाव आयोग ने कहा कि हर नाम हटाने की प्रक्रिया वैधानिक नोटिस और सुनवाई के बाद ही की; पार्टियों को बूथ-वार डेटा मुहैया कराया; सुप्रीम कोर्ट ने खुद भी प्रक्रिया का समर्थन किया और पारदर्शिता और पहुंच सुनिश्चित करने के लिए मामूली बदलाव किए. बिहार में नाम हटाने के खिलाफ एक भी अपील नहीं आई. यहां तक कि राज्य के चुनावी अनुभव ने मतदाताओं के नाम हटाने की बात गलत साबित कर दी. मतदाता सूची में 4.6 फीसद की कमी के बावजूद विधानसभा चुनाव में मतदान फीसद 2024 के लोकसभा चुनावों की तुलना में बढ़ा. इससे पता चलता है कि कई नाम सक्रिय मतदाताओं के बजाय मृत, डुप्लिकेट या स्थायी रूप से दूसरी जगह रहने चले गए मतदाताओं के थे.
भेंट चढ़े छंटनी की
एसआइआर के बाद किस तरह से प्रमुख राज्यों के लाखों मतदाता गायब हो गए सूची से
चुनाव आयोग का दावा है कि तमिलनाडु और गुजरात जैसे राज्यों में नाम हटाने की ऊंची दर उन अस्थायी प्रवासी श्रमिकों को हटाने को दर्शाती है जिन्होंने अपनी निवास संबंधी जानकारी अपडेट नहीं की थी. पश्चिम बंगाल जैसे सीमावर्ती राज्यों में चुनाव आयोग ने दावा किया कि वर्षों से जारी जनसांख्यिकीय बदलाव और अवैध आप्रवासन को दुरुस्त करने के लिए यह प्रक्रिया जरूरी थी. साथ ही, इस बात पर पूरा जोर दिया कि किसी भी स्थिति में 'कोई भी पात्र नागरिक' नहीं छूटेगा.
मृत और डुप्लिकेट मतदाताओं से भरी दो दशक पुरानी मतदाता सूचियां साफ-सुधरी बनाने का चुनाव आयोग का प्रयास उचित ही था. बिहार जैसे राज्यों में इस प्रक्रिया से स्पष्ट हुआ कि मतदाता सूची को छांटने से चुनावी भागीदारी कमजोर नहीं होती. बहरहाल, इस पर अमल के दौरान कुछ खामियां भी सामने आईं: एल्गॉरिदम फिल्टर ने कुछ मामलों में सामान्य जनसांख्यिकीय अंतर को संदिग्ध माना, और केंद्रीकृत निगरानी ने भरोसे को कमजोर किया. यही वजह है कि पश्चिम बंगाल में संकट की स्थिति उपजी जिसे सुलझाने के लिए न्यायिक निगरानी की जरूरत पड़ी.