प्रधान संपादक की कलम से
1989 से सत्ता में रहे खामेनेई ईरान की राजनीति, विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति का सबसे निर्णायक चेहरा थे और वैश्विक शिया समुदाय के भी प्रमुख धार्मिक नेताओं में गिने जाते थे.

- अरूण पुरी
जब पिछले जून में अमेरिका-इज्राएल और ईरान के बीच मिसाइलें चलनी बंद हुई थीं, तब इंडिया टुडे ने अपने कवर पर इसे 'असहज युद्धविराम' कहा था और अनुमान लगाया था कि फिर टकराव होगा. बारह दिन का युद्ध उन सवालों को हल नहीं कर पाया था जिनसे यह संघर्ष शुरू हुआ था. जाहिरा वजह ईरान के एटमी हथियार बनाने के करीब पहुंचने की आशंका बताई गई थी.
लेकिन सच पूछिए तो यह पश्चिम एशिया में शक्ति और प्रभुत्व की लड़ाई थी. इसी वजह से दूसरा युद्ध तय-सा था. यह 28 फरवरी को शुरू हुआ. उससे पहले हफ्तों तक अमेरिकी सेना की भारी तैनाती और अंतिम दौर की बातचीत चलती रही. बातचीत से उम्मीदें बन रही थीं लेकिन अचानक तेहरान पर हमला हो गया.
इसी हमले में 86 वर्षीय सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई की हत्या कर दी गई. 1989 से सत्ता में रहे खामेनेई ईरान की राजनीति, विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति का सबसे निर्णायक चेहरा थे और वैश्विक शिया समुदाय के भी प्रमुख धार्मिक नेताओं में गिने जाते थे. उनकी हत्या के बाद एक ऐसा संघर्ष, जो पहले रणनीतिक गुणा-गणित से प्रेरित था, धार्मिक रंग भी लेने लगा.
तुरंत तीन बड़े सवाल उठते हैं: युद्ध कितने समय तक चलेगा? इसके असली लक्ष्य क्या हैं? और इसका भारत पर क्या असर होगा? इन तीनों का जवाब साफ नहीं है. लिहाजा, फिलहाल हम सिर्फ उन अनिश्चितताओं और संभावनाओं को समझने की कोशिश कर सकते हैं जो इस समय की स्थिति को परिभाषित करती हैं.
पहले युद्ध की अवधि. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चाहते थे कि यह हमला तेज और सीमित हो, कुछ वैसा जैसा वेनेजुएला में हुआ था, जहां निकोलस मादुरो को महज महज 150 मिनट में अगवा कर लिया गया. अनुमान था कि अगर ईरान का शीर्ष नेतृत्व हटा दिया जाए तो पूरी व्यवस्था जल्दी ढह जाएगी और असंतुष्ट जनता बाकी काम कर देगी. लेकिन यह आकलन गलत साबित हुआ.
उसने ईरानी राज्य की मजबूती और तैयारी को कम करके आंका था. ईरान ऐसे हालात के लिए पहले से तैयार था. खामेनेई ने सत्ता संरचना में कई स्तर की उत्तराधिकार व्यवस्था बना रखी थी: धार्मिक नेतृत्व, सेना और राजनैतिक ढांचे के लिए चार स्तर तक. यानी अगर एक नेता हटे तो तुरंत दूसरा उसकी जगह ले सके. इसीलिए जिस तेज पतन की उम्मीद की जा रही थी, वह पूरी तरह गलत साबित हुई.
पश्चिम के रणनीतिक लक्ष्य काफी हद तक साफ थे. दो साल से ट्रंप के सहयोगी और इज्राएल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, अकेले या साझेदारी में, ईरान के 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ के अहम ठिकानों को एक-एक कर निशाना बना रहे थे. अलग-अलग स्तर पर सफलता भी मिली—पहले हमास, फिर लेबनान में हिज्बुल्लाह और उसके बाद सीरिया. अंतिम लक्ष्य ईरान को अस्थिर करना था.
मौका उस वक्त मिला जब कड़े प्रतिबंधों के बोझ से ईरानी अर्थव्यवस्था कराहने लगी और दिसंबर-जनवरी में देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. इन्हें कठोरता से दबा दिया गया. 'सांप का सिर काटने’ की रणनीति से जनता का विद्रोह नहीं हुआ. इसके बजाए ईरान ने लंबी और थकाने वाली जंग शुरू कर दी. निशाने पर इज्राएल और अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं. होरमुज जलडमरूमध्य को भी जकड़ने की कोशिश की जा रही है.
यह संकरा समुद्री रास्ता दुनिया के करीब 20 फीसद तेल की आपूर्ति का मार्ग है. इसलिए यहां किसी भी रुकावट का असर वैश्विक स्तर पर महसूस होता है. वॉशिंगटन स्थित ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की वरिष्ठ फेलो स्टेफनी टी. विलियक्वस कहती हैं, ''हमने मधुमक्खी का छत्ता छेड़ दिया है.’’
वे इसे ''अनपेक्षित परिणामों के नियम’’ की मिसाल बताती हैं. अमेरिका और इज्राएल की उम्मीद है कि वे ईरान की सैन्य क्षमता को इस हद तक कमजोर कर देंगे कि वह युद्ध जारी न रख सके. लेकिन एक बड़ा सवाल अब भी अनिश्चित है—ईरान के पास कितनी मिसाइलें हैं.
इस युद्ध के उद्देश्य भी विवादित हैं. अमेरिका इसे एटमी हथियार से लैस ईरान को रोकने की जरूरी कार्रवाई बताता है. आलोचक कहते हैं कि ईरान के फौरन एटमी हथियार बना डालने का अंदेशा दशकों से जताया जा रहा है लेकिन इसका कोई ठोस प्रमाण कभी सामने नहीं आया. बाद में लक्ष्य 'सत्ता परिवर्तन’ बताया जाने लगा. असल वजह शायद भू-राजनीतिक है.
यह भी संभव है कि ईरान के कमजोर पड़ने के बाद इज्राएल क्षेत्रीय महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा रखता हो. कुछ नेताओं के निजी कारण भी युद्ध के फैसलों के पीछे हो सकते हैं. ट्रंप के लिए यह एप्स्टीन फाइल्स से ध्यान हटाने का एक ''वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रैक्शन’’ बन सकता है.
वहीं नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हैं और इसी साल चुनाव भी होने हैं. यह संघर्ष दूसरी शक्तियों की महत्वाकांक्षाओं से भी जुड़ता है. ईरान रूस और चीन के उभरते रणनीतिक गठजोड़ की अहम कड़ी है. अगर ईरान कमजोर होता है तो रूस की दक्षिणी सुरक्षा व्यवस्था जटिल हो सकती है और चीन की ऊर्जा आपूर्ति भी खतरे में पड़ सकती है.
भारत के लिए इसके असर फौरी और जटिल हैं. भारत इस पूरे क्षेत्र के लगभग सभी प्रमुख पक्षों के साथ कामकाजी रिश्ते बनाए रखता है. अब यही कूटनीतिक संतुलन बड़ी परीक्षा से गुजरने वाला है. पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा जरूरतों का मुख्य स्रोत है. देश के करीब 60 फीसद कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति इसी क्षेत्र से आती है.
अगर ऊर्जा आपूर्ति लंबे समय तक बाधित होती है तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ सकता है. इसी वजह से भारत को उन विकल्पों पर फिर विचार करना पड़ रहा है जिनसे वह हाल ही दूर जाने लगा था. इस संकट का एक मानवीय पहलू भी है. पिछले वित्त वर्ष में खाड़ी देशों से आने वाली रेमिटेंस 51.5 अरब डॉलर तक पहुंच गई थी, जो भारत के जीडीपी का करीब 1.5 फीसद है.
इस आंकड़े के पीछे उस भारतीय प्रवासी समुदाय की मेहनत है जिसमें करीब एक करोड़ लोग पूरे खाड़ी क्षेत्र में रहकर काम कर रहे हैं. अगर संघर्ष बढ़ता है और शहरों पर ड्रोन हमलों का खतरा बढ़ता है तो इन लोगों की सुरक्षा और रोजगार बड़ा सवाल बन जाएगा. हमारी कवर स्टोरी में ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा इस पूरे संघर्ष का विस्तार से विश्लेषण करते हैं.
उन्होंने 1989 में खुमैनी से खामेनेई के सत्ता हस्तांतरण को भी मौके पर कवर किया था. अब वे इस युद्ध के भू-राजनीतिक कारणों और संभावित दिशा पर नजर डाल रहे हैं. यह युद्ध जिस भी दिशा में आगे बढ़े, उसका असर पूरे क्षेत्र से कहीं आगे तक महसूस किया जाएगा.
फिलहाल दुनिया चिंता के साथ देख रही है कि भारत के सबसे पुराने सभ्यतागत पड़ोसियों में से एक देश गहरे संकट से गुजर रहा है—एक ऐसा संकट जो शायद परिवर्तनकारी साबित हो सकता है.