आग और अहिंसा के बीच
विभाजन को लेकर गांधी पर समय-समय पर अनेक आरोप लगाए जाते रहे हैं; ऐसे में यह कृति उनके कथनों, समकालीन घटनाओं और उपलब्ध तथ्यों को एकसाथ रखकर यह पुस्तक पाठकों को स्वयं विचार करने का अवसर देती है

- प्रवीण झा
गांधी का सैंतालीस एक महत्वपूर्ण माइक्रोहिस्ट्री है, जो 1947-48 के उन निर्णायक वर्षों पर केंद्रित है जब विभाजन की त्रासदी से भारत गुजर रहा था. यह पुस्तक इस प्रश्न की गहराई से पड़ताल करती है कि उस उथलपुथल भरे समय में गांधी कहां थे, क्या कर रहे थे, और देश में फैल रही सांप्रदायिक हिंसा तथा राजनीतिक खींचतान के बीच उनकी वास्तविक भूमिका क्या थी.
विभाजन को लेकर गांधी पर समय-समय पर अनेक आरोप लगाए जाते रहे हैं; ऐसे में यह कृति उनके कथनों, समकालीन घटनाओं और उपलब्ध तथ्यों को एकसाथ रखकर पाठक को स्वयं विचार करने का अवसर देती है.
पुस्तक की यात्रा नोआखली से आरंभ होती है, जहां सांप्रदायिक हिंसा ने भयावह रूप ले लिया था. वहां से यह बिहार, कलकत्ता और अंतत: दिल्ली तक पहुंचती है, जहां गांधी की हत्या के साथ कथा का समापन होता है. देखने में यह केवल दो वर्षों की कहानी है, लेकिन इन दो वर्षों में इतिहास का भीषण मंथन समाया हुआ है. विभाजन के घाव, अविश्वास का वातावरण और मानवता को झकझोर देने वाली घटनाएं, सब कुछ यहां दर्ज हैं.
लेखक पुष्यमित्र ने घटनाओं को बिना पूर्वग्रह लगभग एक पत्रकार के रिपोर्ताज की तरह प्रस्तुत किया है. कहीं-कहीं पाठक स्वयं को गांधी से असहमत पाता है, तो कहीं उनके नैतिक साहस और अडिग प्रतिबद्धता से प्रभावित होता है. सांप्रदायिक दंगों का दोतरफा वीभत्स रूप पुस्तक में स्पष्ट दिखाई देता है, जिससे यह लेखन अत्यंत गंभीर और परिपक्व बन जाता है.
इस पुस्तक को पढ़ते हुए गांधी किसी मिथकीय महामानव की तरह नहीं, बल्कि परिस्थितियों से जूझते एक संवेदनशील मनुष्य के रूप में सामने आते हैं, जो अपनी सीमाओं और त्रुटियों के बावजूद समाधान खोजने का सतत प्रयास करता है, अपने जीवन के अंतिम क्षण तक.
पुस्तक इस प्रश्न पर विचार करती है कि 1947-48 के दौरान गांधी कहां थे, क्या कर रहे थे और देश में फैली सांप्रदायिक हिंसा और खींचतान के बीच उनकी वास्तविक भूमिका क्या थी.
पुस्तक का नाम: गांधी का सैंतालीस
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम
लेखक: पुष्यमित्र
प्रकाशन: राजकमल प्रकाशन
कीमत: 450 रुपए
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