कुछ यूं छिड़ता है राग नया
स्वानंद किरकिरे बता रहे हैं कि उन्होंने साथी संगीतकार अंकुर तिवारी के साथ मिलकर किस तरह से रची अपनी पहली सीरीज बैंडवाले.

- करिश्मा उपाध्याय
बहुमुखी प्रतिभा के धनी अंकुर तिवारी और स्वानंद किरकिरे ने जब साथ काम करने का फैसला किया, तो इरादा कुछ ऐसा करने का था जो दोनों ने पहले न किया हो. स्वानंद कहते हैं, ''हम लंबी कहानी लिखना चाहते थे. हम दोनों संगीतकार हैं, सो संगीत को हमारी इस रचना का अभिन्न हिस्सा होना ही था.’’ नतीजा अमेजन प्राइम वीडियो पर बैंडवाले की शक्ल में सामने आया है, जो मध्य प्रदेश के शहर रतलाम की पृष्ठभूमि में रची गई म्यूजिकल सीरीज है.
इसमें एक युवा कवयित्री की खुद की खोज और आजादी का सफर दिखाया गया है. अक्षत वर्मा के निर्देशन में बनी यह सीरीज शालिनी पांडे, जहान कपूर और आशीष विद्यार्थी की अदाकारी से सजी है. ब्रास बैंड के गायक रोबो कुमार के किरदार में स्वानंद ने दोहरी जिम्मेदारी निभाई है.
इन दोनों ने पहली बार 2016 में साथ काम किया जब अंकुर यशराज फिल्म्स के लिए शॉर्ट फिल्मों की शृंखला का निर्देशन कर रहे थे. फिर दोनों अपने विचार और कहानियां साझा करने लगे. स्वानंद बताते हैं, ''हम दोनों ही छोटे शहरों से हैं—वे रुड़की से और मैं इंदौर से. वैसे परवरिश और असरात को देखते हुए अंकुर और मैं इंसान के तौर पर बहुत अलग हैं. यह शो हम दोनों की झलक है.’’ बैंडवाले पर काम कोविड से पहले शुरू हुआ और महामारी के खत्म होते-होते इसने जूम पर राइटिंग सेशन के साथ जोर पकड़ा.
सर्वश्रेष्ठ गीत के लिए दो बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने वाले स्वानंद लंबी कहानी लिखने की प्रक्रिया को 'विनम्र बनाने वाली और रोमांचकारी’ बताते हैं. ''गीतकार होने के नाते मैं कुछ पंक्तियां लिखने का तो अभ्यस्त था पर यह शो उपन्यास लिखने की तरह था, जिसमें आपको कई किरदारों और उनके उतार-चढ़ाव पर नजर रखनी होती है.’’ इसकी सबसे बड़ी चुनौती थी ''स्क्रीनप्ले को दमदार बनाए रखना, यानी रफ्तार सही होनी चाहिए और हर दृश्य कहानी को आगे बढ़ाए.’’
अब चूंकि वे शो के रचयिता भी हैं और मुख्य किरदारों में से एक भी, ऐसे में दोनों को एक साथ साधना मुश्किल होता था. वे कहते हैं, ''मैंने खुद को कड़ी हिदायत दी थी कि सेट पर मैं केवल अभिनेता हूं, और अक्षत की बात आखिरी होगी.’’ सिद्धांतत: तो यह कारगर रहा पर स्वानंद को जल्द पता चल गया कि जब वे सेट पर होते हुए यह कितना मुश्किल था. वे कहते हैं, ''मेरा ध्यान हमेशा अभिनेता के तौर पर अपने काम के साथ ही दूसरे अभिनेता हमारे हाथों रचे किरदारों के साथ क्या कर रहे हैं, उस पर नजर रखने के बीच बंटा रहता था.’’
रोबो का किरदार गढ़ने की प्रेरणा 55 वर्षीय स्वानंद को इंदौर में अपने बड़े होने के दौरान मिलने वाले लोगों से मिली. वे बताते हैं, ''ये वे लोग हैं जो सिनेमा से इस कदर प्रभावित हैं कि हकीकत पर उनकी पकड़ ढीली पड़ गई है. एक शख्स तो ऐसे थे जिन्हें लगता था कि संजय दत्त उनका बड़ा भाई है.’’ रोबो शायद स्वानंद के निभाए किरदारों में सबसे ज्यादा भ्रामक (फिर भी प्यारा) है. वे कहते हैं, ''यह लिखने और निभाने दोनों लिहाज से मुश्किल किरदार है क्योंकि वह बहुत आसानी से हास्यास्पद हो सकता था. हमें बहुत महीन लकीर पर चलना पड़ा.’’
स्वानंद हमें याद दिलाने में देर नहीं करते कि बैंडवाले मरियम की कहानी है, न कि रोबो की. ''रोबो उन लोगों में से है जिनके पास मरियम मदद मांगने जाती है लेकिन ऐसे तमाम दूसरे लोगों की तरह वह भी अंतत: उसके लिए और ज्यादा परेशानियां ही पैदा कराता है.’’ यह थीम शो में बार-बार लौटती है. रोबो मरियम की मदद कर रहा है पर मरियम को भनक तक नहीं कि वह उससे प्यार करता है और उसके बैंड के साथी उसे 'भाभी’ कहने लगे हैं. एक आदमी है जो उसका 'राखी भाई’ है, दूसरा एक अंकल है, लेकिन उनमें से कोई भी मरियम के भीतर के इनसान को देखने के लिए उसके जेंडर के आगे नहीं जा पाता. सभी का एक एजेंडा है.
शो की नायिका सीरियाई ईसाई है जो रतलाम में रहती है. ''यह वह समुदाय है जिसे अपने पर्दे पर हम अक्सर नहीं देखते. मैं मध्य प्रदेश में पला-बढ़ा महाराष्ट्रियन था, इसलिए मैं समझता हूं कि दो सांस्कृतिक पहचानों के साथ बड़ा होना कैसा होता है.’’ जहां तक शो की पृष्ठभूमि रतलाम होने की बात है, स्वानंद मानते हैं कि यह छोटा-सा रेलवे कस्बा इतना कॉस्मोपॉलिटन है कि 'मरियम रोबो’ के साथ मिलकर काम कर सकती है.’’
स्वानंद का करियर सुधीर मिश्र की फिल्म हजारों ख्वाहिशें ऐसी (2003) के साथ शुरू हुआ, जिसमें उनका नाम सहायक निर्देशक, गायक और गीतकार (बावरा मन) और अभिनेता के तौर पर आया. बाद के सालों में वे अपनी बहुविध क्षमताओं के साथ काम करते रहे. यह साल भी कोई अलग नहीं होने जा रहा. स्वानंद विकास बहल की एक फिल्म में जया बच्चन के साथ और सूरज बड़जात्या की अगली फिल्म में काम कर रहे हैं.
रोहित शेट्टी की अगली फिल्म के लिए वे एक गाना लिख रहे हैं और हाल में कुछ सिंगल्स भी रिलीज किए हैं. उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से निर्देशन सीखा और उन्हें उम्मीद है कि निर्देशन भी उनके तमाम आयामों में जल्द ही शुमार होगा. वे कहते हैं, ''इतने सालों में किसी न किसी वजह से निर्देशन नहीं हो पाया. जब होना होगा तब यह भी हो जाएगा.’’
यह सीरीज एक युवा कवयित्री पर है जो खुद की तलाश में निकलती है. लेकिन दूसरे लोग उसे रोमांटिक नजरिए से ही देखते हैं और एक औरत से आगे उसे कुछ मानने को तैयार ही नहीं.