पैसा उगाही की पेशकश
केंद्र की एसेट मोनेटाइजेशन योजना एनएमपी 2.0 के तहत लक्ष्य को दोगुना बढ़ाकर 16.72 लाख करोड़ रुपए किया गया. इसे मोटे तौर पर 2030 तक हासिल कर लेने का मंसूबा है
पहले दौर की 'कामयाब' पहल के बाद केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 23 फरवरी को एसेट मोनेटाइजेशन प्रोग्राम यानी परिसंपत्तियों से पैसे जुटाने के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम के दूसरे चरण की शुरुआत की. लक्ष्य: 16.72 लाख करोड़ रुपए जुटाने का है, जो नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन (एनएमपी) 1.0 से 2.6 गुना ज्यादा है.
इसमें केंद्रीय मंत्रालयों और सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में 5.8 लाख करोड़ रुपए का निजी क्षेत्र का निवेश शामिल है. एनएमपी 2.0 वित्त वर्ष 30 तक यानी पांच साल के लिए है. इस मोनेटाइजेशन में राजमार्ग, हवाईअड्डे, और खदानों वगैरह को तय अवधि के लिए निजी क्षेत्र को पुनर्विकास के लिए सौंपना या सूचीबद्ध फर्मों में सरकार की हिस्सेदारी का एक हिस्सा बेचना शामिल है.
सरकार के थिंक-टैंक नीति आयोग का कहना है कि इस कदम से अगले 5-10 साल में देश की जीडीपी में 40 लाख करोड़ रुपए का इजाफा हो सकता है.
आयोग के मुताबिक, एनएमपी 2.0 मौजूदा सार्वजनिक परिसंपत्तियों की कीमत सामने लाने में अहम भूमिका निभाएगी और उनसे होने वाली कमाई को नई इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में निवेश किया जा सकेगा. यह रकम सिर्फ केंद्र को ही नहीं, बल्कि परिसंपत्तियों के स्वामित्व के हिसाब से सरकारी कंपनियों, बंदरगाह प्राधिकरणों और राज्य सरकारों को भी मिलेगी.
सीढ़ी एनएमपी 1.0 की
मोदी सरकार को पहले सरकारी कंपनियों को निजी हाथों में सौंपकर धन जुटाने में मुश्किलें हुई थीं. मोनेटाइजेशन की प्रक्रिया की आलोचना भी हुई है. आलोचक कहते हैं कि इसकी रफ्तार सुस्त है. लेकिन सरकार का दावा है कि उसने ज्यादातर लक्ष्य—वित्त वर्ष 21 में शुरू की गई एनएमपी 1.0 के 6 लाख करोड़ रुपए के लक्ष्य का 89 फीसद हासिल कर लिया है. नीति आयोग के सीईओ बी.वी.आर. सुब्रह्मण्यम कहते हैं कि 5.3 लाख करोड़ रुपए की रकम में से ज्यादातर हाइवे, कोयला, खदानों, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस और बंदरगाहों से मिली है.
एनएमपी 2.0 मोटे तौर पर एनएमपी 1.0 की राह पर ही चलेगी. इसमें जो बातें शामिल होंगी, वे हैं सीमित समय के लिए परिसंपत्तियों का हस्तातंरण, अतिरिक्त पूंजी सामने लाने के लिए सूचीबद्ध कंपनियों का कुछ हिस्सा बेचना, कैश फ्लो को प्रतिभूतियों में बदलना या रणनीतिक रूप से कमर्शियल नीलामी. इसके तहत लगभग 2,000 परिसंपत्तियों से पैसे जुटाने की कोशिश होगी.
16.72 लाख करोड़ रुपए में से एनएमपी 2.0 के तहत पांच साल में वित्त वर्ष 30 तक 10.8 लाख करोड़ रुपए मिलने की संभावना है, बाकी राशि उसके बाद मिलेगी. इसमें शामिल 12 सेक्टरों में हाइवे (मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क या एमएमएलपी और रोपवे समेत), रेलवे, बिजली, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, नागरिक विमानन, बंदरगाह, वेयरहाउस और स्टोरेज, शहरी बुनियादी ढांचा, कोयला, खदानें, दूरसंचार और पर्यटन हैं.
इनमें से सबसे ज्यादा रकम राजमार्ग से जुटाने का लक्ष्य है. यह 4.42 लाख करोड़ रुपए है, जो कुल राशि की 26 फीसद है. इसके लिए करीब 21,300 किमी राजमार्ग, 15 मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क और छह रोपवे से धन जुटाने का लक्ष्य तय किया गया है. इसके बाद बिजली (2.76 लाख करोड़ रु. या 17 फीसद), बंदरगाह ( 2.63 लाख करोड़ रु. या 16 फीसद) और रेलवे (2.62 लाख करोड़ रु. यानी करीब 16 फीसद) का नंबर आता है. सुब्रह्मण्यम कहते हैं, ''एसेट मोनेटाइजेशन और विनिवेश में सबसे बड़ा अंतर यह है कि संपत्ति आपके ही नाम रहती है. परिसंपत्ति भी आपकी ही रहती है. इसलिए रियायत अवधि के बाद, मान लीजिए 15, 30 या 35 साल परिसंपत्ति मालिक के पास वापस आ जाती है. यह सबसे बड़ा फायदा है.''
शुरुआत
एनएमपी 2.0 के तहत जिन सौदों और परिसंपत्तियों को तय किया गया है, उन्हें कई तरीकों से सौंपे जाने की उम्मीद है. इन उपायों में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) कंसेशन जैसे तरीके, इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (इनविट) जैसे पूंजी बाजार के रास्ते आदि शामिल हैं. तरीका क्या होगा, इसका चुनाव सेक्टर, परिसंपत्ति के प्रकार, सौदे का समय (बाजार के हालात सहित), निवेशक के प्रोफाइल के आधार पर तय किया जाएगा. साथ ही, इससे भी कि परिसंपत्ति मालिक उसे अपने पास रखने के लिए किस स्तर का परिचालन/ निवेश नियंत्रण चाहता है.
ज्यादातर एसेट मोनेटाइजेशन अलग-अलग कंपनियों से जुड़े होते हैं, और बजट में उनका जिक्र नहीं होता, इसलिए एनएमपी 1.0 में हासिल लक्ष्यों को अलग से ट्रैक करना आसान नहीं होता. यही दूसरे चरण में भी लागू रहेगा. बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कहते हैं, ''मोनेटाइजेशन में सरकार सार्वजनिक उपक्रम में हिस्सेदारी बेचती भी है और उपक्रम सड़कें या हवाईअड्डे का भी मोनेटाइजेशन करते हैं. इस तरह हिस्सेदारी बेचने से बजट में आमदनी होती है और सार्वजनिक उपक्रम को भी पैसे मिलते हैं.''
नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि एनएमपी 1.0 ने इन्फ्रास्ट्रक्चर परिसंपत्तियों के जरिए भारत में निवेशकों की नई जमात पैदा की, और लंबी अवधि की पीपीपी रियायत पर जोर दिया गया. इसने वैश्विक और घरेलू पेंशन फंडों, सॉवरेन वेल्थ फंडों और घरेलू बीमा कंपनियों से निवेश आकर्षित किया. रिपोर्ट में आगे कहा गया, ''इससे इन्फ्रास्ट्रक्चर में अब लंबे समय तक स्थिर कमाई चाहने वाली कंपनियां निवेश कर रही हैं. इससे पूंजी बाजार और सरकारी संपत्तियों का उपयोग वैश्विक मानकों के अनुसार बेहतर किया जा रहा है.