हम भी अब खेल में
भारतीय महिलाएं वित्तीय तकदीर अब अपनी मुट्ठी में करने लगीं. सोने-चांदी और बैंक जमाओं में पैसे लगाने के पारंपरिक ढर्रे से बाहर निकल वे बाजार में खुलकर निवेश कर रहीं

मुंबई में काम करने वालीं बिजनेस डेवलपमेंट प्रोफेशनल आश्वासना मिश्रा मार्च 2024 तक अपनी सारी जमा पूंजी बैंक एफडी के तौर पर रखकर संतुष्ट थीं. फिर, 54 वर्षीय आश्वासना को एलएक्सएमई का पता चला. सिर्फ महिलाओं के लिए बने इस निवेश ऐप पर चार महीने तक हर माह 50,000 रुपए बचाने का ऑनलाइन चैलेंज चल रहा था. बस फिर क्या था! आश्वासना की निवेश यात्रा शुरू हो चुकी थी.
वे बताती हैं, ''इसने मुझे 500 रुपए से कम की छोटी-छोटी रकम बचाने और रोजाना निवेश करने के लिए प्रेरित किया.'' 21 चैलेंज के बाद तो उन्होंने एक विविध पोर्टफोलियो बना लिया—52 फीसद इक्विटी में, 30 फीसद गोल्ड फंड में और बाकी डेट और हाइब्रिड इंस्ट्रुमेंट्स में. उनका रिटर्न पहले एफडी में जमा राशि से कहीं बेहतर साबित हुआ.
यही नहीं, निवेश ने उन्हें लक्ष्य निर्धारण का अनुशासन सिखाया और वित्तीय स्वतंत्रता का एहसास भी दिलाया. पिछले साल, उन्होंने निवेश के जरिए कमाए अपने पैसों से मालदीव की यात्रा की; इस साल वे अंदमान घूम आईं. वे कहती हैं, ''मैं अपने पति से पैसे नहीं मांग रही हूं. यात्राओं के लिए अपनी बचत का इस्तेमाल करती हूं.'' अब वे अपनी 18 वर्षीय बेटी को भी ऐसा ही करने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं.
आश्वासना आर्थिक रूप से जागरूक महिलाओं की उस जमात का प्रतिनिधित्व करती हैं जो अपने निवेश की बागडोर अपने हाथ में लेने से नहीं झिझकतीं. आंकड़े खुद इसकी गवाही देते हैं. जनवरी 2026 में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) की तरफ से जारी आवधिक मार्केट पल्स डेटा के मुताबिक, दिसंबर 2025 में 3.1 करोड़ महिला निवेशक थीं, जो एनएसई के 12.5 करोड़ निवेशकों में से 24.8 फीसद हैं.
यह आंकड़ा 2024 में 24.1 फीसद और 2023 में 22.8 फीसद था. भारत के करीब 50 फीसद राज्यों में महिला निवेशकों की हिस्सेदारी अब राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है, जबकि वित्त वर्ष 2023 में यह केवल 44 फीसद थी. महाराष्ट्र (92.8 फीसद), तमिलनाडु (28.4 फीसद), तेलंगाना (25.4 फीसद) और गुजरात (28.2 फीसद) इस रुझान में सबसे आगे हैं. वहीं मिजोरम (32.4 फीसद), सिक्किम (31.2 फीसद) और गोवा (30.6 फीसद) जैसे छोटे राज्य तथा दिल्ली (30.5 फीसद) और चंडीगढ़ (32.3 फीसद) जैसे केंद्रशासित प्रदेश भी महिला भागीदारी के मामले में किसी से पीछे नहीं हैं.
फोनपे इकोसिस्टम की निवेश और ब्रोकिंग शाखा फोनपे वेल्थ की 2024 की एक रिपोर्ट बताती है कि महानगरों से बाहर भी महिलाओं में वित्तीय जागरूकता लगातार बढ़ रही है. इस रिपोर्ट में उस वर्ष के दौरान अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद 1,00,000 महिला निवेशकों का विश्लेषण किया गया. इसमें लगभग 72 फीसद महिला निवेशक वाराणसी, रांची, देहरादून, गुवाहाटी और वडोदरा जैसे शहरों से थीं.
जेरोधा के सह-संस्थापक नितिन कामथ ने जब अगस्त 2025 में पाया कि उनके कुल निवेशकों में महिलाओं की हिस्सेदारी 31.39 फीसद है, जो जनवरी 2019 में 11.12 फीसद थी, तो उन्होंने कहा, ''मैं हैरान था और यह समझना चाहता था कि आखिर यह किस तरह का बदलाव है.'' एसोसिएशन ऑफ रजिस्टर्ड इन्वेस्टमेंट एडवाइजर्स इन इंडिया (एआरआइए) की अध्यक्ष रेणु माहेश्वरी इस रुझान को स्पष्ट करने का प्रयास करती हैं.
वे कहती हैं, ''भारत में एक मौन क्रांति जन्म ले रही है.'' कार्यबल में कहीं ज्यादा महिलाएं शामिल हो रही हैं: 15 वर्ष और उससे ज्यादा आयु की महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) दिसंबर 2025 में 35.3 फीसद तक पहुंच गई, जो 2017-18 के 23.3 फीसद की तुलना में एक उल्लेखनीय वृद्धि है. इस प्रकार महिलाओं के पास अब खर्च करने योग्य कमाई ज्यादा है.
उपरोक्त सर्वेक्षणों में शामिल आंकड़े दोहरी आय वाले परिवारों के हैं जहां वित्तीय प्रबंधन संयुक्त रूप से किया जाता है. साथ ही, उन शहरी एकल महिलाओं के भी हैं जो अब स्वतंत्र रूप से अपनी संपत्ति का प्रबंधन कर रही हैं. यह एक ऐसा वर्ग है जो 15 साल पहले भारत में लगभग पूरी तरह अनुपस्थित था.
इस तरह आती क्रांति
भारत में रुपए-पैसे के साथ महिलाओं का रिश्ता निर्णायक बदलाव से गुजर रहा है. उच्च शिक्षा की ज्यादा सुलभता और वित्तीय जागरूकता में सुधार की बदौलत महिलाएं अपनी आमदनी के बारे में स्वतंत्र रूप से फैसले ले पाईं. पारिवारिक संपत्ति और विरासत में बेटियों को बराबर का अधिकार देने वाले कानूनी सुधारों ने महिलाओं की वित्तीय स्वतंत्रता को ऐतिहासिक रूप से सीमित करने वाली ढांचागत रुकावटों को हटाकर इस बदलाव को और पुख्ता किया.
नतीजा यह हुआ कि आज की युवा महिलाएं धन कमाने, संभालने और निवेश करने को सामाजिक मान्यताओं से भटकाव की तरह नहीं बल्कि ज्यादा से ज्यादा अपनी स्वायत्तता के स्वाभाविक विस्तार के रूप में देखती हैं. अपने को सोने और मियादी जमा सरीखे पारंपरिक तौर पर 'सुरक्षित' साधनों तक सीमित रखने के बजाय कई महिलाएं म्यूचुअल फंड और शेयर सरीखे बढ़त का रुख रखने वाले साधनों का पता लगा रही हैं.
सांस्थानिक कोशिशों ने तेज होते इस बदलाव में निर्णायक भूमिका अदा की. एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स ऑफ इंडिया (एएमएफआइ) और एनएसई सरीखे संगठनों ने खास तौर पर महिलाओं पर केंद्रित वित्तीय साक्षरता की पहलकदमियों को आगे बढ़ाया.
एएमएफआइ के 'म्यूचुअल फंड सही है' अभियान ने खुदरा सहभागियों के बीच म्यूचुअल फंड में निवेश को सामान्य बनाने में मदद की, जबकि एनएसई ने पिछले साल पूरी तरह महिलाओं के लिए 3,016 निवेश जागरूकता कार्यक्रम चलाए और इनके जरिए वह करीब 1,50,000 महिला सहभागियों तक पहुंचा. ब्रोकरेज फर्म जेरोधा ने महिला केंद्रित वित्तीय शिक्षा और विशेषज्ञ समर्थित समुदाय 'हर इंटरेस्ट' के जरिए इस पारिस्थितिकी तंत्र को और मजबूत किया.
सोशल मीडिया ने भी अपनी भूमिका निभाई. कांतार तथा भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (एसईबीआइ) के साल 2025 में 90,000 घर-परिवारों में किए गए अध्ययन से पता चला कि 93 फीसद भारतीय निवेशक फाइनेंशियल इन्फ्लुएंसर्स (फिनफ्लुएंसर्स) को मध्यम से अत्यधिक दर्जे तक भरोसेमंद मानते हैं. इस तरह की आवाजों ने बाजारों को गूढ़ और अनजाने परदों से बाहर लाने और पहली बार हिस्सा लेने वालों को बढ़ावा देने में मदद की.
स्त्री समृद्धि की लहर
दरअसल, कोविड लॉकडाउन निर्णायक मोड़ साबित हुआ. वर्क फ्रॉम होम की लचीली व्यवस्थाओं की बदौलत मध्यम आय वाली कई महिलाओं को निवेश करने के बारे में सीखने का मौका मिला, जिससे महिलाओं के डीमैट खातों में उछाल आ गया. सहभागिता में इस स्थिर बढ़ोतरी को शुरुआत में सरसरी रुझान मानकर खारिज कर दिया गया और बाद में सतर्क आशावाद की तरह देखा गया, मगर इसने सिर्फ महिला-केंद्रित ऐप एलएक्सएमई की प्रीति राठी गुप्ता और माहेश्वरी सरीखे विशेषज्ञों को भरोसा दिलाया कि यह रुझान टिकने और बने रहने के लिए है. माहेश्वरी कहती हैं, ''पढ़ी-लिखी महिलाओं की दूसरी पीढ़ी कुछ वक्त से निवेश करने के लिए तैयार थी मगर उसके पास समझ और आत्मविश्वास नहीं था. बेहतर पहुंच ने उन्हें जानकार निवेशक के तौर पर हिस्सा लेने की ताकत दी.''
मांग के जवाब में फाइनेंशियल प्रॉडक्ट महिला निवेशकों की जरूरतों के हिसाब तैयार किए जाने लगे. व्यापारिक व्यवस्थाओं का बहुत टेक्निकल, समय-खपाऊ और पहली बार निवेश करने वालों के लिए डरा देने वाला इतिहास रहा है. यूपीआइ और ई-केवाइसी के जरिए कम मुश्किल ऑनबोर्डिंग ने रूबरू आने और पेचीदा कागजी कार्रवाई की जरूरत को खत्म कर दिया. एलएक्सएमई, ग्रो, अपस्टॉक्स और 5पैसा सरीखे डिजिटल-प्रथम प्लेटफॉर्म ने निवेश को ऑनलाइन खाने का ऑर्डर देने जितना आसान बना दिया.
म्यूचुअल फंड महिला निवेशकों के लिए सबसे ज्यादा सुलभ और भरोसा बढ़ाने वाले प्रवेश बिंदुओं में से एक बनकर उभरे. सीधे शेयर में निवेश करने के लिए अक्सर ज्यादा बड़ी एकमुश्त प्रतिबद्धताओं और सक्रिय निगरानी की जरूरत होती है. इसके उलट म्यूचुअल फंड में अनुशासित निवेशक सिस्टमैटिक इनवेस्टमेंट प्लान (एसआइपी) के जरिए छोटी-छोटी और नियमित धनराशियां निवेश कर पाता है. राठी कहती हैं, ''आज आप महज 100 रुपए से शुरुआत कर सकते हैं, जो शेयर में मुमकिन नहीं.'' सिस्टम में ही स्थापित डायवर्सिफिकेशन और रिस्क-मिटिगेशन जैसे फीचर इसे और आरामदायक बना देते हैं.
आंकड़ों से इस बदलाव के पैमाने का पता चलता है. क्रिसिल की सेविंग्ज टु वेल्थ क्रिएशन रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर 2024 तक म्यूचुअल फंड निवेशकों में महिलाएं 24.2 फीसद थीं—मोटे तौर पर चार में से एक. उनकी एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (एयूएम) यानी प्रबंधन के तहत परिसंपत्ति मार्च 2019 में 4.49 लाख करोड़ रुपए से दोगुने से भी ज्यादा बढ़कर मार्च 2024 में 11.25 लाख करोड़ रुपए हो गई.
कुल मिलाकर महिलाएं अब म्युचुअल फंड में व्यक्तिगत निवेशकों की तरफ से निवेश किए गए हर 100 रुपए में से 33 रुपए का योगदान देती हैं. एसआइपी में उनकी हिस्सेदारी बढ़ना खास तौर पर चौंकाने वाला है. महिला निवेशकों का एसआइपी एयूएम मार्च 2019 और मार्च 2024 के बीच उछाल भरकर 319.3 फीसद पर पहुंच गया, जो मार्च 2024 तक एसआइपी की कुल परिसंपत्तियों के 30.5 फीसद से भी ज्यादा था.
फोनपे के विश्लेषण से भी पता चलता है कि करीब 90 महिलाएं अपना निवेश का सफर सिस्टमैटिक इनवेस्टमेंट प्लान (एसआइपी) से शुरू करती हैं, जिससे संपदा निर्माण के प्रति उनके अनुशासित और लक्ष्योन्मुख नजरिए की झलक मिलती है. फोनपे वेल्थ के निवेश प्लेटफॉर्म शेयर.मार्केट में इन्वेस्टमेंट प्रॉडक्ट्स के प्रमुख नीलेश नाइक के मुताबिक, एसआइपी में उनका औसत योगदान 1,300 रुपए है, जो पुरुषों से करीब 22 फीसद ज्यादा है, और उनका एकमुश्त निवेश भी करीब 45 फीसद ज्यादा है.
उनके शब्दों में, ''यह दिखाता है कि महिलाएं लकीर की फकीर की तर्ज पर भागीदार होने के बजाय सोच-समझकर लंबे वक्त के लिए निवेश चुन रही हैं.'' करीब 50 फीसद महिला निवेशकों के पास कॉन्ट्रा/वैल्यू फंड हैं. दूसरी लोकप्रिय श्रेणियों में फ्लेक्सी-कैप, मिड-कैप, स्मॉल-कैप और थीमैटिक फंड शामिल हैं. माहेश्वरी की राय में, बहुतायत महिलाएं होशियार निवेशक हैं, ''नब्बे फीसद बड़ा जोखिम मोल नहीं लेतीं और अचानक अप्रत्याशित मुनाफे के बजाय अपने वित्तीय लक्ष्यों (बच्चों की उच्च शिक्षा, अंतरराष्ट्रीय भ्रमण, मकान खरीदना, वगैरह) को प्राथमिकता देती हैं.''
संभावनाएं और खतरे
जश्न मनाने के लिए जहां बहुत कुछ है, सतर्कता बरतने की भी काफी वजहें हैं. जेरोधा के सर्वे से पता चला कि 50 फीसद महिलाएं अपने खाते अपने दम पर खुद इस्तेमाल करती थीं, वहीं इतनी ही महिलाओं के खाते उनके पति, भाई या बच्चे संभालते थे. राठी कहती हैं, ''हम अक्सर पुरुषों को अपने पोर्टफोलियो डाइवर्सिफाइ करने या टैक्स के फायदे लेने के लिए अपनी पत्नियों या बेटियों के नाम से निवेश करते देखते हैं. इसलिए हम कह नहीं सकते कि अपने नाम से खाते रखने वाली महिलाओं के फीसद में बढ़ोतरी सीधे तौर पर उन महिलाओं के अनुपात में है जो खुद निवेश कर रही हैं.'' माहेश्वरी भी उन महिलाओं को लेकर चिंतित हैं जो जरूरी समझ के बिना ही घर बैठे-बैठे खुद डेरिवैटिव्ज में ट्रेड करती हैं.
फिर भी, महिला निवेशकों की संख्या में बढ़ोतरी इतनी हौसला बढ़ाने वाली है कि इसे खारिज नहीं किया जा सकता. बजाज फिनसर्व की ग्रुप प्रेसीडेंट, इनवेस्टमेंट, लक्ष्मी अय्यर कहती हैं, ''अब हमें जागरूकता पैदा करने के लिए नॉन-मेट्रो शहरों में गहराई तक जाने की जरूरत है, ताकि महिलाएं अच्छी तरह से सोच-विचारकर फैसले ले सकें और खुद अपने खाते संभालने का आत्मविश्वास महसूस कर सकें.'' माहेश्वरी अपनी उम्मीदें साझा करती हैं, ''भारतीय महिला के पास अपने धन को लेकर योजना है, अब वह जानकारी और दिशा चाहती है. मैं उम्मीद करती हूं कि महिला निवेशकों की अगली पीढ़ी जिंदगी में जल्द ही निवेश करने लगेगी. हमें एहसास तक नहीं होगा और अगली पीढ़ी का विकास हो चुका होगा.'' आमीन, ऐसा ही हो.
उन्होंने 1990 के दशक में 18 वर्ष की आयु में इसकी शुरुआत की. इंटर्नशिप से जमा किए गए 3,000 रुपए पोर्टफोलियो प्रबंधन सेवा (पीएमएस) के जरिए शेयर बाजार में निवेश किए. वे बताती हैं, ''बाजार की बुनियादी बातें मैंने अपने दादाजी से सीखी थीं.''
दो बच्चों की मां कैरवी उसके बाद से एक लंबा सफर तय कर चुकी हैं. अपने पीएमएस सलाहकार के साथ मिलकर वे पूरी सक्रियता के साथ ईटीएफ या एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड, सोना, चांदी और इक्विटी ट्रेडिंग में निवेश करने पर निर्णय लेती हैं. उनके पोर्टफोलियो का 50 फीसद हिस्सा म्यूचुअल फंड में है मगर उन्हें आइपीओ सबसे ज्यादा पसंद हैं. उन्हीं के शब्दों में, ''मैं किसी भी ऑफर का बारीकी से अध्ययन करती हूं और शायद ही मुझे कभी निराश होना पड़ा हो. मैं अपना लाभ जल्द कमा लेती हूं.'' एक महिला स्टार्टअप में कंपनी सेक्रेटरी के तौर पर वे मुख्यधारा और सोशल मीडिया की खबरों के जरिए कंपनियों पर नजर रखती हैं, मगर वित्तीय इंफ्लूएंसर्स से दूर रहती हैं.
परिवार में शिक्षित महिलाओं की तीसरी पीढ़ी से आने के कारण कैरवी को आर्थिक स्वतंत्रता, खासकर अपनी आय पर नियंत्रण, स्वाभाविक रूप से हासिल था. मगर पिछले दो वर्षों में उन्होंने बाजार की गतिविधियों में भी सक्रिय भागीदारी शुरू की है. वे कहती हैं, ''बारीकियों को समझना और सूचनाएं पाना अब बहुत आसान हो गया है.'' उनकी कई युवा सहकर्मी भी निवेश के लिए ऑनलाइन ऐप का प्रयोग करती नजर आती हैं.
कैरवी कहती हैं, ''मेरे लक्ष्य बहुत बड़े नहीं होते. अमूमन एक महंगा आभूषण खरीदना या परिवार के साथ या अकेले छुट्टी पर जाना. पर मुझे लगता है कि ज्यादा ध्यान देने से यह एक स्थायी निवेश बन सकता है.''
