प्रधान संपादक की कलम से
ग्रेट निकोबार के निचले छोर से इंडोनेशिया महज 140 किलोमीटर दूर है. जबकि यहां से भारतीय मुख्ययभूमि तक पहुंचने को 1,600 किलोमीटर की समुद्री यात्रा करनी पड़ती है

—अरुण पुरी.
ग्रेट निकोबार के निचले छोर से इंडोनेशिया महज 140 किलोमीटर दूर है. वहीं भारतीय मुख्ययभूमि तक पहुंचने को 1,600 किलोमीटर की समुद्री यात्रा करनी पड़ती है. अंडमान के उत्तर में म्यांमार महज 140 किलोमीटर दूर है और थाइलैंड करीब 650 किलोमीटर पूरब में. दूरी और निकटता का यही खेल इस पतले, हंसिए के आकार के द्वीपसमूह की किस्मत तय करता रहा है. हजारों साल तक बाहरी हस्तक्षेप से सुरक्षित रहने की वजह से यहां एक अनोखा पारिस्थितिकीय संसार पुष्पित-पल्लवित हुआ.
विकास की प्रक्रिया एक अलग-से, स्वच्छ वातावरण में आगे बढ़ी और यहां ऐसे जीव-जंतु और वनस्पति पनपे जो दुनिया में कहीं नहीं मिलते. अब यही भौगोलिक स्थिति उसके लिए चुनौती भी बनती दिख रही है. 16 फरवरी को राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने 81,000 करोड़ रुपए के ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी.
यह विशाल पोर्ट-एयरपोर्ट-टाउनशिप कॉम्प्लेक्स है, जो इस द्वीप का चेहरा हमेशा के लिए बदल सकता है. एनजीटी ने अपने फैसले को 'राष्ट्रीय महत्व’ के आधार पर सही ठहराया. 2020 में नीति आयोग के दिमाग से निकला यह विचार नौसैनिक-रणनीतिक और व्यावसायिक महत्वाकांक्षाओं से भरा है. लेकिन पर्यावरण से जुड़े दांव इतने बड़े हैं कि उन्हें पैसों में तौला नहीं जा सकता.
मंजूरी में कई सुरक्षा शर्तें शामिल हैं. आशीष कोठारी सरीखे पर्यावरणविदों ने जो कानूनी लड़ाई लड़ी, वह बेकार नहीं गई. फिर भी उनकी चिंता खत्म नहीं हुई है. जलवायु परिवर्तन के इस दौर में समाज का बड़ा हिस्सा भी यही बेचैनी महसूस कर रहा है. प्रोजेक्ट का सबसे अहम हिस्सा है 44,000 करोड़ रुपए का अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, जो गैलाथिया बे में प्रस्तावित है. यह विचार आकर्षक है. पश्चिमी तट पर विझिंजम को छोड़ दें तो भारत के पास गहरे पानी वाले बंदरगाह कम हैं.
इसी वजह से हर साल 20 करोड़ डॉलर से ज्यादा रकम कोलंबो और सिंगापुर को चुकानी पड़ती है. निकोबार अचानक एक रणनीतिक केंद्र के रूप में उभर सकता है, जो मलक्का जलडमरूमध्य के ऊपर नजर रखेगा. यह सिर्फ भारत की जरूरतें पूरी नहीं करेगा, बल्कि उस अहम समुद्री मार्ग को भी साधेगा, जहां से दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा गुजरता है.
गैलाथिया बे की 20 मीटर गहराई इतनी है कि वहां दुनिया के सबसे बड़े मदर शिप भी लग सकते हैं. जहाजों को अपने मौजूदा मार्ग से बहुत कम भटकना पड़ेगा. म्यांमार के क्याउक्प्यू पोर्ट और कोको द्वीपों के जरिए चीन की बढ़ती मौजूदगी के बीच, सामरिक समुद्री नियंत्रण की जरूरत और अहम लगती है. एकीकृत कॉम्प्लेक्स के साथ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भारत की व्यावसायिक और सैन्य मौजूदगी को पूर्वी हिंद महासागर में और मजबूत करेगा.
दूसरी तरफ के तर्क भी कम मजबूत नहीं. 921 वर्ग किलोमीटर में फैला ग्रेट निकोबार जैव विविधता का एक हॉटस्पॉट है. यहां 1,700 से ज्यादा जीव-जंतुओं और 800 से ज्यादा पौधों की प्रजातियां पाई जाती हैं. दो बातें इसे खास बनाती हैं. पहला, यह एक उष्णकटिबंधीय 'रिम्यूजियम’ है, यानी वे प्रजातियां जो दुनिया के दूसरे हिस्सों में खत्म हो गईं, यहां बची रहीं. दूसरा, कई प्रजातियां सिर्फ यहीं विकसित हुईं.
यहां स्थानिकता का स्तर बेहद ऊंचा है. इसकी 60 स्तनधारी प्रजातियों में से 30 से ज्यादा, लगभग 300 पक्षी प्रजातियों में से करीब एक-तिहाई, 2,500 से ज्यादा पेड़-पौधों की प्रजातियों में से आधे से ज्यादा और छोटे जीवों की बड़ी संख्या दुनिया में कहीं और नहीं मिलती. इनमें से कई संकटग्रस्त हैं.
जैसे जमीन पर रहने वाला निकोबार मेगापोड, लंबी पूंछ वाला मकाक, सर्पेंट ईगल और ट्रीश्रू. गैलाथिया बे मशहूर लेदरबैक समुद्री कछुए के अंडे देने के लिए दुनिया के अहम इलाकों में से एक है. यही वह पारिस्थितिकीय खजाना है, जिस पर अब अस्तित्व का खतरा मंडरा रहा है. इसके अलावा यह अल्ट्रा-मॉडर्न प्रोजेक्ट भूकंपीय जोन 5 में आता है. 2004 में आए 9.1 तीव्रता वाले सूनामी भूकंप का केंद्र यहां से बस 130 किमी दूर था.
प्रस्तावित शामक उपायों में लगातार और सख्त निगरानी की बात कही गई है. जैसे समुद्री कछुओं के अंडे देने वाले इलाकों को घेरकर सुरक्षित करना. द्वीप के चारों ओर दुनिया की सबसे जीवंत कोरल रीफ में से कुछ मौजूद हैं, जिनमें 309 प्रजातियां दर्ज हैं. आधिकारिक जवाब कभी कोरल ट्रांसलोकेशन की बात करते हैं, तो कभी यह तर्क दिया जाता है कि गैलाथिया के पानी में बड़ी कोरल कॉलोनी नहीं हैं.
इस प्रोजेक्ट के तहत करीब 130 वर्ग किमी घने उष्णकटिबंधीय जंगल की कटाई होगी: दस लाख पेड़. इसकी क्षतिपूर्ति के रूप में हरियाणा में वनीकरण का प्रस्ताव कई लोगों को अव्यावहारिक लगता है, भले ही वह कानून के मुताबिक हो. इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने प्रोजेक्ट का बचाव करते हुए कहा कि '82 फीसद जंगल सुरक्षित रहेंगे’ और एक बड़ा 'आर्थिक हब’ तैयार होगा.
मानवीय पहलू इस बहस को और पेचीदा बना देता है. यह द्वीप शोंपेन और निकोबारी समुदायों का घर है. ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने नीतियां बनाते समय आदिवासियों की सहमति लेने का दिखावा भी नहीं किया था, और उसका नतीजा उनकी आबादी में भारी गिरावट के रूप में सामने आया. भारतीय राज्य के पास सहमति और संरक्षण की एक औपचारिक व्यवस्था है. लेकिन इस मामले में रास्ता धुंधला रहा है. एक ट्राइबल काउंसिल ने 2022 में दी अपनी सहमति वापस ले ली है.
उसका आरोप है कि दबाव और गलत जानकारी के आधार पर सहमति ली गई थी. खासकर शोंपेन समुदाय, जिसे 'विशेष रूप से संवेदनशील आदिवासी समूह’ माना जाता है, की सहमति उनके प्रतिनिधि के तौर पर एक सरकारी संस्था ने दी थी. जिस प्रक्रिया के जरिए प्रोजेक्ट को मंजूरी मिली, उस पर भी सवाल उठे हैं. आलोचकों का कहना है कि मंजूरी की यह प्रक्रिया पारदर्शी और पर्याप्त नहीं थी.
इंडिया टुडे की आवरण कथा, जिसे पूरी टीम ने मिलकर तैयार किया है, इस पूरे मुद्दे का विस्तृत आकलन पेश करती है. रणनीतिक तर्क महत्वाकांक्षी हैं. पर्यावरणीय कीमत अपूरणीय है. सबसे आशावादी अनुमान में भी यह तय नहीं है कि निकोबार सिंगापुर या कोलंबो को पीछे छोड़ पाएगा.
असल सवाल यह है कि क्या भारत एक ऐसे कारोबारी और भू-राजनीतिक दांव के लिए अपनी पारिस्थितिकीय विरासत को जोखिम में डालने को तैयार है, जिसके लाभ अब भी अनिश्चित हैं. यह सिर्फ विकास बनाम संरक्षण की सीधी लड़ाई नहीं है. यह इस बात की परीक्षा है कि एक उभरती ताकत अपनी रणनीतिक महत्वाकांक्षा और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे बनाती है.