सफर का नाम अब फर्राटा

वर्षों की देरी के बाद देशभर के प्रमुख राजमार्ग आखिरकार पूरे होने के करीब. इससे सफर में लगने वाला समय घटने और आर्थिक विकास को खासी रफ्तार मिलने की उम्मीद.

special report: highways
एशिया का सबसे लंबा एलिवेटेड वाइल्डलाइफ कॉरिडोर, दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे

देहरादून में 37 वर्षीय स्कूल टीचर विनय रावत पिछले कई वर्षों से दिल्ली की अपनी यात्राओं की योजना किसी मोर्चे पर जंग की तरह बनाते आए हैं. सामान्य दिनों में उन्हें इस सफर में 7-8 घंटे लगते थे. मेरठ के आसपास जाम या सड़क निर्माण के कारण राजमार्ग पर जाम लगने की स्थिति में और भी ज्यादा समय लगता रहा है.

दिल्ली में रहने वाले बुजुर्ग माता-पिता से मिलने जाना उन्हें इतना दुरूह लगता है कि कई बार इसी चलते जाने के हिचकिचा जाते हैं. अब 2026 के मध्य तक दूरी और देरी की ऐसी निराशाजनक सूरत हमेशा के लिए बदलने की उम्मीद है. दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे से यात्रा का समय घटकर लगभग ढाई घंटे रह जाएगा.

इस पूरे नजारे में बदलाव की वजह भारतमाला परियोजना है, जो सरकार की प्रमुख राजमार्ग विकास योजना है. इसे एक दशक पहले कॉरिडोर आधारित दृष्टिकोण के साथ भारत के सड़क नेटवर्क को नया रूप देने के लिए शुरू किया गया था. इसमें लगभग 34,800 किलोमीटर राजमार्ग का निर्माण शामिल है, जिसकी अनुमानित लागत 53 लाख करोड़ रुपए है. स्वीकृत 26,425 किलोमीटर में से 21,783 किलोमीटर की परियोजनाएं जनवरी तक पूरी हो चुकी हैं, जिन पर कुल राशि का 99 फीसद से थोड़ा ज्यादा खर्च हो चुका है.

दोएक साल पहले नई परियोजनाओं की मंजूरी बंद होने के बाद सड़क निर्माण की पूरी मशीनरी बाकी को पूरी और मजबूत करने में लग गई. नतीजा: तय डेडलाइन से वर्षों चूकने के बाद भारत की कुछ सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाएं अंतत: पूरी होने की राह पर हैं. इनमें से अधिकांश परियोजनाएं अगर समय पर चालू हो गईं, तो यह स्वर्णिम चतुर्भुज के बाद राजमार्ग संपर्क में सबसे बड़ा बदलाव होगा. इसका असर भारत के हर कोने में दिखाई देगा.

दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे लंबी सुरंगों से होकर शिवालिक पर्वतमाला से गुजरता है (देखें: आखिरकार मंजिल तक), जबकि दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे उत्तर-पश्चिम के बीच लॉजिस्टिक्स के लिहाज से धुरी बन रहा है. अहमदाबाद प्रस्तावित औद्योगिक शहर धोलेरा के और करीब आ जाएगा. वहीं, बेंगलूरू और चेन्नै के बीच यात्रा आधे दिन के बजाय महज चार घंटे में पूरी की जा सकेगी. वाया बठिंडा अमृतसर से जामनगर की दूरी घटने से ऊर्जा, बंदरगाह और रिफाइनरी केंद्र करीब आ जाएंगे.

तीव्र गति के साथ लखनऊ-कानपुर मार्ग की दूरी 30-45 मिनट में तय हो सकेगी. दिल्ली-अमृतसर-कटरा एक्सप्रेसवे खुलने पर अमृतसर दिल्ली से केवल चार घंटे और कटरा छह घंटे की दूरी पर होगा—पहले 13 घंटे की यह यात्रा खासी थका देने वाली होती थी. गुरुग्राम-पटौदी राजमार्ग द्वारका एक्सप्रेसवे तक सीधी पहुंच देगा, जिससे एनसीआर के सबसे व्यस्त यातायात मार्गों में से एक के आसपास कनेक्टिविटी आसान हो जाएगी.

फायदे का सौदा
आइआइएम बंगलौर की तरफ से 2025 में सरकार के आदेश पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि भारतमाला परियोजना की वजह से लॉजिस्टिक्स में सुधार, माल ढुलाई लागत में कमी, परिवारों की आय और खर्च करने की क्षमता में वृद्धि जैसे फायदे पहले ही नजर आने लगे हैं. इसके साथ ही बाजारों, स्कूलों और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच भी बेहतर हुई है.

जमीनी स्तर पर अर्थव्यवस्था में बदलाव भी दिखने लगे हैं. अहमदाबाद के निर्यातक अब धोलेरा तक दो घंटे के बजाय एक घंटे में पहुंच सकते हैं. माल ढुलाई कंपनियां अमृतसर-जामनगर कॉरिडोर के आसपास अपने मार्ग फिर से निर्धारित कर रही हैं ताकि ईंधन पर खर्च घटे और माल की आवाजाही भी कम समय में हो सके. केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी कहते हैं, ''दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे न केवल दोनों शहरों के बीच आवाजाही में तेजी लाएगा, बल्कि औद्योगिक केंद्रों को भी जोड़ेगा.

 

गति शक्ति लॉजिस्टिक्स को मजबूती मिलेगी और गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र में विकास रफ्तार पकड़ेगा.’’ इसी तरह, बेंगलूरू-चेन्नै एक्सप्रेसवे (जिससे चार घंटे में एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचा जा सकेगा) से भारत के दो सबसे बड़े महानगरों के बीच आवागमन, विनिर्माण आपूर्ति शृंखलाओं और सप्ताहांत यात्रा में क्रांतिकारी बदलाव आने की उम्मीद है. परिवहन नियोजन सलाहकार राजीव सक्सेना कहते हैं, ''यदि आप किसी बड़े शहर और पास के कस्बे के बीच की यात्रा का समय दो घंटे से कम कर सकते हैं, तो आप प्रभावी रूप से शहर की सीमाओं को फिर से परिभाषित कर देते हैं. कस्बा महानगर का विस्तार बन जाता है, जो शहरी आवास और बुनियादी ढांचे की समस्याओं का एक महत्वपूर्ण समाधान प्रदान करता है.’’

इस आशावाद की झलक यातायात और राजस्व पूर्वानुमानों में दिखती है. क्रेडिट रेटिंग एजेंसी आइसीआरए के मुताबिक, आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि और प्रतिकूल प्रभाव घटने से वित्त वर्ष 2026 में वाहनों की आवाजाही में वृद्धि वित्त वर्ष 2025 के करीब 2.5 फीसद से बढ़कर 4-5 फीसद होने की उम्मीद है. आइसीआरए का कहना है, ''इससे वित्त वर्ष 2026 में टोल वसूली में 5-9 फीसद की वृद्धि हो सकती है जबकि 2025 में यह करीब 6 फीसद रही थी.’’ ऑल इंडिया ट्रांसपोर्ट वर्कर्स एसोसिएशन (एआइटीडब्लूए) के जे.पी. सिंह का कहना है कि माल ढुलाई में बचा हर घंटा कमाई के बराबर है. उनके मुताबिक, ''यात्रा जल्द पूरी होना, कम डीजल खपत, महीने में अधिक फेरे...यह वेतन वृद्धि ही तो है.’’

देरी की कीमत
हालांकि, व्यापक परिदृश्य अब भी जटिल बना हुआ है. सरकार का कहना है कि करीब 4 लाख करोड़ रुपए की 643 परियोजनाएं अभी निर्धारित समय से पीछे चल रही हैं. 260 से ज्यादा परियोजनाओं में तीन साल तक की देरी हुई है और 80 परियोजनाओं में तीन साल से ज्यादा का विलंब.

लगभग 1 लाख करोड़ रुपए की लागत वाली 133 अन्य परियोजनाओं के ठेके दिए जा चुके हैं लेकिन उन पर अभी तक काम शुरू नहीं हो पाया है. राज्यों की बात करें तो पश्चिम बंगाल, पंजाब, केरल और जम्मू-कश्मीर में भारतमाला सड़कों का लगभग 40 फीसद काम पूरा हो चुका है, जबकि गुजरात और महाराष्ट्र में यह आंकड़ा करीब 65 फीसद है. गुजरात और महाराष्ट्र में दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे समेत कई परियोजनाएं चल रही हैं.

सरकार की राजमार्ग परियोजनाओं के केंद्र में रहा 1,386 किलोमीटर लंबा दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पिछले साल अक्तूबर तक पूरा होने की उम्मीद थी. 2025 के अंत तक इस परियोजना की लागत 71,718 करोड़ रुपए थी, जो भारतीय इतिहास में सड़कों के मामले में सबसे ज्यादा है. संसद में गडकरी ने स्वीकारा कि भूमि अधिग्रहण की समस्याओं, अनुमतियों में देरी और जटिल शहरी इंटरफेस के कारण उनका मंत्रालय इस परियोजना में देरी का सामना कर रहा है. ऐसी चुनौतियां कई अन्य राजमार्ग परियोजनाओं के सामने भी हैं.

दूर की जा रहीं कमियां
गडकरी इन बाधाओं को सिस्टम से जुड़ा बताते हैं. उनके मुताबिक, इसके लिए ''व्यवस्था को ठीक करना होगा.’’ पिछले कुछ वर्षों में नियंत्रण मजबूत करने के प्रयास किए गए हैं. अप्रैल 2024 में 150 से ज्यादा परियोजनाएं तीन साल से ज्यादा विलंबित थीं. दिसंबर 2025 तक यह संख्या घटकर 90 से कम हो गई. इसी तरह, ऐसी स्वीकृत परियोजनाओं की संख्या भी आधी रह गई है जिनमें काम शुरू करने की तिथि का इंतजार हो रहा था.

दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर निर्माण कार्य में तेजी आई है. दिल्ली में डीएनडी जंक्शन से जैतपुर तक 9 किलोमीटर लंबे खंड पर 95 फीसद काम पूरा हो चुका है और इसके जून तक पूरा होने की उम्मीद है. सोहना-दौसा-लालसोट जैसे लंबे खंड पहले से ही चालू हैं. इस एक्सप्रेसवे के कारण गुरुग्राम से जयपुर की यात्रा अब मात्र तीन घंटे में पूरी हो जाती है.

अधिकारियों की राय में बदलाव का श्रेय पर्दे के पीछे चल रहे व्यवस्थागत बदलावों को जाता है. भूमि अधिग्रहण को भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआइएस) पर आधारित भूमि राशि नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्थानांतरित कर दिया गया है. सामान्य वित्तीय नियमों की मंजूरी के बाद 'परिवेश ऐप’ वन संबंधी मंजूरी प्रक्रिया तेज कर देता है. रेलवे ओवरब्रिज संबंधी स्वीकृतियां अब ऑनलाइन दी जाती हैं, जिसमें अक्सर खासा समय बर्बाद हो जाता था.

स्थानीय स्तर पर अटकी परियोजनाओं को मुख्य सचिव के नेतृत्व में राज्य स्तरीय बैठकों के माध्यम से आगे बढ़ाया जाता है और अगर इससे समस्या हल नहीं होती तो परियोजना निगरानी समूह या प्रधानमंत्री के प्रगति (सक्रिय शासन और समयबद्ध कार्यान्वयन) प्लेटफॉर्म को भेजा जाता है. अब अनुबंधों को और सख्त बनाया जा रहा है. डिजाइन संबंधी खामियों पर ज्यादा सख्ती से जुर्माना लगाया जाता है. लगातार विलंबित परियोजनाओं के लिए फिर से निविदा जारी की जाती है. इस तरह के उपायों से काफी फायदा हुआ है.

हालांकि, कई हिस्सों में अंतिम चरण की आम समस्याएं अब भी कायम हैं. सीमावर्ती इलाकों में जमीन तक पहुंच, उपयोग में बदलाव, डिजाइन में आखिरी चरण में बदलाव और ठेकेदारों में कार्यकुशलता का अभाव अब भी प्रगति में बाधक है. गडकरी काम न करने वाले अधिकारियों और सलाहकारों की कड़ी आलोचना करते हैं. एआइटीडब्ल्यूए के जे.पी. सिंह एक और समस्या की ओर इशारा करते हैं, ''ऊंची टोल दरें लागत बढ़ाती हैं. भारत में ये सबसे ज्यादा हैं. यही नहीं, कई राज्यों की सीमाओं पर अनधिकृत 'टोल’ वसूली होती है, और कई बार ट्रक चालक जब किसी मुश्किल में फंस जाते हैं तो जरूरत पड़ने पर ठेकेदारों का कहीं अता-पता नहीं होता.’’

अगर ये एक्सप्रेसवे व्यापक स्तर पर निर्धारित समय पर खुल गए तो भारतमाला के अगले चरण का आधार मजबूत करने वाले साबित होंगे और हरित औद्योगिक क्षेत्रों को विकसित करने का रास्ता खोलेंगे. इससे महत्वपूर्ण राज्यों में चुनावों के दौरान राजनीतिक लाभ भी मिल सकता है. वहीं, यह भी पता चलेगा कि क्या भारत के सड़क निर्माण तंत्र ने आखिरकार अपने शुरू किए काम पूरा करना सीख लिया है या नहीं.

‘‘दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे न केवल इन दो शहरों को बल्कि औद्योगिक केंद्रों को भी तेजी से आपस में जोड़ेगा, गति शक्ति लॉजिस्टिक्स को मजबूत करेगा और गुजरात, राजस्थान समेत महाराष्ट्र में विकास को तेजी देगा.’’
नितिन गडकरी, केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री

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