प्रधान संपादक की कलम से

बांग्लादेश फिर अपनी किस्मत के साथ नई शुरुआत करने की कोशिश कर रहा है. ऐसे वक्त में भारत के लिए संतुलित और भरोसेमंद सहयोग का हाथ बढ़ाना समझदारी होगी

4 मार्च 2026 अंक
4 मार्च 2026 अंक

- अरुण पुरी

भले ही नेतृत्व की कुर्सी पर वे नए हों लेकिन बांग्लादेश की कमान संभालते ही तारिक रहमान की एंट्री एक तरह से सामान्य हालात की वापसी जैसी है. इससे अलग तस्वीर यह भी हो सकती थी कि देश अराजकता में चला जाता, कट्टरपंथ की तरफ फिसल जाता या फिर दोनों का खतरनाक मेल सामने आता. उस अंदेशे की तुलना में मौजूदा स्थिति कहीं ज्यादा संभली हुई लगती है.

दक्षिण एशिया की जानी-पहचानी राजनीति के मुताबिक यहां भी सत्ता एक बड़े राजनैतिक परिवार के वारिस के हाथ में आई है. 60 साल के तारिक पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया और पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान के बेटे हैं. जियाउर रहमान ने ही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की स्थापना की थी.

इस तरह तारिक को उस राजनैतिक धारा की विरासत मिली है, जिसे इतिहास में अवामी लीग के मुकाबले भारत के प्रति कम दोस्ताना और इस्लामी राजनीति के प्रति ज्यादा नरम माना गया है. शेख हसीना की अगुआई वाली अवामी लीग उसकी सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी रही है.

पाकिस्तान की तरफ झुकाव की छवि भी बीएनपी के साथ जुड़ी रही है. लेकिन बीएनपी की राजनीति को सिर्फ इसी नजरिए से देखने से पूरी तस्वीर नहीं दिखती. 2026 में तारिक को मिला भारी जनादेश दिखाता है कि बांग्लादेश की जनता अपनी तकदीर को धार्मिक कट्टरपंथ के हवाले करने के लिए तैयार नहीं.

2009 से शेख हसीना का खुला भारत समर्थक रुख नई दिल्ली की दक्षिण एशिया रणनीति की अहम कड़ी बन गया था. अवामी लीग के दौर में पूर्वोत्तर के उग्रवादी संगठनों के सीमा पार ठिकाने खत्म किए गए, जिससे उस इलाके में स्थिरता आई. लेकिन बांग्लादेश के अंदर वही करीबी हसीना के लिए बोझ बन गई, क्योंकि समय के साथ उनका शासन ज्यादा सख्त और केंद्रीकृत होता गया.

हसीना विरोधी गुस्सा अक्सर भारत विरोधी नारों में बदल जाता था. कूटनीति का यह नतीजा भारत के लिए भी अनुकूल न था. ऐसे में अगर तारिक 'बांग्लादेश फर्स्ट' की बात करते हैं, तो समझदारी यही कहती है कि नई दिल्ली इसे दुश्मनी नहीं बल्कि घरेलू राजनीति की जरूरत के तौर पर देखे. यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेजी दिखाते हुए तारिक को बधाई दी. वे उन्हें बधाई देने वाले दुनिया के पहले नेता थे.

विकल्प कहीं ज्यादा परेशान करने वाले थे. राज्य प्रमुख के तौर पर अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस ने दो साल की अंतरिम सरकार के दौरान भारत विरोधी माहौल को खुलकर हवा दी. खुद भी विवादित टिप्पणियां करने से पीछे नहीं हटे. मसलन एक बयान में उन्होंने पूर्वोत्तर को 'लैंडलॉक्ड' बताया. भारत को अंदेशा था कि वहां सत्ता का खालीपन पैदा हो सकता है या फिर कोई इस्लामी झुकाव वाली सरकार आ सकती है. ऐसी स्थिति में भारत का पूर्वी पड़ोस पाकिस्तान या उससे भी आगे चीन के लिए लॉन्चपैड बन सकता था. ऐसे में एक स्थिर, वैध और मुख्यधारा की सरकार का आना उस खतरे को टाल देता है.

अब नई दिल्ली को समझदारी और संतुलन के साथ इस तरह से आगे बढ़ना होगा कि बाकी बचे सभी मसलों का हल निकले. भारत की पहली चिंता सुरक्षा है. इस मोर्चे पर भरोसा तभी बनेगा जब तारिक बीएनपी के अतीत के विवादित पहलुओं से साफ दूरी बनाते दिखें. कम से कम भारत को यह आश्वासन चाहिए कि बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होगा, चाहे मामला पूर्वोत्तर का हो या कट्टरपंथियों के नेटवर्क का. पश्चिम बंगाल से सटे जिलों में जमात-ए-इस्लामी की चुनावी वापसी ने इन चिंताओं को और तेज कर दिया है.

तारिक के वालिद जियाउर रहमान 1975 में सत्ता में आए थे और स्वतंत्रता संग्राम के नायक माने जाते हैं. उनको बांग्लादेश की राजनीति में इस्लामी झुकाव की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है. तारिक की मां खालिदा जिया ने करीब 25 साल पहले जमात के साथ रणनीतिक समझ बनाकर उसे आगे बढ़ाया. लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है. जियाउर रहमान ने बहुदलीय लोकतंत्र और आर्थिक सुधारों की भी शुरुआत की. बीएनपी की इसी रूपरेखा को बांग्लादेश को बेहद गरीबी से बाहर निकालने की दिशा देने का श्रेय दिया जाता है.

आज मानव विकास सूचकांकों में बांग्लादेश भारत के बराबर खड़ा है और 2026 में 'अल्प विकसित देश' की श्रेणी से बाहर निकलने जा रहा है. खालिदा जिया ने भी कई बड़े सुधार किए, जिनमें लड़कियों की मुफ्त शिक्षा जैसी पहल शामिल है. उसी का असर है कि तारिक को मिले जनादेश में महिलाओं के वोट की बड़ी भूमिका रही. दिलचस्प बात यह है कि बीएनपी ही जमात विरोधी वोट का स्वाभाविक ठिकाना बनकर उभरी. यह अपने आप में एक सुखद विडंबना है.

भू-राजनीति इस संतुलन की असली परीक्षा लेगी. जनवरी में यूनुस सरकार चीन के राजदूत को तीस्ता नदी के उस रणनीतिक प्रोजेक्ट स्थल पर ले गई, जो सिलीगुड़ी के पास है. दिल्ली ने इस इशारे को नजरअंदाज नहीं किया. फिर भी तीस्ता जल बंटवारा आसान मसला नहीं है. 2011 में हसीना के साथ हुआ समझौता ममता बनर्जी ने रोक दिया था. उनका सख्त ऐतराज अब भी एक बड़ी अड़चन माना जाता है. इसके अलावा भारत ने हसीना को शरण दी हुई है, यह मुद्दा भी आगे चलकर पेचीदा बन सकता है.

अवैध प्रवासन की समस्या अलग सिरदर्द है. लेकिन तारिक के सामने जो बड़ी चुनौतियां हैं, वे भारत के लिए भी जानी-पहचानी हैं. बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था अब भी काफी हद तक गारमेंट इंडस्ट्री और कृषि पर टिकी है. ये सेक्टर हर साल कामकाजी उम्र में जुड़ने वाले करीब 20 लाख युवाओं को समेट नहीं पा रहे, उनके सपनों को पूरा करना तो दूर की बात है. युवा बेरोजगारी की दर करीब 15.6 फीसद है, जो भारत के बराबर है. 17.5 करोड़ की आबादी में करीब एक-तिहाई लोग 24 साल तक की उम्र के हैं.

बड़ी संख्या में लोग विदेश जा रहे हैं. यही अंदरूनी उबाल आखिरकार उस राजनैतिक भूचाल की वजह बना, जिसने हसीना की सत्ता को हिला दिया. यही अब तारिक की विरासत है. फिलहाल माहौल में उम्मीद दिख रही है. इस हफ्ते ढाका में रिपोर्टिंग के लिए गए असिस्टेंट एडिटर अर्कमय दत्ता मजूमदार कहते हैं, ''यह साफ दिख रहा है कि बीएनपी जैसी मध्यमार्गी ताकत के सत्ता में आने से लोगों को राहत महसूस हो रही है.'' भारत व्यापार, कनेक्टिविटी, पानी बंटवारे और सुरक्षा जैसे मसलों पर सहयोगी रवैया अपनाकर अपनी पूर्वी सीमा पर स्थिरता को मजबूत कर सकता है. बांग्लादेश फिर अपनी किस्मत के साथ नई शुरुआत करने की कोशिश कर रहा है. ऐसे वक्त में भारत के लिए संतुलित और भरोसेमंद सहयोग का हाथ बढ़ाना समझदारी होगी.

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