संपत्ति पर शाही खींचतान

उदयपुर में पैतृक संपत्ति को लेकर मेवाड़ राज परिवार में छिड़ा घमासान 'कस्टोडियन’ महाराणा अरविंद सिंह की मृत्यु के एक वर्ष बाद फिर सामने आ गया है. पारिवारिक रिश्तों को तनावपूर्ण बना देने वाले चार दशक पुराने इस विवाद में दिल्ली उच्च न्यायालय जल्द फैसला सुनाने वाला है.

controversy: mewar
उदयपुर में पिछोला झील के पास मेवाड़ राजपरिवार की संपत्तियां

आज भी लहराते रेशमी पर्दों और मध्यकालीन बर्तनों की खनक के साथ महाराणाओं के शानदार अतीत की झलक दिखाते सिटी पैलेस, उदयपुर के आलीशान गलियारे अब विरासत और मुकदमेबाजी की एक नई कहानी के गवाह बन रहे हैं.

मेवाड़ राजवंश के 41 वर्षीय उत्तराधिकारी लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ अपने दिवंगत पिता अरविंद सिंह की वसीयत को लेकर अपनी ही बहनों के साथ कड़वी कानूनी लड़ाई में उलझे हैं.

यह विवाद न सिर्फ एक परिवार, बल्कि राजस्थान की सबसे प्रतिष्ठित और बेहद समृद्ध शाही विरासतों में से एक के खंडित होने का खतरा पैदा कर रहा है.

वसीयत को चुनौती देने के साथ शुरू हुआ झगड़ा अब कई अदालतों तक विस्तारित विवाद में बदल चुका है. मामला दो दिवंगत राजाओं, अरविंद सिंह और उनके बड़े भाई महेंद्र सिंह के बीच दशकों से जारी विरासत पर दावों से जुड़ा है. अरविंद सिंह ने पिछले साल मार्च में मृत्यु से कुछ हफ्ते पहले ही वसीयत लिखी, जिसमें उन्होंने सोशल मीडिया पर खासे सक्रिय और लोकप्रिय अपने बेटे लक्ष्यराज को शाही संपत्तियों का एकमात्र उत्तराधिकारी बताया.

इसमें एकलिंगजी जैसे मंदिरों में हिस्सेदारी और लेक पैलेस, फतेह प्रकाश पैलेस और शिव निवास पैलेस जैसी ख्यात धरोहरें शामिल हैं. उनकी बहनों पद्मजा कुमारी परमार और भार्गवी कुमारी मेवाड़ ने वसीयत पर आपत्ति जताई और दावा किया कि जीवन के अंतिम समय में पिता की मानसिक स्थिति बिगड़ चुकी थी. 20 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर दिल्ली हाइकोर्ट ने मुंबई और जोधपुर हाइकोर्ट में दायर याचिकाओं पर गौर करने के साथ इस लंबे विवाद को औपचारिक तौर पर अपने हाथ में ले लिया.

जस्टिस सुब्रह्मण्यम प्रसाद ने लक्ष्यराज की बहनों के साथ-साथ अरविंद सिंह की पत्नी विजयराज कुमारी को भी नोटिस जारी किया. अदालत ने उन्हें लक्ष्यराज की उस याचिका पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें वसीयत को वैध मानकर लागू करने की मांग की गई है.

साथ ही, कोर्ट ने आदेश दिया कि अगली सुनवाई तक किसी भी संपत्ति का हस्तांतरण या बिक्री नहीं की जाएगी. इस आदेश ने प्रभावी तौर पर उन संपत्तियों के लेन-देन पर रोक लगा दी, जिनकी कीमत परमार के मुकदमे में 1,200 करोड़ रुपए बताई गई है. हालांकि, स्वतंत्र मूल्यांकन में इनकी कीमत इससे 10 गुना अधिक आंकी गई है. मामले की अगली सुनवाई जल्दी होने वाली है. 

एक बार फिर उथल-पुथल
इस वसीयत ने जिस तरह की उथल-पुथल मचाई, उसने 1984 की घटना की याद दिला दी, जब सांकेतिक पदवीधारी अंतिम महाराणा भगवत सिंह की वसीयत को उनके बड़े बेटे महेंद्र सिंह ने चुनौती दी. अपने बेटे की तरफ से शाही संपत्तियों के कुप्रबंधन का आरोप लगाने से नाराज होकर भगवत सिंह ने एक वसीयत छोड़ी, जिसमें अधिकांश संपत्ति छोटे बेटे अरविंद के नाम कर दी गई थी.

कई ट्रस्ट के माध्यम से छोटे बेटे को इस वसीयत का कार्यपालक भी बना दिया गया, जबकि बड़े बेटे को केवल वंश का औपचारिक प्रमुख बनाकर छोड़ दिया गया. हजारों राजपूतों ने उनका समर्थन किया और उन्हें नाममात्र का महाराणा बनाया और अंतत: उन्होंने ताज छोड़ दिया. कुछ लोग इसे सरकारी दबाव में उठाया गया कदम भी मानते हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि वे लड़ाई से पीछे हट गए. उन्होंने अपने पिता की वसीयत को चुनौती दी, बड़े बेटे के नाते प्रथागत अधिकारों और हिंदू संयुक्त परिवार (एचयूएफ) कानून के तहत संपत्ति विभाजन का दावा किया. यही नहीं, अपने छोटे भाई की तरफ से नियंत्रित ट्रस्टों और कंपनियों की वैधता पर सवाल भी उठाया.

इसके बाद कई दशक तक चली कानूनी लड़ाई ने परिवार को दो खेमों में बांट दिया. एक तरफ अरविंद सिंह थे, जिनके पास इस दौरान लगभग सारी संपत्तियों का कब्जा आ गया और उन्होंने उन्हें मशहूर हेरिटेज कारोबार में बदल दिया. दूसरी तरफ महेंद्र सिंह थे, जिनके पास प्रतीकात्मक अधिकार बना रहा, जो 2024 में उनकी मौत पर हुए भव्य सार्वजनिक शोक से साफ दिखा.
2020 में उदयपुर जिला न्यायालय ने अराजकता की स्थिति को खत्म करने का प्रयास किया और बंटवारे के लिए हिंदू अविभाजित परिवार कानून के तहत दायर याचिका पर कुछ विवादित संपत्तियों को चार भागों में बांटने का निर्देश दिया.

कोर्ट ने एक हिस्सा भगवत सिंह के नाम पर रखने और तीन हिस्से उनके बच्चों महेंद्र सिंह, अरविंद सिंह और योगेश्वरी कुमारी को आवंटित करने का निर्देश दिया. टकराव से बचने के लिए बारी-बारी से उपयोग करने का नियम तय किया. हालांकि, यह शांति ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी. दो साल बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी क्योंकि अरविंद सिंह ने इसे चुनौती दी थी, जो पैतृक संपत्ति में अपने बड़े हिस्से पर कब्जा बरकरार रखना चाहते थे. फिर महेंद्र सिंह ने इस रोक को चुनौती दी, जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने मध्यस्थता का सुझाव दिया लेकिन वह भी असफल ही रहा.

बढ़ती गई पेचीदगी 
वर्ष 2025 में अरविंद सिंह की मृत्यु के बाद उनकी बेटियों ने आरोप लगाया कि वह वसीयत अमान्य है, जिसके तहत उनके भाई को शाही संपत्तियों पर लगभग पूर्ण नियंत्रण दिया गया है. बेटियों ने दावा किया कि अपने जीवन के अंतिम समय में उनके पिता कमजोर पड़ चुके थे और शराब के आदी हो गए थे.

उनके मुताबिक, वे उन्हें उनके अधिकारों से वंचित नहीं करते, और हिंदू कानून के तहत संपत्ति का बड़ा हिस्सा संयुक्त परिवार की संपत्ति है, जिसे एकतरफा वसीयत के जरिए हस्तांतरित नहीं किया जा सकता. पिछले साल उन्होंने बॉम्बे हाइकोर्ट में बिना वसीयत के मृत्यु का मुकदमा दर्ज कराया. यह मामला तब बनता है जब कोई व्यक्ति वैध वसीयत छोड़े बिना मर जाता है. ऐसे मामलों (इंटेस्टसी) में संपत्ति का बंटवारा राज्य के उत्तराधिकार कानूनों के तहत किया जाता है. ऐसे मामलों में अदालत फैसला करती है कि किसको कितना हिस्सा मिलना चाहिए. 

इसी बीच, लक्ष्यराज ने राजस्थान उच्च न्यायालय (जोधपुर बेंच) में एक समानांतर याचिका दायर करके वसीयत के प्रामाणीकरण के लिए प्रशासन पत्र की मांग की. लक्ष्यराज सिंह ने इंडिया टुडे से कहा, ''मैं अपनी बहनों के आरोपों से बेहद आहत हूं. वे अक्सर उनसे (पिता से) मिलती थीं. एक ने उनके जीवनकाल में ही 3 करोड़ रुपए लिए और बोर्डों और ट्रस्टों में अपना निदेशक पद छोड़ दिया. उन्होंने तब उनसे सवाल क्यों नहीं किया?

उनमें से एक अंतिम समय में उनके साथ भोजन किया, तब उन्होंने कहा था कि वे कम से कम चार साल और जिएंगे. कुछ घंटों बाद ही उनकी मृत्यु से हम स्तब्ध रह गए.’’ लक्ष्यराज ने यह भी कहा कि वे बहनों को केवल अपनी संपत्ति दे सकते हैं, ट्रस्ट, बोर्ड या कंपनी के अधीन अथवा ऐसी कोई संपत्ति नहीं दे सकते, जिनकी स्वामित्व स्थिति विवादित है. दोनों बहनों ने मीडिया के सामने अपना पक्ष नहीं रखा है लेकिन याचिका में दावा किया गया है कि उन्हें अपने पिता से मिलने नहीं दिया गया.

अब, सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णायक फैसले के लिए पूरे मामले को दिल्ली उच्च न्यायालय स्थानांतरित कर दिया है. लेकिन इसमें एक नया मोड़ आ गया है. बहनें अब उसी अविभाजित हिंदू संपत्ति कानून के तहत दावा कर रही हैं जिसका इस्तेमाल उनके चाचा महेंद्र सिंह ने संपत्तियों पर हक पाने के लिए किया था. उनके चचेरे भाई और महेंद्र सिंह के बेटे विश्वराज सिंह, जो नाथद्वारा से भाजपा विधायक हैं और हाल में एक पक्षकार के तौर पर शामिल करने के आवेदन के साथ मुकदमे का हिस्सा बने हैं.

वे 1980 के दशक की भगवत सिंह की मूल वसीयत को चुनौती देकर अपने पिता की विरासत आगे बढ़ा रहे हैं. उनका तर्क है कि अरविंद सिंह के वंश में उत्तराधिकार की दोबारा न्यायिक जांच बड़े बेटे से जुड़े अनसुलझे दावों को प्रभावित करेगी. इसके अलावा, अरविंद सिंह की वसीयत में कुछ ऐसी संपत्तियां भी हैं जो महेंद्र सिंह ने संपत्ति से बेदखल होने से पहले मुंबई में खरीदी थीं.

कानूनी पेच
लक्ष्यराज और विश्वराज सिंह को जोड़ने वाला एकमात्र मुद्दा है कि अरविंद सिंह की बेटियां उन संपत्तियों पर अधिकार का दावा कैसे कर सकती हैं, जिन पर लक्ष्यराज का कोई अधिकार नहीं? कानून विशेषज्ञों का कहना है कि बहनों की तरफ से चुनौती दिया जाना उत्तराधिकार संबंधी न्यायशास्त्र में व्यापक बदलाव को दर्शाता है, जहां अदालतें उन वसीयतों की गहन जांच कर रही हैं जिनमें बेटियों को शामिल नहीं किया गया है. यहां तक, उन परिवारों में भी जिनमें पितृसत्तात्मक व्यवस्था हावी रही हैं.

लेकिन अदालत को मेडिकल सबूतों पर आधारित नए दावों के मुकाबले पहले के लंबित और अंतिम फैसलों पर विचार करना होगा. उधर, मेवाड़ राज परिवार के करीबी सूत्रों का मानना है कि बहनों का मामला अदालत के बाहर समझौते का प्रयास है. बहुत संभव है कि विश्वराज सिंह बहनों के मामले में विवादित अधिकांश संपत्तियों से जुड़े अन्य मुकदमों के बारे में दिल्ली हाईकोर्ट को सूचित करें. दिल्ली हाईकोट ने अभी तक पक्षकार बनाने की उनकी याचिका पर फैसला नहीं सुनाया है.

इस कदम से 2024 के उस नाटकीय टकराव की यादें ताजा हो गईं, जब विश्वराज सिंह को उनके पिता की मृत्यु के बाद राज्याभिषेक की परंपरा निभाने के लिए सिटी पैलेस में प्रवेश करने से रोक दिया था. इसका असर उदयपुर की सड़कों तक नजर आया था. साथ ही, इसने यह भी रेखांकित कर दिया कि कानूनी विवाद किस तरह शाही रीति-रिवाजों को नया रूप दे रहे हैं. लक्ष्यराज सिंह का कहना है कि उन्होंने विश्वराज के प्रार्थना प्रवेश पर कभी विरोध नहीं किया, बल्कि इसका विरोध जनता का समर्थन हासिल करने के लिए किया गया एक शक्ति प्रदर्शन था ताकि संपत्तियों पर कब्जा किया जा सके.

अपने चचेरे भाइयों के विपरीत विश्वराज सिंह ने अपने जीवन का अधिकांश समय अपने पिता के साथ महलों और विलासिता से दूर बिताया है. हालांकि, लक्ष्यराज सिंह को इससे कोई लेना-देना नहीं. वे कहते हैं, ''मैं सिर्फ एक सवाल पूछता हूं, मेरे चाचा ने अपने पिता के खिलाफ जाकर उन पर सार्वजनिक रूप से आरोप क्यों लगाए? फिर वे मेरे पिता की जगह खुद को वारिस चुने जाने की उम्मीद कैसे कर सकते थे?’’

शहर की शान
मेवाड़ का शाही विवाद इस वजह से और भी ज्यादा गंभीर हो जाता है क्योंकि यह होटल, संग्रहालय, कुछ शहरी भूखंडों और ट्रस्ट से जुड़ा है जो हजारों लोगों को रोजगार देते हैं और उदयपुर की अर्थव्यवस्था में भी अहम योगदान देते हैं. अंतरराष्ट्रीय गणमान्य लोगों के आतिथ्य, डेस्टिनेशन वेडिंग और वैश्विक आयोजनों के लिए इस्तेमाल की वजह से ये राजस्थान के पर्यटन पारिस्थितिकी तंत्र में भी खास भूमिका निभाते हैं. जाहिर है, स्वामित्व या प्रबंधन को लेकर किसी भी प्रकार की अनिश्चितता का सीधा असर शहर की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.

दिल्ली से आए नोटिस की खबर उदयपुर के बाजारों में तेजी से फैल चुकी है. महल कर्मचारी भी सीमित पहुंच और बदलती निष्ठाओं के बीच सावधानी बरत रहे हैं. राजनैतिक कार्यकर्ता वंश और विरासत का हवाला दे रहे हैं, जबकि पर्यटक इससे अनजान हैं कि वे जिन महलों को देखकर मुग्ध हो जाते हैं, वे किस कानूनी पचड़ों में फंसे हैं.

कभी एकता, त्याग और उदारता के लिए ख्यात रहे मेवाड़ राजघराने का विवाद दर्शाता है कि शाही वंश को आधुनिक कानून में कोई विशेष छूट हासिल नहीं है. इस वर्ष गणतंत्र दिवस समारोह समाप्त होते ही प्रतीकात्मक तौर पर यह बात और भी स्पष्ट हो गई कि प्राचीन सिंहासन समकालीन न्यायालयों के सामने झुक गए हैं, और उत्तराधिकार का निर्धारण खून के रिश्तों या परंपरा से नहीं बल्कि न्यायिक आदेश से होता है. दिल्ली हाइकोर्ट के फैसले से ये दरारें भरेंगी या और गहरी होंगी, यह तो वक्त ही बताएगा. फिलहाल एक बात स्पष्ट है कि दशकों से जारी मुकदमों के बावजूद मेवाड़ की विरासत का मामला अभी तक सुलझ नहीं पाया है. 


मेवाड़ विरासत के उत्तराधिकारी लक्ष्यराज सिंह के मुताबिक, मेरी बहनों के इस आरोप से मुझे गहरी ठेस पहुंची कि हमारे पिता वसीयत लिखने की हालत में नहीं थे. वे अक्सर उनसे मिलती थीं. पिता के जीवित रहते ही उन्होंने बोर्डों और ट्रस्टों से अपने निदेशक पद भी छोड़ दिए थे. तब उस समय उन्होंने सवाल क्यों नहीं उठाया? 

उत्तराधिकार की गाथा

एक पिता के अपने प्रतिशोध के लिए पुत्र को संपत्ति से बेदखल करने से लेकर बेटियों के आधुनिक कानूनों के आधार पर भव्य संपत्ति में अपना हिस्सा मांगने तक, मेवाड़ संपत्ति विवाद पारिवारिक नाटक से परिपूर्ण है

1984–1990 का दशक  
केवल नाममात्र के अधिकार रखने वाले महेंद्र सिंह  ने वसीयत को चुनौती दी और परिवार की दूसरी शाखा के साथ एक लंबी कानूनी लड़ाई की शुरुआत कर दी

1984  
मेवाड़ के 72वें महाराणा भगवत सिंह मेवाड़  का निधन हुआ. वे अपनी संपत्ति छोटे पुत्र अरविंद सिंह के नाम कर गए और बड़े पुत्र महेंद्र सिंह से मतभेदों के कारण उन्हें उत्तराधिकार की परंपरा से ही वंचित कर दिया

 2000 का दशक  
अरविंद सिंह  को सिटी पैलेस परिसर, शिव निवास पैलेस, जगमंदिर द्वीप पैलेस और उदयपुर के भूखंडों जैसी प्रमुख संपत्तियों पर अधिकार मिल गया. स्वामित्व विवाद से जुड़े मामले जारी रहे

 2020-2024  
फैसले पर, खासकर कब्जे और नियंत्रण को लेकर, मतभेद अब भी जारी. इसी बीच महेंद्र सिंह का निधन हो गया

2020 
राजस्थान की एक जिला अदालत ने फैसला सुनाया कि महाराणा भगवत सिंह की संपत्ति का बंटवारा हिंदू अविभाजित परिवार कानून के मुताबिक उनके तीन बच्चों के बीच किया जाएगा. अदालत ने उनकी बेटी योगेश्वरी कुमार के अधिकारों को भी बरकरार रखा है, जो इससे पहले तक विवाद से काफी दूर थीं

 2000-2010  
अरविंद सिंह ने एचआरएच ग्रुप ऑफ होटल्स के माध्यम से अपनी संपत्ति को आतिथ्य और विरासत व्यवसाय से जोड़ दिया और कुछ संपत्तियों को ताज ग्रुप को पट्टे पर दे दिया. ट्रस्ट, संपत्ति तक पहुंच और समारोहों को लेकर विवाद जारी रहे

2025
अरविंद सिंह का भी निधन हो गया, जिन्होंने अपनी अधिकांश संपत्तियां पुत्र लक्ष्यराज के नाम कर दी थीं. लक्ष्यराज की बहन पद्मजा कुमारी परमार ने अपनी दूसरी बहन भार्गवी कुमारी मेवाड़ के साथ मिलकर वसीयत को कानूनी चुनौती दी. सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को दिल्ली उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया

2026  
एक और अदालती कार्यवाही शुरू हुई. महेंद्र सिंह के पुत्र विश्वराज सिंह  ने पक्षकार बनाने की मांग की और अपने पिता की तरह उत्त राधिकार की लड़ाई को बरकरार रखा

विवादित संपत्तियां

उदयपुर की ये संपत्तियां शाही परिवार से जुड़े कानूनी विवादों में बार-बार सामने आई हैं, हालांकि वसीयतों, अदालती आदेशों, ट्रस्ट और कॉर्पोरेट संस्थाओं के हिसाब से स्वामित्व साफ तौर पर अलग-अलग है

● सिटी पैलेस परिसर पिछोला झील के नजारे वाले महलों, प्रांगणों, संग्रहालयों और प्रशासनिक भवनों वाली यह संपत्ति सबसे ज्यादा मूल्यवान है. प्रसिद्ध फतेह प्रकाश पैलेस इसी परिसर के भीतर स्थित है

● शिव निवास पैलेस एक विरासत महल जिसे एक लग्जरी होटल में बदल दिया गया है, जो पूर्व शाही परिवार के आतिथ्य पोर्टफोलियो का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है

● लेक पैलेस (जग निवास) अब ताज समूह की तरफ से संचालित यह महल राजस्व बंटवारे और स्वामित्व को लेकर विवादों में घिरा रहा है. इसका परिचालन आतिथ्य संस्थाओं के पास है

● एकलिंगजी मंदिर संपत्ति 
एकलिंगजी मंदिर परिसर और उससे जुड़ी भूमि का गहरा धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है. परंपरागत रूप से पवित्र न्यास संपत्ति मानी जाने वाली इस संपत्ति में दखल और नियंत्रण को लेकर विवाद बना हुआ है

● जगमंदिर द्वीप पैलेस 
पिछोला झील पर स्थित, जगमंदिर एक ऐतिहासिक स्मारक होने के साथ-साथ काफी मूल्यवान विरासत स्थल भी है

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