सेमीकंडक्टर्स के लिए बाहर नहीं जाना, अब देसी कंपनी एजीएनआईटी यहीं करेगी मैन्युफैक्चरिंग!
सिलिकन का राज खत्म. गैलियम नाइट्राइड तेजी से पॉवर इलेक्ट्रॉनिक्स और बेतार संचार में सबसे कारगर सेमीकंडक्टर यौगिक के रूप में उभर रहा है. भारत में इसे एजीएनआईटी बना रही

कभी आपको यह जानने की उत्सुकता हुई कि आपके स्मार्टफोन का आकार तो इन वर्षों के दौरान बढ़ता गया, पर इसे चलाने वाला फास्ट चार्जर अब भी आसान छोटी-सी डिवाइस है? यह गैलियम नाइट्राइड (जीएएन) की बदौलत है. यह सेमीकंडक्टर यौगिक है जो पावर इलेक्ट्रॉनिक्स के मामले में सिलिकन से भी ज्यादा सक्षम है. पावर इलेक्ट्रॉनिक्स का मतलब है हर वह चीज जिसका वास्ता इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में, चाहे वह फोन हो या लैपटॉप या इलेक्ट्रिक वाहन, बिजली के प्रवाह को नियंत्रित और परिवर्तित करने से है. जीएएन सिलिकन से अधिक फ्रीक्वेंसी पर काम करता है. इसमें ऊर्जा की बर्बादी कम होती है. जरा सोचिए, पुराने सेलफोन चार्जर 5-10 वॉट पर चला करते थे; फास्ट चार्जर इन दिनों व्यावहारिक रूप से उन्हीं या कमतर फुटप्रिंट पर करीब 30-60 वॉट पर चलते हैं. अब एक स्टार्ट-अप एजीएनआईटी सेमीकंडक्टर्स जीएनएन अवयवों के बाजार का एक हिस्सा हासिल करने का लक्ष्य साध रही है. यह सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग में भारत की पहली निजी क्षेत्र की कंपनी है.
जीएएन और कहां फर्क पैदा करता है? सफेद रोशनी देने वाले एलईडी और रेडियो फ्रीक्वेंसी (आरएफ) इलेक्ट्रॉनिक्स में. आरएफ इलेक्ट्रॉनिक्स में रडार से लेकर 5जी फोन कनेक्टिविटी तक बेतार संचारों की समूची शृंखला आती है. बेंगलूरू स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी) में सेंटर फॉर नैनो साइंस ऐंड इंजीनियरिंग (सीईएनएसई) के चेयरमैन प्रो. श्रीनिवासन राघवन कहते हैं, "गैलियम नाइट्राइड बेतार संचार के हमारे तरीकों और बिजली के रूप में ऊर्जा की खपत में बेहद अहम भूमिका अदा करने जा रहा है." भारत की सबसे बड़ी अकादमिक फैब्रिकेशन सुविधा (फैब) इसी केंद्र में है. बीते 18 वर्ष के दौरान आईआईएससी के तीन विभागों के करीब 10 संकाय सदस्य जीएएन सामग्री का निर्माण करने से बढ़ते हुए डिवाइस बनाने, उसे सिस्टम के साथ जोड़ने और उसका परीक्षण करने तक आ गए हैं. यहां 'डिवाइस' का मतलब स्विच सरीखे इलेक्ट्रॉनिक पुर्जे हैं जो हमारे काम आने वाले उत्पादों के मदरबोर्ड पर लगे होते हैं.
आईआईएससी में रिसर्च 2005 में शुरू हुई और पहली जीएएन परियोजना को मंजूरी 2009 में मिली, जिसके बाद मेटल ऑर्गैनिक केमिकल वैपर डिपोजिशन (एमओसीवीडी) रिएक्टर लगाया गया. इस प्रक्रिया से जीएएन यौगिक की पतली परतें सिलिकन वैफर पर चढ़ाई जाती हैं और फिर अत्याधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल करके जटिल प्रक्रिया से डिवाइसें फैब्रिकेट की जाती हैं. मसलन, इंसान के बाल की मोटाई करीब 100 माइक्रॉन है; इसके मुकाबले जीएएन से लिपे वैफर को डिवाइसों में काटने वाले ब्लेड की मोटाई 25 माइक्रॉन होती है. राघवन बताते हैं, "उस प्रकार के फैब भारत के निजी क्षेत्र में नदारद थे."
अब जब टेक्नोलॉजी की दुनिया वायरलेस संचार में अहम कगार पर है, आईआईएससी के शोधकर्ता रोमांचक उद्यम में हिस्सेदारी के लिए तैयार हैं. दो विभागों के संकाय सदस्यों और छात्रों के एक समूह ने 2019 में एजीएनआईटी सेमीकंडक्टर्स की स्थापना की. एजीएनआईटी के सीईओ और सह-संस्थापक हरीश चंद्रशेखर बताते हैं कि जीएएन अवयवों के लिए दुनियाभर में बाजार अवसर के 2026 तक 3 अरब डॉलर होने का अनुमान है और ये तेजी से बढ़ रहे हैं. वे कहते हैं, "भारत में एक मजबूत आरएफ डिजाइन इकोसिस्टम है. और डिजाइन इकोसिस्टम को फैब की जरूरत होती है." यही वह कमी है जिसे यह स्टार्ट-अप, आईआईएससी के फाउंडेशन फॉर साइंस इनोवेशन ऐंड डेवलपमेंट और एक एंजेल निवेशक के समर्थन से पाटने की कोशिश कर रहा है. मसलन, यह 5जी दूरसंचार और बेतार ट्रांसमिटर में इस्तेमाल के लिए उनके पुर्जे फैब्रिकेट करने पर गौर कर रहा है.
आईआईएससी भारत में जीएएन के पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने पर भी इतना ही जोर दे रहा है, खासकर दिसंबर, 2021 में 76,000 करोड़ रुपए के खर्च के साथ घोषित सेमीकंडक्टर मिशन को देखते हुए. आईआईएससी में मानद प्रोफेसर और डीआरडीओ में सॉलिड स्टेट फिजिक्स लैबोरेटरी के पूर्व डायरेक्टर मुरलीधरन रंगराजन कहते हैं, "हम हर जगह सिलिकन को नहीं बदल रहे. हम इसमें पूरक चीज जोड़ रहे हैं. हम आपके लैपटॉप में माइक्रो प्रोसेसर को जीएएन से नहीं बदल रहे हैं. मगर पावर इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए एक प्रमुख अवयव स्विच है. उसे गैलियम नाइट्राइड से बदल दिया जाएगा."
एफएसआईडी-आईआईएससी को जल्द ही आईआईएससी कैंपस में जीएएन की कम मात्रा वाली प्रोडक्शन फैब शुरू होने की उम्मीद है. सेमीकंडक्टर लंबे गर्भकाल वाला कारोबार है, पर ईवी चार्जर और 5जी टेलीकॉम ऐप्लिकेशन्स के उभरते बाजार को देखते हुए एजीएनआईटी का वक्त अच्छा हो सकता है.
- अजय सुकुमारन