ग्लोबल वॉर्मिंग के दौर में मिसाल है पेरियार नदी के किनारे बना 120 साल पुराना बीज फार्म

केरल के अलुवा में भारत का पहला कार्बन-न्यूट्रल बीज फार्म ग्लोबल वार्मिग के खतरे से जूझती दुनिया में किसानों के लिए बना रोल मॉडल

अलुवा स्टेट सीड फार्म कोच्चि
अलुवा स्टेट सीड फार्म, कोच्चि

एक ऐसे वक्त में जब जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिग के खतरे सभी के दिमाग पर हावी हैं, पेरियार नदी के किनारे 120 साल पुराना बीज फार्म 'जिजीविषा का रोल मॉडल' बन गया है. कोच्चि के उपनगर अलुवा की 5.32 हेक्टेयर जमीन का टुकड़ा दिसंबर 2022 में भारत का पहला कार्बन न्यूट्रल जैविक बीज फार्म बन गया.

'कार्बन न्यूट्रल' बताता है कि यह फार्म हानिकारक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कोई योगदान नहीं देता और जो निकलती भी हैं, उनको यहीं की मिट्टी और पौधे जज्ब कर लेते हैं. केरल एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ क्लाइमेट चेंज ऐंड एनवायरनमेंट साइंस ने पाया कि तुरुत द्वीप पर बने इस फार्म ने 43 टन कार्बन उत्सर्जित किया लेकिन 213 टन कार्बन 'स्टोर' किया.

मतलब यह कि यह बीज फार्म न केवल कार्बन न्यूट्रल था बल्कि उसके खाते में 170 टन कार्बन क्रेडिट जमा थे. बीते सात साल से बीज फार्म की प्रमुख और कृषि महकमे की असिस्टेंट डायरेक्टर लिसिमोल जे. वडक्कूट कहती हैं, "हम 2012 से जैविक मॉड्यूल का अनुसरण कर रहे हैं. साथ ही, किसानों और दूसरे स्थानीय लोगों को ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने वाली कृषि जमीन तैयार करने की जरूरत के बारे में जागरूक बनाते आ रहे हैं."

इस कामयाबी ने राज्य कृषि विभाग को और ऐसे स्थल शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया. अब राज्य के करीब 12 सरकारी बीज फार्म कार्बन तटस्थ दर्जा हासिल करने के लिए अलुवा मॉडल को लागू कर रहे हैं. वायनाड पहाड़ियों के आदिवासी गांवों के कई फार्म भी सक्षम निकायों का प्रमाणपत्र हासिल करने का जतन कर रहे हैं.

केरल एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ अब मिट्टी के नमूने ले रहे हैं और दूसरे परीक्षण कर रहे हैं. कृषि मंत्रालय का कहना है कि जून 2024 तक 13 बीज फार्म कार्बन तटस्थ होने का प्रमाणपत्र प्राप्त कर लेंगे. खुद भी किसान रहे राज्य के कृषि मंत्री पी. प्रसाद कहते हैं, "हम जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्य के सभी 140 निर्वाचन क्षेत्रों में कार्बन न्यूट्रल फार्म स्थापित करने की योजना बना रहे हैं. एकीकृत खेती मॉडल का पालन करने से लागत भी कम हो जाएगी."

एकीकृत खेती प्रणाली आत्मनिर्भर कृषि मॉडल है जो पशुधन, फसल पैदावार, मछली, मुर्गीपालन, पेड़, पौधरोपण फसलों और अन्य प्रणालियों को एकीकृत करता है ताकि वे परस्पर लाभप्रद हों. खेती में प्रयुक्त पशुओं और फसलों को अलग-अलग ढंग से एक साथ पाला जाता है ताकि वे एक दूसरे के पूरक बनें और खेत की पैदावार बढ़ाएं.

मसलन, बत्तख पालन और मछली पालन से धान की खेती को बहुत बढ़ावा मिलता देखा गया है. विशेषज्ञ समिति का एक आकलन कहता है, "जब खेत में बत्तख और कुछ निश्चित प्रकार की मछलियां पाली जाने लगीं तो चावल की उपज में जबरदस्त बढ़ोतरी दिखाई दी. दरअसल, बत्तखों ने 100 श्रम दिवस बचाए और जमीन की उर्वरता में भी सुधार किया." बत्तखों और मछलियों ने बहुत अच्छी खाद का उत्पादन किया और धान के खेतों में कीड़े-मकोड़ों की समस्या को भी कम से कम कर दिया—स्टेम बोरर, लीफ रोलर और प्लांट हॉपर खेती में मुख्य खतरा हैं.

उधर शुष्कभूमि क्षेत्रों में देसी गाय प्रभावी हैं, जो बागवानी फसलों के लिए गोबर का घोल प्रदान करती हैं, सब्जियों का अपशिष्ट चारा बन जाता है. देसी गायों के अलावा मलाबारी बकरियां, मधुमक्खी पालन और मुर्गी पालन भी खेत में अहम भूमिका अदा करते हैं. फार्म में स्थानीय सामग्रियों से बने जैविक कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है जबकि पराली और कचरे को वर्मीकंपोस्ट में बदला जाता है.

यहां तक कि प्रसार के लिए इस्तेमाल बीजों की खेती भी 'पारिस्थितिकीय इंजीनियरिंग पद्धतियों' से की जाती है. वडक्कूट बताती हैं, "हम ग्रीनहाउस प्रभाव का मुकाबला करने के लिए वैज्ञानिक पद्धतियों का इस्तेमाल करते हैं. कार्बन उत्सर्जनों की तीव्रता मिट्टी में मौजूद जैविक पदार्थों, खनिज बनने की दर, सूक्ष्मजीवों की मौजूदगी और नमी के स्तर पर निर्भर करती है."

बीज फार्म ने उन्नत फसल की खेती और उपज, प्राकृतिक कीट नियंत्रण, अदल-बदल कर फसलें उगाने और फायदेमंद पशुपालन जैसी नवाचारी कृषि तकनीकें अपनाईं. इसने आमदनी बढ़ाने की तलाश में लगे छोटी जोत वाले किसानों और मालिकों के बीच इसे लोकप्रिय बना दिया है.

इस केंद्र पर जीवंत चावल संग्रहालय भी है, जिसमें औषधीय लाल चावल 'रक्तशाली' और पोषक तत्वों से भरपूर जापान वायलेट के अलावा वेल्लातोंडी, नजावरस वगैरह सरीखी पारंपरिक किस्मों भी उगाई जा रही हैं. मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन का कहना है कि वे 2050 तक केरल को शुद्ध कार्बन न्यूट्रल राज्य बनाना चाहते हैं. 

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