सानी न कोई इस संस्थान का
चिकित्सा के क्षेत्र में तकनीकी तरक्की से बड़े बदलाव आ रहे. ऐसे माहौल में दिल्ली का एम्स अपने छात्रों में करुणा/समानुभूति का भाव भरने, भरपूर अनुभव मुहैया करने के साथ उन्हें हर तरह से सक्षम बना रहा

भारत के बेस्ट कॉलेज 2023 : मेडिकल
नं. 1 ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस नई दिल्ली
सोनाली आचार्जी
सन् 2022 में आंध्र प्रदेश के कीर्ति तेजा ने राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा (नीट) में कामयाब होकर अपने पसंदीदा और प्रतिष्ठित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली में प्रवेश लिया था. संस्थान में लगभग एक साल बिता चुके एमबीबीएस के इस छात्र का कहना है कि यहां की वास्तविकता उसकी उम्मीद से कहीं बेहतर है. तेजा कहते हैं, ''यहां पढ़ाई करना जरा भी तनावपूर्ण नहीं है जबकि सीखने और शोध करने के बेजोड़ अवसर उपलब्ध हैं.'' और इससे भी बड़ी बात यह है कि ''छात्रों और शिक्षकों दोनों में मौजूद सांस्कृतिक विविधता से मुझे अपने व्यक्तित्व का विकास करने में मदद मिली है. दूसरी ओर विविध प्रकार के मरीजों के बीच मुझे अपना चिकित्सा कौशल सुधारने में मदद मिल रही है.''
यहां के अधिकांश छात्र और पूर्व छात्र एक तथ्य पर जरूर सहमत होंगे. वह यह कि एम्स लगातार विकसित हो रहा है. यही वह तथ्य है जो इसे दूसरे चिकित्सा संस्थानों से अलग करता है. आज चिकित्सा का क्षेत्र वह नहीं है जो एक दशक पहले हुआ करता था. टेक्नॉलोजी के क्षेत्र में हुई तरक्की से इसमें आमूल-चूल परिवर्तन आया है: रोबोटिक सर्जरी से लेकर नैनो टेक्नोलॉजी तक, आनुवंशिकी से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से संचालित प्रक्रियाओं तक. डॉक्टरों को नवीनतम जानकारियों से अपडेट रहने और उसके अनुसार खुद को ढालने की जरूरत होती है. एम्स के छात्र इसके लिए पहले से ही तैयार हो रहे हैं.
संस्थान ने सिमुलेटेड लर्निंग की व्यवस्था की है जिसे सेट या एसईटी (स्किल, ई-लर्निंग और टेलीमेडिसिन) नाम दिया गया है. इसके मॉड्यूल संस्थान के प्राध्यापकों ने खुद विकसित किए हैं. इसमें एक 'ड्राइ स्किल लैब' है जहां कुछ बुनियादी और कुछ एडवांस मेडिकल स्किल्स सिखाई जाती हैं. इसमें एक 'वेट लैब' भी है जिसमें निर्जीव मानव शरीरों के माध्यम से विभिन्न सर्जिकल विशिष्टताओं में सर्जिकल स्किल डेवलपमेंट वर्कशॉप्स का आयोजन किया जाता है. इसके अलावा, इसमें भारत भर के 50 से ज्यादा चिकित्सा संस्थानों के साथ जुड़ने की क्षमता वाले तीन आधुनिक स्टूडियो हैं. यह सुविधा पूरे भारत में टेली एजुकेशन नेटवर्किंग के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की पहल नेशनल मेडिकल कॉलेज नेटवर्क (एनसीएमएन) के राष्ट्रीय संसाधन केंद्र (एनआरसी) के रूप में भी काम करती है.
गत सितंबर में कार्यभार संभालने वाले संस्थान के निदेशक डॉ. एम. श्रीनिवास कहते हैं, ''दिल्ली का यह एम्स देश में हेल्थकेयर डिलिवरी सिस्टम का मार्गदर्शक रहा है. यह भारत में रोगियों की देखभाल और चिकित्सा शिक्षा प्रदान करने के तौर-तरीकों के कायापलट में भी इसकी अहम भूमिका रही है.'' एसईटी सुविधा की स्थापना श्रीनिवास के नेतृत्व में की गई है.
उल्लेखनीय है कि एम्स में पढ़ाई हमेशा अभ्यास-केंद्रित रही है, लेकिन हाल के वर्षों में अवसरों बात पर ज्यादा जोर की बाद देखने में आई है. ज्यादातर चीजें एक मिश्रित शिक्षण मॉडल के जरिए पढ़ाई जाती हैं जिसमें छात्रों को थियरी की पढ़ाई के बाद वीडियो देखना होता है और फिर स्किल लैब में व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए जाने से पहले एक प्रमाण पत्र हासिल करना होता है. एम्स ने 'फ्लिप्ड क्लासरूम' मॉडल को भी अपनाया है जिसमें कक्षा अवधि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा चर्चा, कार्यशालाओं और छात्र-शिक्षक संवाद बढ़ाने पर खर्च किया जाता है.
इस सब के बावजूद, चिकित्सा शिक्षा किसी संस्थान में मरीजों की देखभाल के इर्द-गिर्द घूमती है. मरीज और परिस्थितियां जितनी ज्यादा विविधतापूर्ण होती हैं, छात्र उतनी ही ज्यादा समस्याओं को संभालने में कुशल हो जाते हैं. जब से डॉ. श्रीनिवास ने कार्यभार संभाला है, संस्थान के बाह्य रोगी विभाग (ओपीडी) की क्षमता में 25 प्रतिशत और 'क्रिटिकल केयर' बेडों में 10 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हुई है. संस्थान में एक नया सर्जिकल ब्लॉक और विशेष रूप से मां और शिशुओं की देखभाल के लिए समर्पित एक ब्लॉक भी है. ऐसे में एम्स में एमबीबीएस की कुल 1,162 सीटों में अपनी जगह बना पाना तेजा जैसे नवोदित डॉक्टरों के लिए वास्तव में किसी सपने के सच होने जैसा क्यों न हो.
गुरु वाणी
''एम्स, नई दिल्ली देश के हेल्थकेयर डिलिवरी सिस्टम के लिए हमेशा से राह दिखाने वाले की भूमिका में रहा है. और मरीजों की देखभाल के साथ चिकित्सा शिक्षा के तौर-तरीकों के कायापलट में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है''
डॉ. एम. श्रीनिवास, डायरेक्टर, एम्स, नई दिल्ली
पूर्व छात्र की राय
''उत्कृष्टता, व्यापक ज्ञान और समानुभूति, अपने इन मूल्यों को बरकरार रखते हुए एम्स लगातार खुद को नए सिरे से गढ़ रहा है ताकि बदलते वक्त में आई चुनौतियों से उपयुक्त तरीके से निबटा जा सके''
डॉ. निखिल टंडन, एंडोक्राइनोलॉजिस्ट, 1984 बैच
छात्र की जबानी
''एम्स में पढ़ना बिल्कुल भी तनावपूर्ण नहीं. शिक्षक छात्रों को अच्छी तरह से समझकर उनके साथ बराबरी का बर्ताव करते हैं...सीखने और रिसर्च करने का जो अवसर मिल रहा है उससे एमबीबीएस के बाद स्पेशलाइजेशन करने में मदद मिलेगी''
कीर्ति तेजा, एमबीबीएस, द्वितीय वर्ष