सुरक्षा का चौकस घेरा
अमित शाह का गृह मंत्रालय मुश्किल हालात में भी शांति बनाए रखने में कामयाब रहा है, चाहे वह कश्मीर हो, पंजाब हो या फिर पूर्वोत्तर का इलाका. हालांकि मणिपुर की मौजूदा हिंसा इस बात की याद दिलाती है कि शांति कायम रख पाना दरअसल कितना नाजुक मसला है.

4 साल मोदी सरकार 2.0
गृह
अमित शाह
केंद्रीय गृह मंत्री
हर सुनहरे राजदंड को इस्पात की चमचमाती तलवार का मजबूत साथ हासिल होता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए वह मजबूत और भरोसेमंद साथी हैं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह. वे एकमात्र व्यक्ति हैं जिनका नाम मोदी के साथ अक्सर जोड़कर लिया जाता है. शतरंज की बिसात पर सीधे और अगल-बगल मार करने वाला हाथी और रहस्यमयी चाल वाला घोड़ा...शाह में दोनों मोहरों वाली खूबियां हैं. कभी-कभी तो वे एक साथ दोनों चालें चल देते हैं.
गृह मंत्री के रूप में अपनी नई भूमिका में आने के बमुश्किल नौ सप्ताह में ऐसी ही एक चाल से 5 अगस्त 2019 को शाह ने धारा 370 रद्द करके सबको चौंका दिया. कश्मीर की विशेष स्थिति को रद्द करना हमेशा से भाजपा की राजनीतिक वरीयताओं में था पर सही मायनों में यह पार्टी के हर घोषणापत्र की एक अनिवार्य रस्मी कवायद बनकर रह गया था, बात इससे आगे कभी बढ़ी ही नहीं. मोदी-शाह ने एक ऐसे जटिल विवाद में निर्णायक कदम उठाने का फैसला किया जिसमें अंतरराष्ट्रीय कोण भी था. उन्होंने जम्मू-कश्मीर की उस यथास्थिति को बदलने का साहस किया.
इसके कूटनीतिक नतीजों से निबटना उनके बॉस यानी पीएम की जिम्मेदारी थी. किसी आंतरिक हलचल या विद्रोह की स्थिति से निबटने की जिम्मेदारी शाह की थी. 2016 में हिज्बुल के युवा कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से ही कश्मीर अशांत था. ऐसे में अनुच्छेद 370 के खत्म होने पर फिर से बड़े विरोध प्रदर्शन शुरू होने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को नुकसान होता. शाह चौकन्ने थे. उन्होंने चूक के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी. घाटी को सुरक्षाबलों ने बर्फ की तरह ढक लिया, पांच महीने मोबाइल इंटरनेट बंद रहा, पूर्व मुख्यमंत्रियों फारुक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के साथ ही दूसरे नेताओं को लंबे समय तक नजरबंद रखा गया. कहीं कोई कोताही नहीं.
अर्धसैनिक बलों की तैनाती बढ़ाने के अपने फायदे थे. पुलवामा के भीषण हमले के ठीक छह महीने बाद आतंकी गतिविधियों पर लगाम कस गई. इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़ दें तो इस साल अब तक कोई बड़ी घटना नहीं हुई है. इस मई में भारत ने घाटी में एक जी20 कार्यक्रम का भी आयोजन कर लिया. आंकड़े निराशा से उबरकर अब सामान्य स्थिति की एक तस्वीर पेश करते हैं. अखबारों के पहले पन्ने पर छपती रहीं जनता और सुरक्षा बलों के बीच झड़पें कम हो गई हैं.
आतंकवाद में शामिल होने वाले युवाओं की संख्या में भी असर दिखता है. गृह मंत्रालय का दावा है कि 2018 और 2022 के बीच नागरिकों की हत्याओं में 23 प्रतिशत, सुरक्षाकर्मियों की मौतों में 66 प्रतिशत और आतंकी हमलों/मुठभेड़ों की संख्या में 45 प्रतिशत की कमी आई है. सीमाओं पर कड़ी चौकसी के चलते घुसपैठिए हिम्मत नहीं कर पा रहे. केंद्र आज कश्मीर को 'पर्यटकों का हॉटस्पॉट’ बताता है. बताते हैं 2018 में 6 लाख पर्यटक आए थे, आज यह संख्या बढ़कर 25 लाख हो गई है. इसका अर्थ है हजारों लोगों को रोजगार.
इसके साथ-साथ पंजाब को भी संभालना था. इसके पुराने घावों से ताजा रिसाव के संकेत मिल रहे थे. सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव, राज्य के खुफिया पुलिस के मुख्यालय पर रॉकेट से हमला, पुराने उग्रवादी दौर की याद दिलाता अपराधी गिरोहों के बीच का आपसी खून-खराबा, सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रोन के माध्यम से ड्रग और हथियारों का गिराया जाना. और अंत में एक करिश्माई युवा कट्टरपंथी का राज्य की कानून-व्यवस्था को सकते में ला देना—पंजाब एक साथ कई चुनौतियों से घिरता दिख रहा था. शाह के अधीन राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) ने प्रत्यर्पण, जांच और चार्जशीट के साथ-साथ सारी कार्यवाही पर पैनी नजर बनाए रखी है.
हालांकि मणिपुर में हाल में भड़की हिंसा एक झटका है, लेकिन गृह मंत्रालय ने पूर्वोत्तर में एक के बाद एक कई सफलताएं पाई हैं. कई विद्रोही समूहों को बातचीत के लिए तैयार किया गया; त्रिपुरा के त्विप्रा बागियों (अगस्त 2019) और असम के बोडो (जनवरी 2020) और कर्बी विद्रोहियों (सितंबर 2021) के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए; मिजोरम/त्रिपुरा के ब्रू-रियांग शरणार्थियों को एक ठिकाना मिला (जनवरी 2020); असम-मेघालय सीमा विवाद को एक समझौते (मार्च 2022) के जरिए सुलझाया गया.
2015 का नगा समझौता भले अब तक तार्किक निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा है पर ''सुरक्षा की बेहतर स्थिति’’ ने केंद्र को असम, नगालैंड और मणिपुर के कई हिस्सों से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अक्रसपा) वापस लेने की अनुमति दी है. हालांकि हाल ही कुकी-मैतेई संघर्ष याद दिलाता है कि क्षेत्र में सतह के नीचे कितनी आग धधक रही है. दूसरी बड़ी चुनौती वामपंथी उग्रवाद है. गृह मंत्रालय यहां भी कुछ श्रेय ले सकता है. आंकड़े बताते हैं कि वामपंथी उग्रवाद से संबंधित हिंसा में 77 फीसद की गिरावट आई है जो 2009 में 2,258 घटनाओं के रिकॉर्ड स्तर से 2021 में 509 हो गई. माओवाद प्रभावित क्षेत्र भी सिकुड़ा है. 2010 में 96 की तुलना में 2021 में 46 जिले ही वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित हैं.
शाह के निर्धारित लक्ष्य लगभग पूरे हो गए हैं. महामारी ने जनगणना, राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को अपडेट करने और विवादास्पद नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के अमल पर रोक लगा दी थी. जम्मू-कश्मीर को भी चुनावों के लिहाज से स्थिति सामान्य होने का इंतजार है.
—प्रदीप आर. सागर.