भरोसेमंद हाथों में कमान

वित्त मंत्री ने कोविड महामारी और यूक्रेन युद्ध के दौरान चौकस और चौकन्ना रहकर अर्थव्यवस्था को संभाले रखा पर सुस्त विनिवेश और महंगाई जैसी मुश्किलें बरकरार.

निर्मला सीतारमण केंद्रीय वित्त मंत्री
निर्मला सीतारमण केंद्रीय वित्त मंत्री

4 साल मोदी सरकार 2.0

वित्त

निर्मला सीतारमण

वित्त मत्री

आजकल तूफानों के भी नाम होते हैं. हल्की-सी डगमगाहट महसूस होने पर इस तूफान को कोविड नाम दिया गया था. पर दुनिया भर की बत्तियां गुल कर देने वाले इस दैत्य के हमले के वक्त मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल को साल भर भी नहीं हुआ था. स्वास्थ्य के मोर्चे पर यह इमरजेंसी इतने गहरे और व्यापक असर वाली थी कि अनिवार्य तौर पर मोदी 2.0 को परिभाषित करने वाली घटना बन गई. लॉकडाउन ने तमाम गतिविधियों पर ताले डाल दिए और वजूद बचाने की नौबत आ पड़ी.

एक के बाद एक क्षेत्रों का इस कदर दम घुटा कि अर्थव्यवस्था 2020 की लगातार दो तिमाहियों में शून्य से नीचे गोता लगा बैठी. यह जटिल पहेली थी. इससे फौरन कैसे पार पाएं? आर्थिक मोर्चे वाले इस 'लॉन्ग कोविड’ से निबटने को कौन-सी नीतियां गढ़ें? यह कयामत और नाउम्मीदी, बुरे लम्हे से पैदा सुस्ती और काहिली लंबे वक्त तक चलने का पूरा अंदेशा था. क्या कोई उससे बेहतर स्थिति में लौटने की कोशिश कर सकता था? अर्थव्यवस्था आखिरकार कोविड से पहले की कई तिमाहियों से सुस्ती का शिकार थी.

विपक्ष और कुछ अर्थशास्त्रियों ने केंद्र पर बटुआ ढीला करके नागरिकों को नकद राहत देने के लिए बहुतेरा दबाव डाला. अमेरिका और यूरोप यही कर रहे थे. जिंदगी और रोजी-रोटी के जबरदस्त नुक्सान के बीच ऐसा करना स्वाभाविक मालूम देता था. मगर मोदी सरकार ने बहाव के उलट तैरने का फैसला किया. मई 2020 में वह आत्मनिर्भर भारत अभियान लेकर आई और देश के नागरिकों से आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ने की अपील की.

क्या विपत्तियों का वह दौर मुल्क की भीतरी कुदरती ताकत को जगाने का सही वक्त था? पीछे मुड़कर देखें तो आप पक्ष और विपक्ष में तमाम तर्क निकाल सकते हैं पर खैरात न बांटने के अपने घोषित इरादे से मोदी सरकार को कोई डिगा न सका. उसने कारोबारों और बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने में पैसा लगाने का फैसला किया और इसके लिए 27.1 लाख करोड़ रुपए तय किए. उसने पैसे से कुछ अच्छा मुश्किल काम करने को तरजीह दी. जैसे कम वक्त की और उथला असर करने वाली प्रायोगिक दवा के बजाय थोड़ी-थोड़ी करके लगातार दी जाने वाली जीवनरक्षक दवा का असली और इकट्ठा असर पड़ता है.

आत्मनिर्भर भारत ने कारोबारों को कर अदायगी में मोहलत दी, 14 मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्रों में उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन लाभ (पीएलआइ) शुरू किए और सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों को अतिरिक्त कर्ज के लिए आपातकालीन कर्ज गारंटी योजना पेश की. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने क्षमता निर्माण पर पैनी नजर टिकाए रखी और 2019 में घोषित नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन के लिए 2019-20 से 2024-25 के बीच 108 लाख करोड़ रुपए अलग रखे. यूपीए की सरकार 2012 में गलत ढंग से तैयार पिछली तारीखों से लागू होने वाला जो कराधान कानून लाई थी, केंद्र ने अक्तूबर 2021 में उसे खत्म कर दिया.

कुछ अर्थशास्त्री सीतारमण को जिस बात का सबसे ज्यादा श्रेय देते हैं, वह फिस्कल डिसिप्लिन यानी राजकोषीय अनुशासन है, जिस पर वे तमाम उथल-पुथल के बावजूद टिकी रहने में कामयाब रहीं. दुनिया अभी कोविड से बमुश्किल उबरी ही थी कि रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया. मंदी पहले ही यूरोप के पीछे पड़ी थी. अब महंगाई भी उन देशों को डराने लगी जो कोविड के दौरान नकद राहत के पक्ष में झुक गए. वही खैरात उन्हें डसने के लिए लौट आई.

यूएस फेड ब्याज दरें शून्य स्तर से 5 फीसद ज्यादा तक बढ़ाने को मजबूर हो गया. आवारा पूंजी ज्यादा आकर्षक हो चुके डॉलर के पीछे भागी, तो रुपया गिरा और जुलाई ’22 में डॉलर के मुकाबले 80 के निशान को पार कर गया. मगर आखिर में भारत दूसरों के मुकाबले उजला देश बना हुआ है—जीडीपी की बेहतर वृद्धि मदद करेगी, अर्थशास्त्री 2022-23 में जिसके 7 फीसद के आसपास रहने की उम्मीद कर रहे हैं.

बैंक ऑफ बड़ौदा के चीफ इकॉनोमिस्ट मदन सबनवीस वित्त मंत्री की कोशिशों का अनुमोदन करते हैं. वे कहते हैं, ''इस सरकार की बड़ी उपलब्धि राजकोषीय समझदारी रही है. वित्त मंत्रालय ने बजट को ज्यादा कारगर बनाया. उसने पूंजीगत खर्च को ज्यादा प्रभावी बनाने का इंतजाम किया.’’ वित्त मंत्री ने इस बजट में पूंजीगत खर्च 10 लाख करोड़ रुपए बढ़ा दिए, जो वित्त वर्ष 2021-22 के मुकाबले 33 फीसद की जबरदस्त बढ़ोतरी थी.

पीएलआइ योजना भी खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स सरीखे सेक्टर्स में अच्छे नतीजे देती जान पड़ती है. भारत आइफोन का अब दुनिया में प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग बेस है, जहां देश में एप्पल के तीन कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर—फॉक्सकॉन, पेगाट्रॉन और विस्ट्रॉन—ने 2022-23 में 57,390 करोड़ रुपए के आइफोन एसेंबल किए. 2021-22 के मुकाबले ये तीन गुना ज्यादा थे. तीनों फर्मो को पीएलआइ के फायदे दिए गए. सेलफोन का कुल उत्पादन 2014-15 में करीब 6 करोड़ से ऊंची छलांग लगाकर 2021-22 में 31 करोड़ के आसपास पहुंच गया. अगली चुनौती लोकल सप्लायर इकोसिस्टम का निर्माण है, ताकि हैंडसेट निर्माता और अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स फर्म अहम पुर्जे भी स्वदेश में ही हासिल कर सकें.

फिर भी बहुत कुछ किया जाना है. टाटा ग्रुप को एयर इंडिया की बिक्री और एलआइसी का 20,557.2 करोड़ रुपए का आइपीओ उस सीधी-सादी बैलेंसशीट में गनीमत की तरह हैं जिसमें विनिवेश और एसेट मोनेटाइजेशन से 6 लाख करोड़ रु. जुटाने का लक्ष्य रखा गया था. एसेट मोनेटाइजेशन का महज 1.62 लाख करोड़ रु. का लक्ष्य मीलों पीछे रह गया.

सार्वजनिक क्षेत्र के दो बैंकों और जनरल इंश्योरेंस की एक फर्म के बहुप्रतीक्षित सौदे पर अभी सोच-विचार ही नहीं हुआ है. प्राइवेट उद्यम उस हद तक आगे नहीं आए जितनी उम्मीद की गई थी, लिहाजा नौकरियों का बाजार सुस्त है. आरबीआइ की कई बार की गई ब्याज दर बढ़ोतरी से भी महंगाई कम न हुई. भूराजनैतिक उथल-पुथल अभी और तकलीफ लेकर आ सकती है.

‘‘(पूंजीगत खर्च में) हाल के वर्षों में इस पैमाने पर हुई बढ़ोतरी दरअसल सरकार की कोशिशों के केंद्र में है. कोशिशें विकास की संभावनाएं बढ़ाने की, रोजगार पैदा करने की, बड़े निजी निवेश लाने और विश्वव्यापी अस्थिरता से बचाव के लिए एक कुशन मुहैया करने की.’’

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