संतुलन की कवायद
न्यायपालिका से मतभेद दूर करने और न्यायिक ढांचे को मजबूत करने जैसे कई काम नए मंत्री के जिम्मे

4 साल मोदी सरकार 2.0
विधि और न्याय
अर्जुन राम मेघवाल, विधि और न्याय राज्यमंत्री
अधिकतर मुद्दों पर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संघर्ष की वजह से बीते कुछ वर्षों में कैबिनेट मंत्री किरन रिजिजू के नेतृत्व वाला केंद्रीय विधि और न्याय मंत्रालय चर्चा में रहा. जजों की नियुक्ति पर विवाद से लेकर सरकार पर न्यायिक अतिक्रमण का आरोप लगा. अब मंत्री के बदले जाने और अर्जुन राम मेघवाल के मई में पदभार ग्रहण करने के बाद ऐसे मुद्दों को सौहार्दपूर्ण ढंग से तथा देश के संविधान के अनुसार हल किए जाने की उम्मीद है.
भारतीय न्यायपालिका को मानव संसाधन और बुनियादी ढांचे, दोनों मामलों में मजबूत करने की जरूरत है. टाटा ट्रस्ट की हाल ही जारी इंडिया जस्टिस रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में प्रति 10 लाख लोगों पर महज 19 जज हैं. एक दशक में प्रति 10 लाख की आबादी पर 50 जजों तक पहुंचने के विधि आयोग के 1987 के लक्ष्य से यह अभी भी पीछे है. 25,628 (पिछले वर्ष के अनुसार) स्वीकृत पदों के मुकाबले भारत में करीब 20,000 ही जज हैं. हाइ कोर्टों में जजों के स्वीकृत 1,114 पदों में से 320 पद खाली हैं. नतीजतन, फिलहाल 5 करोड़ मुकदमे लंबित हैं.
दक्ष इंडिया के 2016 के एक अध्ययन में पता चला कि मामलों के निबटारे में देरी से देश के सकल घरेलू उत्पाद पर सालाना 0.5 फीसद का असर पड़ता है. नेशनल मिशन फॉर जस्टिस डिलीवरी ऐंड लीगल रिफॉर्म के मुताबिक, इस देरी को कम करने के लिए पर्याप्त न्यायिक ढांचा बेहद जरूरी है. केंद्र प्रायोजित तीन दशक पुरानी एक योजना के तहत न्यायिक बुनियादी ढांचे के विकास पर 9,815 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं, जिसमें 6,371 करोड़ रुपए (65 फीसद) 2014 से डाले गए हैं. पर बुनियादी ढांचा अब भी बदहाल है.