राजमार्ग पर सरपट रफ्तार

अथक उत्साह और लक्ष्य पर पक्की नजर ही इस मंत्रालय में नितिन गडकरी की खासियत है, जिसके बल पर उन्होंने इसे कामकाज में बुलंदी पर पहुंचाया.

नितिन गडकरी केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री
नितिन गडकरी केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री

4 साल मोदी सरकार 2.0
सड़क परिवहन और राजमार्ग

नितिन गडकरी
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री 

हाल ही अधिकारियों के साथ एक संवाद में केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने उनके लिए एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया: हर रोज 60 किमी. राजमार्ग बनाना. यह बेहद मुश्किल लक्ष्य था क्योंकि वित्त वर्ष-23 में रोजाना औसतन 30 किमी के आसपास ही राजमार्ग बनाया जा सका. यानी नए राजमार्ग की कुल लंबाई 10,993 किमी ही बैठती है, जो वित्त वर्ष में 12,500 किमी जोड़ने के लक्ष्य से 13.7 फीसद कम बैठी.

लेकिन 2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार के वक्त से ही मंत्रालय को संभाल रहे गडकरी कठोर टास्कमास्टर माने जाते हैं. वे कठिन लक्ष्य तय करते हैं और अधिकारियों पर उसे हासिल करने का जोर डालते हैं. उनके इसी रवैए से अर्थव्यवस्था की जीवन-रेखा माने जाने वाले राजमार्गों के निर्माण में तेजी आ गई.

दरअसल मोदी सरकार 2.0 में गडकरी शायद इकलौते मंत्री हैं, जो अपने मंत्रालय में उसी जज्बे से काम कर रहे हैं, जैसा उन्होंने पहले कार्यकाल में कायम किया था. जब उन्होंने कुर्सी संभाली, तब कॉर्पोरेट घोटाले सुर्खियों में थे, बैलेंस शीट 'फैली हुई’ थी और अधूरे करारों के जमा ढेर से न सिर्फ राजमार्गों के निर्माण का काम धीमा था, बल्कि देश के वित्तीय संस्थान भी जोखिम में आ गए थे.

तब के आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने इसे 'ट्विन बैलेंस शीट’ समस्या बताया था. यानी कंपनियों ने ज्यादा कर्ज उठाया और बैंक डूबते खाते वाले कर्ज से जूझने लगे. हालात की थाह लेने के लिए 2013-14 में राजमार्ग निर्माण की रफ्तार रोजाना महज 11 किमी पर ही गौर करना काफी है. 2019 के संसदीय चुनाव के वक्त तक रफ्तार रोजाना 20 किमी तक पहुंची और कोविड के लॉकडाउन के वक्त वित्त वर्ष-21 में 37 किमी तक आ गई.

मौजूदा राजमार्ग के नेटवर्क के विस्तार के अलावा मंत्रालय ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे के निर्माण पर भी जोर डाल रहा है. ये भारी रफ्तार में यात्रा के लिए 6 से 12 लेन के राजमार्ग हैं, जिन पर चलने की इजाजत नियंत्रित रखी जाएगी. फिलहाल ऐसे 11 एक्सप्रेसवे पर काम चल रहा है. इनमें 1,350 किमी के दिल्ली-मुंबई, 701 किमी के मुंबई-नागपुर, 650 किमी के दिल्ली-अमृतसर-कटरा, 465 किमी के रायपुर-विशाखापत्तनम और 594 किमी के गंगा एक्सप्रेसवे प्रमुख हैं.

गंगा एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश में मेरठ और प्रयागराज को जोड़ेगा. ये भारतमाला परियोजना के तहत बनने वाले छह प्रमुख एक्सप्रेसवे—जिनकी कुल लंबाई 2,560 किमी होगी—के अलावा होंगे. इसके साथ दिल्ली-मुंबई कॉरिडोर को वाया लिंक करने वाले सबसे लंबे एक्सप्रेसवे 745 किमी के पुणे-बेंगलूरू एक्सप्रेसवे और आगामी दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे से जुड़ने वाले 515 किमी के इंदौर-मुंबई एक्सप्रेसवे को भी जोड़ लीजिए. 

इन महत्वाकांक्षी योजनाओं और लक्ष्यों के बीच मंत्रालय के लिए सबसे बड़ा रोड़ा और सिरदर्द भूमि अधिग्रहण का है. जैसा कि इस साल फरवरी में गडकरी ने संसद को बताया कि भूमि अधिग्रहण के 1,457 मामलों के सरकारी मुआवजे पर आपत्तियां विभिन्न हाइ कोर्टों में लंबित हैं, जिनमें केंद्र या भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआइ) को अभी जवाब दाखिल करना है.

लेकिन सीधी बात और दो-टूक रवैए के लिए चर्चित गडकरी विपक्ष शासित राज्यों में भी काम करवा लेने में कामयाब होते रहे हैं. अपनी पार्टी भाजपा में सर्वोच्च निर्णायक संस्था पार्लियामेंटरी बोर्ड और केंद्रीय चुनाव समिति से हटाए जाने के बाद भले गडकरी का असर कुछ कम हुआ हो लेकिन सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री के नाते उनका कामकाज उन्हें अपने मंत्रिमंडलीय साथियों से एकदम अलग खड़ा करता है.

अब देश परिवहन और यातायात के लिए स्वच्छ ईंधन टेक्नोलॉजी की ओर तेज कदम बढ़ा रहा है, जिसमें हाइब्रिड फ्यूल और इलेक्ट्रिक वाहन भी हैं. इसमें भी गडकरी का अनुभव और कारोबारी रुख वाला रवैया काम आएगा.

सीधी और दो-टूक बातचीत के लिए चर्चित गडकरी विपक्षी पार्टियों के शासन वाले राज्यों में भी काम करवा लेने में कामयाब रहे हैं.

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