विशेषांकः नृत्य की प्रसिद्ध पुजारिन
भरतनाट्यम में आमूलचूल बदलाव लाते हुए रुक्मिणी ने पशु अधिकारों के लिए लड़कर, भारतीय हथकरघे को लोकप्रिय बनाकर और देश की शिक्षा प्रणाली पर असर डालकर कुछ और क्रांतियों को भी अंजाम दिया.

75वां स्वतंत्रता दिवस विशेषांक-पथ प्रवर्तक / कला, संगीत और नृत्य
रुक्मिणी देवी अरुंडेल (1904-1986)
लीला सैमसन
रुक्मिणी नीलकांत शास्त्री 1904 में मदुरै में जन्मीं. वे आठ बच्चों के परिवार में छठी संतान थीं. युवा वय में वे स्वप्नदर्शी थीं, पर 16 की होते-होते उन्होंने एक अंग्रेज—प्रतिष्ठित शिक्षाशास्त्री और थोड़े-बहुत थियोसोफिस्ट—से शादी करने की ठान ली.
उन्होंने 'सादिर’ कला, जिसे अब भरतनाट्यम कहा जाता है, सीखकर जातिगत भेदभाव की बेड़ियां तोड़ दीं. इस कला में आमूलचूल बदलाव लाते हुए उन्होंने इसे सभी जातियों, धार्मिक समुदायों और राष्ट्रीयताओं के लोगों के लिए सुलभ बनाया.
अपने पति के साथ उन्होंने उनकी गुरु डॉ. ऐनी बेसेंट की याद में वनों से घिरे परिवेश के बीच बेसेंट स्कूल ऑफ अड्यार और इंटरनेशनल सेंटर ऑफ आर्ट्स शुरू किया, बाद में जिसका नाम बदलकर कलाक्षेत्र रखा गया.
उस वक्त जब न तो शाकाहारी होना फैशनेबल था और न ही दुनिया भर के बूचड़खानों और प्रयोगशालाओं में मानवीय परिस्थितियों का प्रवक्ता होना, वे इंटरनेशनल वेजिटेरियन कांग्रेस और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पशु कल्याण बोर्डों की प्रमुख रहीं.
उन्हीं के छह सालों के अथक प्रयास की बदौलत 1960 में भारत की संसद में पशु कल्याण विधेयक पारित किया गया. वे भारतीयों के हथकरघे के कपड़े पहनने के हक में थीं और इसकी सबसे बड़ी समर्थक बन गईं.
यही नहीं, उन्होंने जो पहना, वह जल्द ही देश भर के महिला और पुरुषों के लिए फैशन स्टेटमेंट बन गया.
उनके पति जॉर्ज अरुंडेल और उन्होंने मैडम मारिया मॉन्टेसरी को 1939 में भारत बुलाया. मॉन्टेसरी आंदोलन उन्हीं की दूरदृष्टि से भारत में फैला. वे भारत में तिब्बतियों के पुनर्वास के लिए बनी समिति की सदस्य थीं और 1959 में दलाई लामा के भारत आने पर उन्होंने उनके साथ नजदीक से काम किया.
लीला सैमसन भरतनाट्यम की विश्वविख्यात नृत्यांगना हैं.