विशेषांकः उस आवाज को भूलना मुश्किल
आठ साल की उम्र में पहली बार लाइव गाने वाले एम. बालमुरलीकृष्ण ने आगे चलकर 25,000 से ज्यादा कंसट्रस में संगीत प्रस्तुतियां दीं. वे प्रयोग करने को लेकर हमेशा खुले रहे और कर्नाटक संगीत को उन्होंने अखिल भारतीय श्रोताओं तक पहुंचाया.

75वां स्वतंत्रता दिवस विशेषांक-पथ प्रवर्तक/ कला, संगीत, नृत्य
एम. बालमुरलीकृष्ण (1930-2016)
अरुणा साईराम
बंबई में बड़ी होते हुए मैं शहर में होने वाले कर्नाटक संगीत के तमाम बड़े उस्तादों के कंसर्ट में जाती रहती थी. पर खासकर एक आयोजन मुझे साफ-साफ याद है. बालमुरली सर ने उस दिन यही कोई तीन घंटे गाया होगा.
तब मैं हालांकि बच्ची ही थी और मुझे कोई भान नहीं था कि वे असल में कर क्या कर रहे थे, पर मैंने महसूस किया कि हर वक्त मैं खुश और रोमांचित थी. उन्होंने बिल्कुल सहज ढंग से जैसे बिना प्रयास के ही सबसे मुश्किल चीजें कीं.
उनकी आवाज हरेक सप्तक में रची-बसी और पूर्णत: तराशी हुई थी. वे आपसे अपने संगीत की तारीफ करवाते थे और अपनी खामोशियों की भी.
तकनीकी तौर पर हमारा रिश्ता गुरु-शिष्य का नहीं था, पर मैं उन्हें गुरु की तरह इज्जत देती और वे मुझे 'वात्सल्यम’ के भाव या पितृ प्रेम से देखते. सर ने 'छवि’—यानी कर्नाटक संगीतकार को कैसा होना या नहीं होना चाहिए—की बाध्यताओं से खुद को या अपने संगीत को कभी परिभाषित नहीं होने दिया. मसलन, उन्होंने जितने भी फिल्मी गाने गाए, वे सब अविस्मरणीय हैं.
उन्हें हमेशा यह लगता था कि कर्नाटक संगीत को चौतरफा फैलना चाहिए, वह महज कुछेक लोगों का विशेषाधिकार नहीं होना चाहिए. जब भी किसी ने उनसे पूछा, ''आप अपने संगीत से यह सब कैसे कर सकते हैं?’’, उनका बस एक ही विनम्र जवाब होता, ''मैंने संगीत को नहीं खोजा, संगीत ने मुझे खोजा है.’’
अरुणा साईराम कर्नाटक संगीत की गायिका, रचयिता और पद्मश्री विजेता हैं.