विशेषांकः भारतीय संगीत का राजदूत
शागिर्दों में 'अब्बाजी’ के नाम से विख्यात और सदैव पितृतुल्य उस्ताद अल्ला रक्खा ने अपनी उदारता और संगीत मेधा दोनों से प्यार कमाया. कभी केवल संगत का वाद्य माने जाने वाले तबले को उन्होंने गौरव और इज्जत की जगह दिलवाई.

75वां स्वतंत्रता दिवस विशेषांक-पथ प्रवर्तक/ कला, संगीत, नृत्य
उस्ताद अल्ला रक्खा (1919—2000)
रंजीत बारोट
मेरी मां सितारा देवी अब्बाजी के बहुत करीब थीं. वे अक्सर हमारे घर आया करते थे. उनके साथ कुछ वक्त बिताकर आप यह एहसास लेकर लौटते थे कि आप संत की सोहबत में थे. वे हमेशा मुस्कराते और उदारता से अपना ज्ञान और बुद्धिमता बांटते रहते. मैं कहूंगा कि उन्होंने सबसे पहले मुझे इनसान के तौर पर प्रभावित किया.
मैंने उनसे तबले की कुछ तालीम ली, पर उन्होंने जल्द ही ताड़ लिया कि मेरा दिल तो ड्रम सेट में है. मुझे याद है उन्होंने कहा था, ''अगर तुम्हें ड्रम बजाना पसंद है तो तबला बजाने की जरूरत नहीं है.’’ उन्होंने मुझे ताल के कुछ सार्वभौम सिद्धांत समझाए.
उन्होंने मेरा दिमाग नई संभावनाओं की तरफ खोला. मैंने देखा कि अब्बाजी ने घरानों के बीच भी कोई सरहदें नहीं बनाईं. उनके तईं सभी उपनदियां एक ही नदी—संगीत—की तरफ ले जाती थीं.
वे और पंडित रविशंकर जी बाकी दुनिया के लिए भारतीय संगीत के पहले बड़े राजदूत थे. उन्होंने बाहर से भारत पर बहुत रोशनी डाली. अमेरिका और यूरोप घूमते हुए वे सामर्थ्य के शिखर पर थे.
अब्बाजी ने दुनिया भर के संगीतकारों और तालवादकों को झलक दिखलाई कि भारतीय ताल व्यवस्था कैसे काम करती है और इसका प्रयोग कैसे किया जा सकता है. उनकी प्रतिष्ठा और प्रभाव की थाह नहीं ली जा सकती.
रंजीत बारोट कंपोजर, ड्रमर और गायक हैं.