‘‘गोली टखने में लगी और छर्रों ने हाथ बींधा...

...मुझे बताया गया कि सेना में अब मेरे दिन पूरे हुए’’

जनरल बिपिन रावत
जनरल बिपिन रावत

जिंदगी का निर्णायक पल

जनरव बिपिन रावत

तारीख थी 17 मई, 1993. मैं सेना में अपनी यूनिट 5/11 गोरखा राइफल्स का एक 35 वर्षीय मेजर था और उड़ी (कश्मीर) में गश्त पर निकला था. हम पाकिस्तान की ओर से हो रही भारी गोलाबारी की जद में आ गए. एक गोली मेरे टखने पर लगी और छर्रे का एक टुकड़ा दाहिने हाथ में लगा.

मैंने सौभाग्य से एक कैनवस एंकलेट पहन रखा था जिसने गोली के आवेग को तो झेल लिया था, फिर भी उसने टखने में घुसकर उसे चकनाचूर कर दिया. मुझे श्रीनगर के 92 बेस अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने शानदार कौशल का परिचय देते हुए हाथ और टखने को फिर से दुरुस्त कर दिया.

सेना में एक युवा अधिकारी के रूप में मुझे सबसे बड़ी चिंता उस बात को लेकर हो रही थी जिसे हम ‘लो मेडिकल कैटेगरी’ कहते हैं. यह चोट हतोत्साहित करने वाली घटना के रूप में आई क्योंकि मुझे डर लग रहा था कि कहीं मैं उस साल महू (मध्य प्रदेश) में अपने सीनियर कमान कोर्स में शामिल होने से वंचित न रह जाऊं. हायर कमान कोर्स (सेना में पदोन्नति के लिए आवश्यक) के इस कोर्स को पास करना अनिवार्य था. लोगों ने मुझसे कहा था कि सेना में मेरा करियर खत्म हो चुका है.

पर धीरे-धीरे मैंने बैसाखी के सहारे चलना शुरू कर दिया. मैंने एक महीने की बीमारी की छुट्टी ली और 92 बेस अस्पताल पहुंचा जहां मुझे अंतत: 'शेप 1’ घोषित किया गया. अगली समस्या थी कि मेरी तैनाती कहां होगी. पता चला कि मुझे अपने रेजिमेंटल सेंटर लखनऊ में वापस तैनात किया जाएगा.

उड़ी में मेरी यूनिट के सीओ (कमांडिंग ऑफिसर) ने कहा कि मिलिट्री सेक्रेटरी ब्रांच की सहमति हो तो वे मुझे यूनिट में रखने को तैयार हैं. मैं निश्चित रूप से नियंत्रण रेखा से लगती पोस्ट पर वापस नहीं जा सकता था. जब मैं यूनिट में था उसी दौरान मेरा टखना धीरे-धीरे ठीक हो गया.

जीवन बदलने वाली और कई घटनाएं रही हैं, यह उनमें से एक थी. जीवन की किसी भी बाधा के दौरान मैं घबराया नहीं. घटनाओं को वैसे ही होने दिया, जैसे वे हो रहीं थीं.

जनरल बिपिन रावत, 62 वर्ष
1993 में पाकिस्तानी गोलाबारी में घायल होने के बावजूद न तो सेना में अपने करियर को प्रभावित होने दिया और न ही अपने जीवन को

 

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