अनजाने नायकः कच्ची उम्र बड़ा मुकाम
गांव को बीबीए के प्रमुख कार्यक्रम बाल मित्र ग्राम (बीएमजी) के तहत 'बाल-मित्र' गांव के रूप में चिन्हित किया गया है, जिसका उद्देश्य उन गांवों में एक सशक्त व्यवस्था बनाना है जहां बच्चों के अधिकारों की रक्षा की जाती है.

तारा बंजारा
पायल जांगिड़, 17 वर्ष
तारा बंजारा, 16 वर्ष
ललिता दुहारिया, 15 वर्ष
किशोरवय सामाजिक कार्यकर्ता, राजस्थान
पायल जांगिड़ (17), तारा बंजारा (16) और ललिता दुहारिया (15), नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी की एक पहल बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) से निकली सफलता की कहानियां हैं. जांगिड़ को हाल ही में बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने राजस्थान में उनके गांव हिंसला में बाल विवाह को खत्म करने के काम के लिए चेंजमेकर अवार्ड से सम्मानित किया था.
गांव को बीबीए के प्रमुख कार्यक्रम बाल मित्र ग्राम (बीएमजी) के तहत 'बाल-मित्र' गांव के रूप में चिन्हित किया गया है, जिसका उद्देश्य उन गांवों में एक सशक्त व्यवस्था बनाना है जहां बच्चों के अधिकारों की रक्षा की जाती है. सत्यार्थी अपनी पत्नी सुमेधा के साथ एक गांव का चयन करते हैं और स्कूल जाने वाले बच्चों के साथ जुड़कर इसे बच्चों के अनुकूल बनाने का प्रयास करते हैं. 2001 में शुरुआत के बाद से लेकर बीबीए ने अब तक भारत में छह राज्यों में 540 केंद्र स्थापित किए हैं.
2012 में बीएमजी ने पायल के हिंसला गांव को चुना. पायल तब मात्र 10 वर्ष की थीं पर उन्होंने परियोजना की ओर से स्थापित बाल पंचायत में भाग लेना शुरू किया और एक वर्ष के भीतर इसकी मुखिया बन गईं. एक बार पायल ने सरकारी स्कूल के लिए और अधिक शिक्षकों की मांग की खातिर सरपंच से बात करने के वास्ते छात्रों के एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया और बच्चों ने जिद के बाद अपनी मांग मनवा ली.
लगभग उसी समय पायल ने परिवार के उनकी 14 वर्षीया बड़ी बहन का विवाह कराने की कोशिशों का जोरदार विरोध किया और अंतत: परिवार को झुकना पड़ा. अब वे माता-पिता को कम उम्र में अपने बेटियों की शादी नहीं कराने के लिए समझाने के अभियान का हिस्सा हैं. यह बाल विवाह के खिलाफ उनकी लड़ाई की शुरुआत थी.
पायल के आंदोलन का प्रभाव नीमणी गांव के 9 साल की तारा बंजारा तक भी पहुंचा. तारा के परिवार वाले एक आदमी से उसकी सगाई कराने वाले थे और तारा ने इसका पुरजोर विरोध किया. वे बीबीए के एक पुनर्वास और प्रशिक्षण केंद्र बाल आश्रम की ओर से स्थापित एक अनौपचारिक स्कूल में शामिल हो गईं. अपने परिवार के सात बच्चों में सबसे बड़ी तारा ने अपनी दसवीं कक्षा की परीक्षा में 62 प्रतिशत अंक हासिल किए.
उनकी सफलता की कहानी को देखते हुए बाल आश्रम ने बंजारा समुदाय के बच्चों के लिए विशेष रूप से नौ और स्कूल खोले. तारा अब गली के बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करने और उनके माता-पिता को घुमंतू की तरह अपनी सदियों पुरानी परंपरा तोड़कर सरकार से भूमि अधिकार लेने के लिए प्रेरित करने के काम में जुटी हैं. उन्होंने डेरा गांव की दलित छात्रा ललिता दुहारिया के साथ रिबॉक फिट टु फाइट अवार्ड जीता. ललिता अपने गांव में भेदभावपूर्ण व्यवहार को समाप्त करने के लिए लड़ रही थीं और वे अब पूरे भारत के सभी बाल पंचायतों की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. —रोहित परिहार
परिवर्तन का पैमाना
बाल विवाह के खिलाफ उनके प्रयासों के चलते स्थानीय लोग अब कम उम्र में लड़कियों की शादी करने पर दस बार सोचते हैं
''हम जैसे बच्चों को काफी हौसला अफजाई की जरूरत है क्योंकि हमें अपनी परेशानियों से पार पाना मुश्किल है''***