अनजाने नायकः नवजीवन की राह पर
डॉ. भूषण सिंह ने लाइफलाइन एक्सप्रेस के प्रभारियों को समझाया और 2009 में उस ट्रेन में अपना क्लिनिक बना लिया. कई वर्षों तक अकेले काम करने के बाद आज उनके पास लोगों को सलाह देने के लिए मिर्गी शिक्षकों की एक छोटी टीम है.

ममता भूषण सिंह, 53 वर्ष
एपिलेप्सी एजुकेटर, दिल्ली
उनकी विशेष तौर पर तारीफ की जानी चाहिए. डॉ. ममता भूषण सिंह देश के 3,000 न्यूरोलॉजिस्ट में से एक हैं. नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में न्यूरोलॉजी की पूर्णकालिक प्रोफेसर की भूमिका निभाते हुए वे मिर्गी के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए अथक काम करती हैं. देश में मिर्गी की बीमारी से 1.3 करोड़ लोग पीडि़त हैं. वे इस बीमारी से ग्रसित लोगों के इलाज के लिए एक ट्रेन 'लाइफलाइन एक्सप्रेस' से देश के दूरदराज के इलाकों का सफर करती हैं. यह मुंबई के एनजीओ इंपैक्ट फाउंडेशन के मेडिकल प्रोजेक्ट का हिस्सा है. यह प्रोजेक्ट पिछले 27 साल से चल रहा है और इसका उद्देश्य सबसे गरीब लोगों तक पहुंचकर उन्हें मुफ्त चिकित्सा सुविधा प्रदान करना है. डॉ. भूषण सिंह पिछले 10 साल से ट्रेन में अपना मिर्गी क्लिनिक चलाती हैं, और हाल ही में बिहार के फारबिसगंज में सप्ताहांत बिताकर लौटी हैं.
उनसे पूछिए कि आप अपना सप्ताहांत इस काम में क्यों लगाती हैं, तो उनके जवाब से पता चल जाएगा कि भारत में मिर्गी के रोगियों को कितनी समस्याएं झेलनी पड़ती हैं. बच्चे अगर दवाई लें तो मिर्गी से मुक्ति पा सकते हैं या कम से कम अपने रोग को नियंत्रित रख सकते हैं. लेकिन कई लोगों को काफी देर हो जाने तक इसके बारे में पता ही नहीं चलता और तब तक उनका प्रारंभिक वर्ष निकल जाता है.
वे बताती हैं, ''सबसे सामान्य बात यह है कि कई लोग वर्षों तक इलाज का इंतजार करते हैं, यहां तक कि दशकों तक. मिर्गी पीडि़त बच्चे कम उम्र में ही स्कूल छोड़ देते हैं, और फिर जब वे 20 साल के होते हैं तो उनका पहली बार इलाज शुरू होता है तब तक उन्हें समाज का बेकार सदस्य बना दिया जाता है.'' ऐसे रोगियों का देर से इलाज शुरू होने की वजह यह है कि देश में मिर्गी के प्राथमिक इलाज की व्यवस्था नहीं है. इलाज के लिए वर्षों इंतजार करने का मामला अरसे से ऐसे ही है.
लेकिन उन्होंने जमीनी स्तर पर प्रयास का सफर कैसे शुरू किया? वे इसका श्रेय अमेरिकन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी के पालातुच्ची एडवोकेसी लीडरशिप (पीएएल) फोरम को देती हैं, जो न्यूरोलॉजिस्ट को नीति निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा बनने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षण देता है. डॉ. भूषण सिंह 2008 में इस कार्यक्रम के लिए चुने गए दो अंतरराष्ट्रीय सहभागियों में शामिल थीं. दिल्ली लौटकर उन्होंने इस काम को शुरू करने का इरादा बना लिया.
डॉ. भूषण सिंह ने लाइफलाइन एक्सप्रेस के प्रभारियों को समझाया और 2009 में उस ट्रेन में अपना क्लिनिक बना लिया. कई वर्षों तक अकेले काम करने के बाद आज उनके पास लोगों को सलाह देने के लिए मिर्गी शिक्षकों की एक छोटी टीम है. शाम को वे जहां रुकती हैं, वहां स्थानीय डॉक्टरों को अपने संपर्क में रखने के लिए इकट्ठा करती हैं, उनमें से कई मिर्गी की पहचान करने के लिए प्रशिक्षित हैं. वे कहती हैं, ''रोग की शुरुआती क्लिनिकल पहचान के बाद हम रोगियों को कम से कम एक महीने की दवा देते हैं. रोगियों को दवा का असर देखने की जरूरत होती है. इससे दवा के बारे में उनका शक-शुबहा दूर हो सकता है.''
डॉ. भूषण सिंह को उनके प्रयासों के लिए कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है और वे पीएएल वर्कशॉप में मेंटर के रूप में भी शामिल हुई हैं. अन्य के अलावा वे इंडियन एपिलेप्सी सोसाइटी और इंडियन एपिलेप्सी एसोसिएशन की सदस्य हैं. इन सबसे बढ़कर उन्होंने अनगिनत रोगियों को प्रेरित किया है, उनमें से कुछ उनसे अपना इलाज कराने के लिए चलकर एम्स आए हैं, जब कोई उनका ख्याल रखने वाला नहीं था तो उन्होंने अपना ध्यान खुद रखा.
परिवर्तन का पैमाना
डॉ. ममता भूषण ने अपने प्रयास से हजारों मिर्गी रोगियों को इससे मुक्ति दिलाई या इसे नियंत्रित करना सिखाया
''सबसे सामान्य बात यह है कि कई लोगों को इलाज के लिए वर्षों, यहां तक दशकों इंतजार करना पड़ता है''.
रोशनी मजूमदार