क्रातिंकारी दशकः कानून का कमजोर हाथ
अदालत को बहुसंख्यकवाद के विपरीत होना चाहिए लेकिन हाल के फैसलों और अदालती कार्रवाइयों से इस मूल उद्देश्य को ही चुनौती मिली

उषा रामनाथन
यकीनन ये साल सुप्रीम कोर्ट के लिए उथलपुथल भरे रहे हैं. अदालती बेचैनी 12 जनवरी, 2018 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में फूट पड़ी जब चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने आरोप लगाया कि ''कुछ समय से... राष्ट्र और न्यायसंस्था के लिए दूरगामी परिणाम वाले मामलों को इस अदालत के प्रधान न्यायाधीश बिना किसी तार्किक आधार के 'अपनी पसंद की' बेंचों को सौंपते आ रहे हैं.'' उन जजों ने आरोप लगाया कि ऐसे मामलों को बीच सुनवाई में वापस लेकर पसंदीदा न्यायाधीशों की बेंचों को सौंपा जा रहा है. दूसरे शब्दों में, कॉलेजियम के चार जज तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पर बेंच-फिक्सिंग का आरोप लगा रहे थे.
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को 2015 में असंवैधानिक बता दिया गया, और न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सरकार और अदालत के बीच प्रक्रिया-पत्र तैयार करने का असाधारण प्रावधान किया गया था. उसमें भी अब गतिरोध आ चुका है.
अदालतों का एक अनिवार्य दायित्व है कि वे 'बहुसंख्यकवाद के विपरीत' रहें, और एक बहुसंख्यकवादी सरकार हर मोड़ पर अदालत के सामने चुनौतियां खड़ी करती रही है. संविधान लोगों के अधिकारों और राज्य की शक्तियों को सीमित करने का दस्तावेज है. अदालत ने इन दोनों ही मोर्चों पर कोताही बरती है. न्यायिक प्रक्रिया में देरी स्वाभाविक है, लेकिन संसद और कार्यपालिका के ताकतों में भारी परिवर्तन पर गौर करने में देरी और लापरवाही अदालत की वैधानिकता पर सवाल खड़े करता है.
पुरानी कहावत है कि सुप्रीम कोर्ट अंतिम इसलिए नहीं है कि यह अचूक है, लेकिन यह अचूक है क्योंकि यह अंतिम है. सबरीमाला और पुट्टास्वामी II (यूआइडी/धन विधेयक) मामले में संविधान पीठ द्वारा तय किए जा चुके मुद्दों पर तकरीबन साल भर में ही दोबारा विचार करने से कुछ कटु आलोचकों को यह कहने का मौका मिला है कि सुप्रीम कोर्ट न तो अचूक है और न ही अंतिम.
सबरीमाला और तीन तलाक मामलों जैसे पितृसत्तात्मक प्रथाओं के मामले अदालत के सामने आए, लेकिन अदालत में संवैधानिक भ्रम का दौर चल रहा है जिसकी झलक सबरीमाला मामले को बड़ी पीठ में भेजने में देखा जा सकता है.
समलैंगिकता को अपराध न मानने के लिए मुकदमे का कठिन क्रम सितंबर 2018 में अपने मुकाम पर पहुंचा. अगस्त 2017 में गोपनीयता मामले के फैसले में अदालत की बहुसंख्यकवाद के विपरीत होने की जिम्मेदारी उभर कर सामने आई थी. फैसले में अदालत ने कहा था कि ''संवैधानिक अधिकारों की गारंटी उनके के लिए बहुसंख्यकों की धारणा के सकारात्मक होने पर निर्भर नहीं करती.'' निजता के अधिकार पर इस निर्णय के बाद अदालत का उस बिंदु पर पहुंचना अपरिहार्य था जहां समलैंगिकता को अपराध मानना जारी नहीं रखा जा सकता था.
धारा 377 से जुड़े मुकदमे ने कानूनी भाषा में संवैधानिक नैतिकता की अवधारणा को सार्वजनिक नैतिकता से अलग स्थापित किया है. यह एक संभावनाशील विचार है जिसे दुरुपयोग या अति प्रयोग के कारण मरने से बचाना होगा.
निजता वाले मामले में नौ न्यायाधीशों ने एक स्वर से निजता को मौलिक अधिकार माना था. उसका प्रस्थान-बिंदु अटॉर्नी जनरल की उस दलील से जुड़ा माना जा सकता है कि ''इस देश के लोगों को निजता का अधिकार नहीं है, उससे जरा भी अधिक नहीं जितना सरकार और संसद देने को तैयार हों.'' इससे तो हमारी सांसें ही रुक गई थीं. संवैधानिक योजना में राज्य को यह दायित्व दिया गया है कि वह हमारे अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा करे, उनका विस्तार करे. यही उसके अस्तित्व का कारण है. ऐसे में, अटॉर्नी जनरल का किसी अधिकार के समापन का दावा निश्चित रूप से डरावना था. बाद में फैसले में उसे मनुष्य की जन्मजात गरिमा और स्वायत्तता की रक्षा के लिए आवश्यक 'अकाट्य प्राकृतिक अधिकार' कहा गया.
निजता का मामला यूआइडी परियोजना को दी गई चुनौती के क्रम में आया था और इस पर फैसला स्पष्ट शब्दों में था कि हमारे संवैधानिक अधिकारों को समाप्त नहीं किया जा सकता. हम उनका प्रयोग करें या न करें, लेकिन वे अधिकार हर हाल में हम सबके पास होते ही हैं.
यूआइडी मामले में न्यायमूर्ति सीकरी के लिखा बहुमत का फैसला इस बारे में अन्य तरीके से विचार करता है. उन्होंने लिखा कि गरीब को गोपनीयता की नहीं, बल्कि भोजन, आश्रय और रोजगार के माध्यम से मिलने वाली गरिमा की आवश्यकता है. निजता के मामले का निर्णय इसे बहुत अलग तरीके से देखता है, ''यह कहना कि गरीबों को नागरिक और राजनैतिक अधिकारों की आवश्यकता नहीं है और उनकी चिंताएं केवल आर्थिक कल्याण तक सीमित हैं, ऐसी बात है जिसका उपयोग इतिहास में मानवाधिकारों के सबसे धृष्टतापूर्ण उल्लंघनों के लिए हुआ है.''
ऐसे भी मामले हैं जिनमें कोई देरी बर्दाश्त नहीं की जा सकती. कश्मीर में महीनों से सैकड़ों लोगों की गिरफ्तारी और नजरबंदी चल रही है, और फिर भी अदालत ने बेवजह संयम बरतते हुए सरकार को न जाने क्या करने के लिए अधिक से अधिक समय दिया है. इसी तरह, कश्मीर में टेलीफोन और इंटरनेट संचार व्यवस्था के निलंबन से निपटने के मामले में महीनों से कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, फिर भी अदालत सरकार की मांग पर उसे मनचाहा समय देती जा रही है.
अनुच्छेद 370 में गढ़ी गई कानूनी कथाओं, किसी राज्य के दर्जे को घटाकर केंद्रशासित प्रदेशों में बदल देने, जम्मू-कश्मीर के संविधान को एकतरफा तरीके से समाप्त किए जाने को चुनौती देने के मामलों में सुनवाई को स्थगित करके उन कामों को निर्विवाद तरीके से पूरा होने देने की कोई सफाई नहीं दी जा सकती, सिवाय इसके कि उसने ऐसा करके सरकार के प्रति असाधारण सम्मान दिखाया है. लोगों और राज्य के प्रति इस तरह का व्यवहार ही लोगों को स्थितियों की तुलना इमरजेंसी के दौरान बंदी प्रत्यक्षीकरण मामलों से करने को प्रेरित करता है जिसमें अदालत ने सरकार को ठीक ठहराते हुए कहा था कि बड़े पैमाने पर गिरक्रतारियां, हिरासत, यहां तक कि जीवन लेने की स्थितियां भी ठीक हैं जिनमें अदालत को चुप रह कर ऐसे अपराध में साझीदार रहना चाहिए. यह कितना संवैधानिक है?
राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) मामले में भी इमरजेंसी का साया दिखाई दे रहा है. यह नागरिकता के मूल विचार के साथ छेड़छाड़ और कुछ लोगों को छांट कर अलग करने और सांप्रदायिक राजनीति करने की पटकथा ही है लेकिन इस पटकथा के पहले अध्याय का मंचन असम में हो चुका है, जिसके सूत्रधार तब के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ही हैं. जब सरकारी कार्रवाई विसंगतियों और घोर उल्लंघनों की वजह बने तो हम अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं. लेकिन जब अदालत ही कोई ऐसी नुक्सानदेह कार्रवाई कर रही हो तो लोग कहां जाएं?
अयोध्या मामले का निर्णय किसी विवाद को अंतिम रूप देने का तरीका उपलब्ध करा सकता है, लेकिन उसके आंतरिक विरोधाभास खत्म नहीं हो पा रहे हैं. यह तय करने के बाद कि यह एक संपत्ति विवाद था, और यह मानते हुए कि इसे विश्वास या आस्था के विषय के रूप में तय नहीं किया जा सकता है, यह हिंदुओं की आस्था का मामला कैसे बन गया?
अदालत को इस बात का कोई सबूत नहीं मिला था कि मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर या उसकी जगह बनाई गई थी. उसने मस्जिद में राम की मूर्ति की स्थापना को मस्जिद को 'अपवित्र' करने की कार्रवाई माना और मस्जिद के विध्वंस को एक आपराधिक कृत्य बातया. इसने संपत्ति के टुकड़े करने को 'कानूनी रूप से अस्थिर' और 'सार्वजनिक शांति तथा सद्भाव बनाए रखने की दृष्टि से भी 'उपयुक्त' नहीं माना. और, यह मानते हुए कि मुसलमान अपना दावा साबित नहीं कर सके थे, अदालत ने पूरी जमीन हिंदुओं को सौंप दी. अगर यह एक समझौता था, तो स्पष्टत: बहुसंख्यकवाद के नजरिए के विपरीत समझौता नहीं था. अगर यह निर्णय बरकरार रहता है और उस भूमि पर मंदिर बनाया जाता है तो यह इतिहास का एक अजीब और विचित्र उदाहरण हो सकता है कि मंदिर वहीं बनाया जाएगा, जहां एक मस्जिद को ध्वस्त किया गया था.
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