क्रांतिकारी दशकः सवर्णों की दुनिया दूर

क्रांतिकारी बदलाव की हवाएं भी आखिर क्यों देश की अंधेरी दलित वस्तियों से रुख मोड़ लेती हैं

इलस्ट्रेशनः तन्मय चक्रवर्ती
इलस्ट्रेशनः तन्मय चक्रवर्ती

विजेता कुमार

भले कुछ परिवारों में टिंडर (डेटिंग ऐप) देर से शुरू आया हो, मगर मेरे घर में तो बिल्कुल ही नहीं आया. मेरे चचेरे भाई-बहनों और विस्तारित परिवार में इसे अनदेखा करना बेहद सामान्य है क्योंकि हम अभी भी यह सीख ही रहे हैं कि अपने दलित मां-बाप से प्रेम-विवाह की चर्चा कैसे करें. मेरी सबसे करीब की दुनिया में लड़कियों के लिए अभी भी प्यार और रिश्तों में साड़ी की परेशानियां किसी भी और से ज्यादा बड़ी हैं. 2013 में, एक चचेरी बहन को अपने भावी दूल्हे के साथ चल रही बातचीत के बीच में साड़ी पहनकर 'दिखाने' को कहा गया. वह तमतमाती हुई अपने कमरे में गई. कमरा बंद किया और अगले 30 मिनट तक ऊंची आवाज में ग्रेज एनाटॉमी देखती रही. मेरी बहन के शर्मिंदा मां-बाप और लड़के के अभिभावक ने खिसियाए-से चाय की चुस्कियां लेते वे 30 मिनट बिताए.

या, फिर 2018 में एक दूसरी चचेरी बहन का रिश्ता लगभग तय हो चुका था कि दूल्हे के परिवार ने कहा, ''अगली बार कृपया उसे साड़ी पहनने को कहें?'' एक हफ्ते बाद जब वे फिर मिले, तो मेरी चचेरी बहन ने खूबसूरत सिल्क की साड़ी पहनी और शादी के लिए कहा, ''नहीं, धन्यवाद.'' ऐसे स्थिति कुछ अजीब होती है. इन मामलों में लड़कियों ने मना करने की एक विचित्र शक्ति दिखाई थी लेकिन वे ऐसी दुनिया में फंसी होती हैं जिसमें 'ना' कहने की हिम्मत नहीं पैदा होती.

कई दशकों तक प्रेम विवाह के खिलाफ मजबूती से खड़े रहने के बाद इस साल, मेरी मां मुझे एक पारिवारिक आयोजन के दौरान अकेले बुलाकर धीरे-से बोलीं, ''हमें कोई मुस्लिम या ईसाई लड़का भी मंजूर होगा.'' यह वही मां है जो मेरी शादी तभी कराना चाहती थीं जब मैं 18 साल की थी (उस हिंदू लड़के से नहीं जिसे मैं प्यार करती थी) और आज वह इस बात को लेकर चिंतित हैं कि उनकी 31 वषीया बेटी शायद कभी शादी ही नहीं करना चाहेगी.

शहरी दलित मां-बाप के लिए, यह दशक कठोर और हैरान करने वाला रहा है. पिछले दशक में जब उन्होंने शहरों की ओर रुख किया तो वे अपने बच्चों को पहले स्कूल और कॉलेज में पढ़ाना और फिर नौकरियों के लिए तैयार करना चाहते थे. लेकिन जब उन्हें अब बालिग बच्चों के साथ समझदार आदमी की तरह बर्ताव करने की जरूरत थी जिनके कुछ ख्वाब हो सकते हैं और जो प्यार में भी पड़ जाते हैं, तो वे हैरान हो उठे. न ही हम आगे आने वाली स्थितियों से निपटने को तैयार थे.

सवर्णों की दुनिया में बड़े और बूढ़े हुए दलित माता-पिता के साथ बातचीत करना विभिन्न स्तरों पर चुनौतीपूर्ण है. जब उन्होंने हमें पाला-पोसा तो बड़ी सावधानी से अपने अतीत की परछाई से बचाकर रखा, उन्होंने हमें इस तरह तैयार किया कि हमें अपने अतीत को भूलकर और उन चीजों का क्चबाव संजोने को कहा जिस पर उनका कोई अधिकार नहीं था. 

ऐसी दुनिया में, जहां प्रेम और हिंसा के आख्यानों पर सवर्णों का ही वर्चस्व है, अवर्णों की इच्छाओं को तो प्रकट होने से पहले ही मिटा दिया जाता है. मेरी पीढ़ी के दलित बालिगों की अपने माता-पिता के प्रति कड़वाहट भावनाओं की एक उलझन है, क्योंकि इसमें क्रोध और सहानुभूति दोनों ही हैं; हमें उनसे पहले दलित और फिर माता-पिता के रूप में सामना करना पड़ता है.

2009 में, मैंने दक्षिणपंथी नैतिक पहरुओं की ज्यादतियों के खिलाफ शुरू हुए 'गुलाबी चड्डी' अभियान में एक मामूली योगदान दिया. उसी साल बाद में, मुझे यह जानकर बहुत सदमा लगा कि मेरे पिता ने प्रमोद मुतालिक और उनके श्रीराम सेने को 'भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए' दस हजार रुपए का चंदा दिया. मैं बेहद नाराज और बेचैन थी, इसलिए मैंने एक और अंडरवियर भेजा और फिर हार मान ली. कुछ समय पहले, एक आंबेडकरवादी प्रकाशक ने मुझसे पूछा था कि मेरे पिता इतने दक्षिणपंथी और दलित विरोधी क्यों थे. मैं हंसी. सवर्णें की दुनिया में एक दलित व्यक्ति से वह और क्या उम्मीद करते हैं?

हालांकि 2010 का दशक नैतिक पहरुओं और लव जिहाद और उन दोनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का दशक था और यही दशक धारा 377 को खत्म करने जैसे अन्य महत्वपूर्ण क्षणों का साक्षी रहा है, हम धीरे-धीरे ही सही पर इस सच्चाई को स्वीकार रहे हैं कि दलित परिवारों, चाहे शहरी हो या गैर-शहरी सबकी स्थिति एक जैसी है, को वैसे अधिकार नहीं हैं जैसा रियल टाइम न्यूज का होता है. हम या तो बहुत आगे हैं और खबरें मुश्किल से हमारी गति को पकड़ती हैं या इतना पीछे कि कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि हम अभी भी '90 के दशक में हैं. हम वास्तविक समय में जीवन बिताते लगते नहीं, जबकि हमारा वजूद आज मौजूद है.

अगर कोई वास्तविक समय में न जी रहा हो तो, इस देश में आज जो कुछ हो रहा है, उसको देखते हुए अच्छी धारणा बनाना आसान नहीं है. एक विचित्र बदलाव में, ट्विटर एक अड्डा बन गया लगता है जहां दलितों की युवा पीढ़ी रियल टाइम की भावना का अनुभव करती है. कई दलित महिलाओं के लिए, इस तरह के रियल टाइम के समुदाय में होने का यह पहला अनुभव है. अखिल भारतीय दलित महिला मंच की महासचिव और एक्टिविस्ट आशा कोवताल का कहना है कि दो लोगों के बीच के प्रेम की तुलना में, सामुदायिक प्रेम उनके लिए अधिक मूल्यवान है.

हालांकि, वैकल्पिक सोशल मीडिया नेटवर्क स्मैशबोर्ड की सलाहकार क्रिस्टीना धनराज का मानना है कि समुदाय हमेशा इसकी गारंटी नहीं देता है. वे कहती हैं, ''प्यार की कमी हमारे उत्पीडऩ के केंद्र में है. दलित महिलाओं, और विशेष रूप से जो परंपरागत रूप से सुंदर या सवर्णों जैसी नहीं हैं, उन्हें प्यार पाने के लिए मशक्कत करनी होगी. मतलब कि बदले में कुछ पाने के लिए उन्हें बार-बार और अलग-अलग तरीकों से बहुत कुछ देना होता है. इसके बावजूद समुदाय में और रिश्तों में आपको तुच्छ समझा जा सकता है.''

इस दशक ने जो दूसरी चीज दी है वह एक खास तरह का नारीवाद है जो दलित महिलाओं को शामिल करने में खुद को असुविधाजनक पा रहा है. मूलत: यह अपने से इतर लोगों की प्यार, हिंसा या यहां तक कि इच्छाओं को समझने में सवर्ण व्यवस्थाओं की विफलता का प्रतिनिधित्व करता है. वे तेजी से विकसित होने वाले नए संस्करणों को देखते हुए अपने खुद के पुराने संस्करणों को सेंसर करने और खारिज करने की शीघ्रता में हैं.

2017 में आई हिट तेलुगु फिल्म अर्जुन रेड्डी की मूक हीरोइन प्रीति की कहानी कुछ जानी-पहचानी थी, जिसे झुठलाना मुझे मुश्किल लगा. 'हां', 'नहीं', 'मत करो' 'दफा हो जाओ' कहने की उसकी अक्षमता ने मुझे परेशान कर दिया. इसने 10 साल पहले की यादें ताजा कर दीं जब मैंने इससे बदतर स्थिति देखी थी. 2007 में हिंसक, अपमानजनक अर्जुन रेड्डी जैसा प्यार ही था जिसे मैं जानती थी और अधिक जानना चाहती थी. इसलिए नहीं कि घर में हिंसा का माहौल देखा था या फिर इसलिए भी नहीं कि मुझ पर बॉलीवुड या टॉलीवुड का ज्यादा ही खुमार चढ़ा था बल्कि इसलिए कि यह मेरे चारों ओर हो रहा था, मेरी दोस्तों के साथ या फिर मेरी बहनों के साथ.

कहने की जरूरत नहीं कि मैं खुद भी ऐसी ही लड़की बनना चाहती थी. ये ज्यादातर सीधे-बालों वाली उच्च जाति की लड़कियां थीं, जिनका लज्जापूर्ण व्यवहार मुझे बड़ा लुभाता था और मैंने उसकी नकल की असफल कोशिश भी की. वे बहुत सुंदर थीं लेकिन उनके जीवन में भी कोई उत्साह नहीं दिखता था. हमारी तरह वे भी परेशान थीं. हां, परेशानियां अलग-अलग थीं. लेकिन यह तथ्य कि वे लड़कों और लड़कियों के बीच समान रूप से लोकप्रिय थीं और इससे मैं यह मानने लगी थी कि प्रेम कहानियां (कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस तरह की) केवल उन जैसी लड़कियों के लिए बनाई गई थीं. मैं खुद को इस तरह से प्यार या चाहने के लायक नहीं पाती थी किसी के भीतर मेरे लिए भी कोई जुनून, और कम आक्रामकता पैदा कर सके. आज, मैं 'ईश्वर का आभार' मानती हूं.

अधिक महत्वपूर्ण बात, नारीवादी तब तक दुरुस्त नहीं है जब तक हम उसे अतीत के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिए जगह नहीं देते, जब हमने मूर्खतापूर्ण तरीके से उस हिंसा का बचाव किया था. अगर गुंजाइश होती, तो ख्वाहिशों बदलती जटिल प्रकृति शायद अधिक कठोर वार्तालाप करती. यह भी चौंकाने वाला है कि फिल्म को लेकर ज्यादा हंगामा खड़ा हो जाता लेकिन इससे कहीं अधिक हिंसक प्रथाएं जैसे कि ट्रांस बिल को अमानवीय बताना, जो 5 दिसंबर, 2019 को राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त कर चुका है, और अब कानून है.

लेखिका बेंगलूरु के सेंट जोसफ्स कॉलेज में अंग्रेजी और पत्रकारिता पढ़ाती हैं.

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