भारतीय हिंदू गणतंत्र का निर्माण चालू आहे

अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों का संघर्ष अब इतिहास हुआ, अब तो जंग मुसलमानों के खिलाफ है जो हिंदू प्रभुसत्ता पूरी तरह कायम होने तक चालू रहेगी

इलस्ट्रेशनः तन्मय चक्रवर्ती
इलस्ट्रेशनः तन्मय चक्रवर्ती

सुधींद्र कुलकर्णी

अब किसी मुगालते में मत रहिए. गणतंत्र 2.0 नमूदार हो रहा है. गति जो भी हो, उसे लाने की बड़ी गंभीर कोशिश चल रही है. 21वीं सदी का दूसरा दशक इतिहास में इसी बात के लिए जाना जाएगा कि इसमें नरेंद्र मोदी सरकार ने भारत को एक हिंदू गणतंत्र बनाने की सचेतन, इरादतन और प्रतिबद्ध कोशिश की शुरुआत की. इसके पीछे उनका तर्क है—पाकिस्तान और अफगानिस्तान खुद को अगर इस्लामीक गणतंत्र कह सकते हैं, और हमारा एक और मुसलमान-बहुल पड़ोसी बांग्लादेश इस्लाम को अपना राज्य धर्म घोषित कर सकता है तो फिर भला क्यों नहीं हिंदू-बहुल भारत एक हिंदू गणतंत्र बन सकता है? नागरिकता संशोधन विधेयक का पारित होना आने वाले सालों और दशकों में इसी बदलाव की एक प्रस्तावना है.

भारत ने 1952 के बाद से 17 संसदीय चुनाव देखे हैं. राजनैतिक दल चुनाव जीते और हारे हैं. सरकारें और प्रधानमंत्री आए-गए हैं. आपातकाल (1975-77) के दौरान एक तानाशाही शासन थोपने की नाकाम कोशिश को छोड़ दें तो भारतीय राज्य और मीडिया समेत उसकी लोकतांत्रिक संस्थाएं कमोबेश राजनैतिक सत्ता के बदलाव से बेपरवाह ही रही हैं. समाज भी सियासी दलों की बदलती नियति के नियंत्रण से तकरीबन बाहर रहा है.

लेकिन कुछ ही दिनों में खत्म होने वाले इस दशक में हुए दो बड़े अहम चुनावों के बाद जो होना शुरू हुआ है, वह कुछ अलग है—काफी अलग और अनिष्टकारी. मोदी का 2014 में सत्ता में आना और फिर 2019 में उसे और भी तगड़े बहुमत के साथ मजबूत करना, ये भारतीय राज्य और समाज के विकासक्रम में कोई सामान्य उपलब्धि नहीं हैं. वे संघ परिवार—एक विचारधारात्मक परिवार, जिसका हिस्सा हमारी सत्तारूढ़ पार्टी है—की इस योजना की भूमिका सामने रखते हैं जिसमें भारत राज्य को एक हिंदू राज्य में, भारतीय समाज को एक हिंदू-बहुल समाज से हिंदू बहुसंख्यकवादी समाज में, और अंतत: भारत राष्ट्र को एक हिंदू राष्ट्र में तब्दील करना शामिल है. मोदी ने जिस 'नए भारत' की रचना का वादा किया था, यह वही है?

अंग्रेजों के शासन से हासिल की गई आजादी वास्तव में उस संघर्ष की परिणति थी जिसमें हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों और अन्य समुदायों ने राष्ट्रीय एकता की एक प्रेरक मिसाल पेश करते हुए हिस्सा लिया था. इस हकीकत को भारत का त्रासदीपूर्ण विभाजन भी नकार नहीं सकता. पर वह आजादी हासिल करने के बाद के सात दशकों में पहले कभी मुसलमानों को अपनी ही जमीन पर इतना पराया नहीं महसूस कराया गया जितना अब कराया जा रहा है. भारत ने पहले कभी ऐसा आक्रामक हिंदू विजयोन्माद नहीं देखा.

धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान, राज्य और समाज की आधारशिला रही है. उस पर आज जैसा हमला पहले कभी नहीं हुआ. भारतीय जनता पार्टी के शासन का सबसे बड़ा मकसद अब यही है कि इस आधारशिला को प्रभावी और कानूनी तौर पर भी हटाकर उसे राज्य और समाज दोनों के स्तर पर 'सबसे पहले हिंदू' के सिद्धांत से बदल दिया जाए. खुद से पूछिए—मई 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद क्या नरेंद्र मोदी ने एक बार भी धर्मनिरपेक्षता के प्रति अपनी कटिबद्धता की पुष्टि की है? प्रधानमंत्री खुद ही धर्मनिरपेक्षता से अपने परहेज को छुपाने की कोई कोशिश नहीं कर रहे, इसलिए उनके समर्थकों की लंबी-चौड़ी जमात उसे 'सिकुलरिज्म' यानी मुसलमानों के तुष्टीकरण का एक बहाना बताकर खारिज कर दे रहे हैं.

एक समुदाय को राष्ट्रीयताविहीन कर देना या और नहीं तो देश में उसकी जगह को कमतर कर देना—यही नागरिकता संशोधन विधेयक और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एनआरसी) का छिपा मकसद है. यह कानून यकीनी तौर पर धर्म के आधार पर नागरिकों में भेदभाव करता है, लिहाजा भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन है. यह कानून बनाकर मोदी सरकार कह रही है कि भारत मुसलमानों के बजाए हिंदुओं का ज्यादा है. किसी को कभी इस बात का सुबूत चाहिए कि भाजपा का मौजूदा नेतृत्व उसी 'दो राष्ट्र के सिद्धांत' में यकीन करता है जिसे विभाजन से पहले की मुस्लिम लीग ने अलग 'मुस्लिम राष्ट्र' की मांग को लेकर प्रतिपादित किया था तो वह उनके सामने अब मौजूद है. यह तो महज इसी तरह के कई और भेदभावपूर्ण कानूनों/नीतियों की शुरुआत भर होगी.

जाहिर है कि जब सुप्रीम कोर्ट नागरिकता संशोधन विधेयक की संवैधानिक वैधता के बारे में अपना फैसला सुनाएगा तो उसकी स्वतंत्रता की और संविधान के प्रति उसकी निष्ठा की कड़ी परीक्षा होगी. पर हम इसे लेकर भी ज्यादा आशावादी नहीं हो सकते. बिना आपातकाल घोषित किए और मीडिया के बड़े हिस्से को अपना चरणवंदक बनाकर सरकार ने पहले ही भारतीय राज्य के उस पारंपरिक ताने-बाने से काफी हद तक छेड़छाड़ कर ली है, जिसमें उसके विभिन्न स्तंभों के बीच नियंत्रण और संतुलन कायम हुआ करते थे. मिसाल देखें: 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए प्रचार के दौरान अपने भाषणों में प्रधानमंत्री ने बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक ध्रुवीकरण स्थापित करने की कोशिश की और चुनाव आयोग आंख-कान बंद किए रहा. फिर जब आयोग के एक साहसी सदस्य ने इस संवैधानिक संस्था के एक स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से काम करने देने की मंशा जाहिर की तो उसे तुरंत निशाने पर लिया गया. सो, नौकरशाही और यहां तक कि न्यायपालिका को भी इशारा साफ है—हमारे इशारों पर चलें वरना कीमत भुगतने को तैयार रहें. इसलिए हैरानी की बात नहीं कि सरकार के सियासी मकसदों पर चलते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर में आम लोगों और उनके राजनैतिक प्रतिनिधियों के लोकतांत्रिक अधिकारों के लंबे समय से चले आ रहे हनन के मुद्दे को उठाने में तत्परता नहीं दिखाई है.

आखिर संघ परिवार गणतंत्र 2.0 क्यों चाहता है? क्योंकि उसने गणतंत्र 1.0 की रचना में कोई अहम भूमिका नहीं निभाई थी. उसके पास उस दौर में अपने कहलाने लायक नायक बहुत कम रहे हैं. यही वजह है कि वह सरदार पटेल और महात्मा गांधी तक को अपनी धारा में समाहित कर लेना चाहता है (हालांकि गांधी के साथ ऐसा कर पाना उसके लिए बहुत मुश्किल प्रतीत हो रहा है). इसीलिए वह गणतंत्र 1.0 के इतिहास को झुठलाने की बेशर्म कोशिशें कर रहा है और कांग्रेस को उसके नायक की जगह खलनायक के तौर पर पेश कर रहा है. गृह मंत्री अमित शाह की लोकसभा में यह गलतबयानी कि—कांग्रेस ही धर्म के आधार पर देश विभाजन के लिए जिम्मेदार है—महज कोई ऐसे ही दे दिया गया बयान नहीं.

उसका मकसद यह है कि भाजपा के भारत के अपने धर्म आधारित ध्रुवीकरण को वैधानिकता प्रदान कर दी जाए. हिंदू समुदाय को उसकी धूर्तता भरी अपील साफ है—अंग्रेजी शासन के खिलाफ भारत का संघर्ष अब इतिहास हुआ, लेकिन असली 'अन्य' लोगों—यानी मुसलमान, जिन्होंने कहीं ज्यादा लंबे मुस्लिम शासन के दौरान इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया—के खिलाफ संघर्ष तब तक जारी रहना चाहिए जब तक हिंदू प्रभुसत्ता पूरी तरह से स्थापित न हो जाए. यही है जिसे संघ परिवार 1947 से पहले भी हासिल करना चाहता था—समूचा 'अखंड भारत' एक 'हिंदू राष्ट्र' में तब्दील हो जाए—लेकिन वह हो न सका. सात दशक बाद भी, इस महत्वाकांक्षा में कोई तब्दीली नहीं आई है.

हिंदू धर्म का राजनीतिकरण और हिंदुत्व की बुनियाद पर एक नए गणतंत्र की इमारत की रचना बहुधर्मी भारत को खासी चोट पहुंचाएगी. हाल ही में लाहौर में मेरी मुलाकात प्रक्चयात पाकिस्तानी शिक्षाविद् एफ.एस. एजाजुद्दीन से हुई थी. उनके चेतावनी भरे अल्फाज अब भी कानों में गूंज रहे हैं, ''हम पाकिस्तानियों ने बड़ी कीमत चुकाई है—हिंसक संघर्ष, संप्रदायवाद, उग्रवाद, असहिष्णुता और अधिकारों व आजादी के हनन के रूप में—क्योंकि हमने अपने राज्य और समाज का इस्लामीकरण हो जाने दिया. अब अगर हिंदूकरण की छूट देकर भारत भी वही गलती दोहराना चाहता है, तो उसकी मर्जी. लेकिन याद रखिएगा कि भारत को इसकी हमसे भी कहीं ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी.''

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