क्रांतिकारी दशकः आसमानी उम्मीदों तले गहराती फिक्र
एक ऐसे समय में जब वैश्विक नजरिए के साथ पेश आने की अपेक्षा थी, विभिन्न देशों ने राष्ट्रवादी और स्थानीयतावादी आकांक्षाओं के सामने घुटने टेके

श्याम सरन
कह सकते हैं कि 2010-19 के दशक की रूपरेखा टेक्नोलॉजी ने तय की और यही अगले दशक को अज्ञात-अप्रत्याशित इलाकों में आगे ले जाएगी. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, मशीन लर्निंग और बायोनिक्स विज्ञान कथा भर होने से आगे बढ़ कर व्यावहारिक वास्तविकता बन गईं. डिजिटल तकनीकें सर्वोपरि हो गईं और डेटा नया संसाधन बन गया. टेक्नोलॉजी ताकत की मुद्रा के रूप में उभरी है और यह भू-राजनीति को बदलने की शुरुआत कर रही है.
नए किस्म की अपरिचित राहों पर बढ़ते हुए अपने कालातीत ढांचों में जकड़े राज्यों (देशों) ने राष्ट्रवादी और स्थानीयतावादी आग्रहों का शिकार बनते हुए ऐसे वक्त में राजनीतिक टूटनों को जन्म दिया जब निर्माणाधीन नई दुनिया को उनसे ऐसी प्रतिक्रिया की अपेक्षा थी जो राष्ट्रीय सीमाओं से मुक्त और बाध्यकारी पारस्परिक सहयोग को प्रतिबिंबित करने वाली हो. डिजिटल तकनीकें व्यापक होकर सामाजिक प्रक्रियाओं और मानवीय संपर्क-संबंधों को प्रभावित करने वाली हो गईं. दुनिया कई स्तरों पर गहरे जुड़ गई है और सूचनाओं का प्रवाह तात्कालिक हो गया है.
यह स्थिति सूचना तक आसान पहुंच के माध्यम से लोकतंत्र को मजबूत करती है, भले इसी से राज्य सत्ता को सर्वसत्तावादी नियंत्रण के अधिक परिष्कृत उपकरणों का उपयोग करने की क्षमता मिलती हो. उदारवादी लोकतंत्र को पीछे हटना पड़ा क्योंकि लोगों की राजनैतिक प्राथमिकताएं ऐसे 'मजबूत और निर्णायक नेतृत्व' के पक्ष में झुक गई थीं जो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की स्वाभाविक हिचकिचाहट और विचारशील प्रकृति से ऊपर उठ सके. इस दशक की मुख्य प्रवृत्ति के रूप में ऐसे लोकापेक्षी और अधिनायकवादी नेताओं के उदय को चिन्हित किया जा सकता है जो नए कौशल और क्षमताओं की मांग करने वाली नई तकनीकों के प्रयोग से बढ़ती धन और आय की असमानताओं के खिलाफ बढ़ते आक्रोश को अपने पक्ष में मोडऩे में सक्षम थे.
हमने यह बात अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप के अप्रत्याशित निर्वाचन में देखी. ब्रिटेन में ब्रेक्जिट के प्रति समर्थन में भी इसे स्पष्ट देखा जा सकता है. चीन के पास शी जिनपिंग जैसा शक्तिशाली और सर्वसत्तावादी नेता है जबकि रूस के व्लादिमिर पुतिन एक मजबूत और निर्णायक नेता की छवि पेश करते हैं. एकाग्र संप्रभुता और क्षेत्रीय एकीकरण के एक मॉडल का प्रतिनिधित्व करने वाले यूरोपीय संघ में टूटन शुरू हो गई और इसके सदस्य देशों में भी लोकापेक्षी नेताओं की अपनी खेप है.
भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निर्विवाद राजनैतिक नेता के रूप में उभरे हैं. मजबूत नेतृत्व के साथ संसद में बहुमत रखने वाली सरकार से तेज प्रगति और गहराई तक जाने वाले सुधारों की आरंभिक अपेक्षाएं थीं. हर नेता अपनी ही तरह से दूसरों के मुकाबले अपने राष्ट्र के हितों की प्राथमिकता का दावा करता है. भारत ने भी राष्ट्रवादी भावनाओं का ज्वार देखा है. लेकिन यह प्रवृत्ति इस वास्तविकता के विपरीत है कि दुनिया के सामने खड़ी ज्यादातर चुनौतियों की प्रकृति पारराष्ट्रिक है और इन्हें राष्ट्रीय या यहां तक कि किसी क्षेत्रीय किस्म के हल से नहीं निबटाया जा सकता. तकनीक ने घरेलू और विदेशी के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है. केवल अंतरराष्ट्रीयतावाद और बहुपक्षीय संस्थाओं तथा प्रक्रियाओं पर भरोसे के सहारे ही हम जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष में शांति, व्यापक संहार के हथियारों का अप्रसार तथा वैश्विक स्वास्थ्य चिंताओं जैसी चुनौतियों का मुकाबला कर सकते हैं. इस ज्वलंत विरोधाभास ने बीते दशक को परिभाषित किया है.
इस दौरान कुछ सुनहरे मौके भी आए. 2015 में पेरिस में एकत्र हुए नेताओं ने जलवायु परिवर्तन पर ऐतिहासिक पेरिस समझौता किया. यह सर्वसम्मत दस्तावेज हस्ताक्षरी देशों के बीच औसत वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेंटीग्रेड से कम रखने का समझौता है, लेकिन इसका लक्ष्य तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड भी कम रखने का है. इस समझौते को व्यावहारिक कार्यों में बदलने के लिए सदस्य राज्यों के बीच बातचीत जारी है. इस दिशा में अब तक व्यक्त की गई प्रतिबद्धताएं घोषित उद्देश्य से काफी पीछे हैं. सभी पक्षों में ऐसा विश्वास करने की प्रवृत्ति दिखती है कि प्रौद्योगिकी किसी न किसी तरह से जलवायु संकट का समाधान खोज लेगी, लेकिन एक बहुत ही तथ्यपरक संभावना यह है कि प्रौद्योगिकी इस संकट का कोई हल निकाले, उससे पहले ही दुनिया को एक अपरिवर्तनीय पारिस्थितिकीय तबाही का शिकार होना पड़े.
बीते दशक ने भूराजनीतिक परिदृश्य में भारी बदलाव देखे. अमेरिका वैश्विक सैन्य पहुंच के साथ एकमात्र महाशक्ति बना हुआ है, लेकिन चीन की ताकत में लगातार तेज वृद्धि और अन्य प्रमुख क्षेत्रीय शक्तियों के उदय के परिणामस्वरूप इसके आपेक्षिक प्रभाव में कमी आई है. अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के केंद्र में उतना व्यापार नहीं है जितना कि स्थापित और महत्वाकांक्षी महाशक्तियों के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है और टेक्नोलॉजी इस प्रतिस्पर्धा की प्रमुख संचालक है. चीन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग और जैव प्रौद्योगिकी सहित उच्च प्रौद्योगिकी में अमेरिका के दबदबे को ललकारते हुए क्षमताओं में फासले को लगातार कम कर रहा है. अब तक अमेरिका और चीनी अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे से गुंथी हुई थीं, लेकिन अब हम इनमें आंशिक रूप से अलगाव के संकेत दिख रहे हैं.
दशक में चीन का बोलबाला रहा और वह अमेरिका के साथ बराबर की सह-शक्ति के रूप में वर्चस्व स्थापित करने के प्रतिबद्ध प्रयास करता रहा. 2012 में शीर्ष चीनी नेता के रूप में शी जिनपिंग के आने से चीन की विदेश नीति का एक नया और अधिक मुखर चरण शुरू हुआ. दक्षिण चीन सागर में द्वीपों पर कब्जा और उनका सैन्यीकरण, देश के उत्तरी भाग में वायु रक्षा क्षेत्र की घोषणा और संयुक्त राष्ट्र में पूरे दक्षिण चीन सागर पर औपचारिक दावा पेश करते हुए चीन ने देंग श्याओपिंग के चुपचाप अपने काम में लगे रहने और समय से पहले नेतृत्वकारी भूमिका की मांग न करने की चतुर नीति के अंत का संकेत दिया.
जिनपिंग ने 2013 में चीन को केंद्र बनाकर पूरी दुनिया में परिवहन, संचार तथा डिजिटल संपर्क संजाल स्थापित करने की महत्वाकांक्षी बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआइ) की भी घोषणा की. अनुमान है कि इस समूची परियोजना पर लगभग एक ट्रिलियन डॉलर का चीनी निवेश होगा. इसमें भारत के पड़ोसी देशों को भी लक्ष्य करते हुए पाकिस्तान को प्रमुख स्थान दिया गया है जिसे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीईपीसी) के अंतर्गत 60 अरब डॉलर से अधिक की परियोजना पूंजी मिल सकती है.
भारत और चीन के बीच आर्थिक और सैन्य क्षमताओं के मामले में विषमताएं दशक के दौरान लगातार बढ़ीं जिससे भारतीय विदेश नीति को एक बड़ी चुनौती मिली. मोदी सरकार ने शुरुआती दौर में चीन के खिलाफ अधिक मुखर रुख अपनाया जिसके परिणामस्वरूप 2017 में भारत-भूटान-चीन सीमा स्थित डोकलाम पठार पर भारतीय और चीनी सेना के बीच टकराव हुआ. तब से दोनों पक्ष तनाव वृद्धि न होने देने और सीमा पर उत्तेजक व्यवहार से बचने के प्रयास कर रहे हैं. डोकलाम घटनाक्रम के बाद प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति जिनपिंग की अप्रैल 2018 में वुहान में अनौपचारिक मुलाकात और फिर इस साल अक्तूबर में मामल्लापुरम में हुई दूसरी शिखर बैठक को दोनों पक्षों की ओर से संबंध बनाए रखने के गंभीर प्रयास के रूप में देखा जा सकता है. फिर भी इन प्रयासों के कारण हमारे पड़ोसियों के बीच पैठ बनाने के चीनी प्रयासों मे कोई कमी नहीं आई. भारत भी अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत-प्रशांत क्षेत्र में चीनी ताकत का मुकाबला करने के उद्देश्य से बने चतुष्टकोणीय सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने में लगा रहा.
दशक के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की गति धीमी पडऩे तथा सरकार के स्तर पर अधिक आत्मकेंद्रित आर्थिक रणनीतियों के पुनरुत्थान की चिंताजनक प्रवृत्ति उभरी है. यह पिछले दशक के दौरान कई देशों के साथ हुए भारत के मुक्त व्यापार समझौतों की समीक्षा में प्रतिबिंबित हुई. क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) में शामिल नहीं होने का हालिया निर्णय 1991-92 के बाद से हर तरह के राजनैतिक झुकाव वाली सरकारों के जारी रखे गए आर्थिक सुधार और उदारीकरण की नीतियों में बदलाव करने वाली बात है. तट करों में वृद्धि करते हुए आयात-प्रतिस्थापन रणनीति लागू की जा रही है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण को अपरिहार्य रूप से मंद करेगी.
भाजपा सरकार भारत की विदेश नीति में नई ऊर्जा लाई जिसमें मोदी ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने लिए ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका ग्रहण की. लेकिन क्षेत्रीय और वैश्विक अर्थव्यवस्था के हाशिए पर रहते हुए व्यापक विस्तार वाली वैश्विक भूमिका कायम नहीं रह सकती. शहरों में बढ़ते प्रदूषण और बिगड़ती कानून-व्यवस्था की खबरों से भी भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. कश्मीर में स्थितियां अभी तक सामान्य नहीं हैं और पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्ते सर्वकालिक निम्न स्तर पर हैं. यानी दशक का समापन निराशा और उद्विग्नता के संकेतों के साथ हो रहा है.
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