इंडिया टुडे कॉन्क्लेव-विरोध सिर्फ आतंक का
भारत की समूची कश्मीर नीति में, चाहे वह सरकार की हो या फिर भारत के लोगों की, हमें कश्मीर के लोगों को अपने साथ लेकर चलना है. लिहाजा, चाहे जम्मू-कश्मीर हो या फिर कहीं और, आर्थिक संपन्नता और शारीरिक सुरक्षा बहुत अहमियत रखती है.

पुलवामा में पिछले महीने सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आत्मघाती हमले और उसके बाद बालाकोट में हवाई हमलों के रूप में पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को भारत के जवाब ने आने वाले लोकसभा चुनावों में राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रचार के अहम मुद्दे के तौर पर स्थापित कर दिया है. इंडिया टुडे कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कश्मीर मुद्दे से निबटने में एनडीए सरकार की कथित नाकामी के सवाल का जवाब दिया और साथ में पाकिस्तान को लेकर नई दिल्ली के रुख को साफ किया. जेटली का कहना है कि तमाम देशों का मूल्यांकन उनकी बुनियादी नीतियों के अनुरूप किया जाता है और पाकिस्तान की नीतियां आतंकवाद में धंसी हुई हैं.
दुनियाभर में कहीं भी होने वाले आतंकवादी हमलों में अक्सर कोई-न-कोई 'पाकिस्तानी निशान' जुड़ा होता है. लिहाजा जब तक इस्लामाबाद में आतंकवादियों के खिलाफ कोई प्रामाणिक कार्रवाई नहीं की जाएगी, तब तक आतंकवाद के खिलाफ भारत का रुख नहीं बदलेगा. कश्मीर के मसले में, उनका जोर इस बात पर था कि देश आतंकवादियों और अलगाववादियों से मुकाबला करते हुए कश्मीरियों को अपने से अलग नहीं कर सकता. कश्मीरियत की तारीफ करते हुए उन्होंने इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि घाटी में पहचान का केंद्र अब 'क्षेत्रीय' के बजाए 'धार्मिक' होता जा रहा है और सूफी संस्कृति की जगह वहाबी मत ने ले ली है. ठ्ठ
खास बातें
अवसरों और सुरक्षा के साथ-साथ कश्मीरियों की खुशहाली को सुनिश्चित किया जाना जरूरी है. पृथकतावादियों और आतंकवादियों से अलग तरीके से निबटा जाना चाहिए.
जम्मू-कश्मीर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ गठबंधन एक गैरपारंपरिक प्रयोग था जो कि कारगर साबित नहीं हुआ. वह इस विश्वास पर आधारित था कि कश्मीर में मुख्यधारा की पार्टियों की भूमिका सकारात्मक होनी चाहिए और उसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.
सुरक्षा एजेंसियां अपनी कार्रवाई के ब्यौरे नहीं साझा किया करतीं. स्थिति से निबटने के लिए सशस्त्र सेनाओं और सुरक्षा तथा खुफिया एजेंसियों को पूरी छूट दी जानी चाहिए.
भारत और पाकिस्तान को आतंकवाद के मसले पर एक ही पायदान पर रखकर नहीं देखा जा सकता. एक आतंक फैलाने वाला है तो दूसरा उसका भुक्तभोगी.
2019 के चुनावों में ज्यादा विकल्प नहीं हैं. चार या पांच महागठबंधनों का अनुभव (केंद्र की सरकार में) खासा अनिश्चित रहा है, सब 6-8 महीने से ज्यादा नहीं चले.
जब सत्तारूढ़ पार्टी के पास करीब 200/250/280 सीटें हों तो बीच में एक मजबूत केंद्र के साथ गठबंधन सरकार संभव है. लेकिन अगर क्षेत्रीय पार्टियां, जिनके कभी एक या दोहरे अंकों से ज्यादा सीटें जीतने की उम्मीद ही नहीं की जा सकती, साथ आती हैं तो उनके पास कोई साझा कार्यक्रम नहीं हो सकता.
कोई सुनियोजित रोजगार आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, और बगैर रोजगार में वृद्धि के भारत पांच साल तक निरंतर 7-7.5 फीसदी की दर से नहीं बढ़ रहा होगा. भारत में ज्यादा रोजगार अनौपचारिक क्षेत्र में है और उसे मापने का फिलहाल कोई तरीका नहीं है.
हर राज्य को आर्थिक रूप से पिछड़ा घोषित करके उसे विशेष दर्जा देने से तो भारत के राज्यों का संघ होने की स्थिति तो कमजोर पड़ जाएगी और वह राज्यों का परिसंघ बनकर रह जाएगा. भारत के सामने मौजूद आर्थिक और सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए तो ऐसा कदम राष्ट्रीय हित के खिलाफ होगा.
''अभी मैंने हमारे पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के 'एक-दूसरे को तबाह कर देने का दो देशों का उन्मादी उतावलापन' शीर्षक वाले भाषण का दो मिनट का एक टुकड़ा सुना. आप 'आतंकवाद के शिकार' और 'आतंकवाद की साजिश रचने वाले' दोनों को एकदम बराबरी के पलड़े पर रखे दे रहे हैं. बताइए! इससे बदतर भला क्या हो सकता है?''
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