दांव ऊंचे, उम्मीदें कम
आप उदारवादियों के पाखंड पर जमकर हमला कीजिए, लेकिन अगर आप इसके साथ उदारवाद को निशाना बनाते हैं तो आप गुस्से में खुद को ही नुक्सान पहुंचा रहे हैं.

ऐसे समय में जब सत्ताधारी दल की राय के खिलाफ किसी भी विचार पर देशद्रोही होने की मुहर लगा दी जाती है, प्रताप भानु मेहता लोगों की उम्मीदों को कुंठित करने के लिए हाल की सरकारों, खासकर मौजूदा सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए खुलकर अपनी बात कहते हैं. राष्ट्रवाद, सचाई, आजादी, प्रेस की स्वतंत्रता, धर्म और सभ्यता, मूल्यों और संस्थाओं पर कब्जा आदि को एक-एक कर गिनाते हुए उदाहरणों के साथ मेहता ने बताया कि किस तरह भारत एक ''असंतुष्ट व्यक्तियों, क्षुद्र मानसिकताओं और संकीर्ण विचार रखने वालों'' का देश बन चुका है.
उनका मानना है कि फिलहाल भारतीय लोकतंत्र गहरे संकट में है और आज पांच या 10 साल पहले के मुकाबले उम्मीद कम होती जा रही है. मेहता का कहना था कि विपक्ष भी इस प्रक्रिया में सहभागी है और किसी भी सरकार ने नागरिक स्वतंत्रता के लिए काम नहीं किया है. ठ्ठ
खास बातें
2019 के चुनाव में बहुत ऊंचे दांव लगे हैं. अगर सत्ता का संतुलन बहाल नहीं हुआ तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा. लेकिन विडंबना यह है कि इस चुनाव में उम्मीदें बहुत कम हैं. पिछले 10-15 साल में जो उम्मीदें जगी थीं कि भारत ढांचागत बदलाव के मुहाने पर खड़ा है, भारत ग्रोथ, समावेश और रोजगार पैदा करने के मामले में नए स्तर पर पहुंच जाएगा, मुझे लगता है कि वे सारी उम्मीदें धूमिल हुई हैं.
मेहता ने भारत के विचार के क्षय होने की चेतावनी देते हुए बताया कि इससे देश की राष्ट्रीय एकता, मूलभूत संवैधानिक मूल्य और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए खतरा पैदा होता जा रहा है, और यह एक ऐसी जन संस्कृति को जन्म दे रहा है जो देशवासियों को आपस में विभाजित करती है.
बोलने की स्वतंत्रता जो लोकतंत्र की आधारशिला है, पर हमला किया जा रहा है. मेहता ने इस पर मुंह बंद रखने और नागरिक स्वतंत्रता की नई मांगों का समर्थन न करने के लिए विपक्ष को आड़े हाथों लिया.
मेहता का कहना था कि भ्रष्टाचार पर भी लगाम नहीं लगाई गई है और भारतीय अर्थव्यवस्था पर पैसे वालों की पकड़ कम नहीं हुई है. उन्होंने कहा, ''दुनिया में क्या आप किसी अन्य बड़ी अर्थव्यवस्था के बारे में सोच सकते हैं जहां थैलीशाहों का एक छोटा-सा समूह महत्वपूर्ण क्षेत्रों की एक बहुत बड़ी संख्या पर अपना नियंत्रण रखता हो. वास्तव में यही भ्रष्टाचार है.''
हमारे लोकतंत्र को कुछ हो रहा है जो लोकतंत्र की आत्मा को ही क्षत-विक्षत कर रहा है.
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