राजस्थान: स्वाद और मिजाज का भरा-पूरा खजाना
यह प्रदेश अपने पारंपरिक पकवानों के लिए दुनिया में मशहूर है, चाहे वह दाल-बाटी चूरमा हो, कढ़ी-पकौड़ा या फिर जोधपुर का मिर्ची बड़ा. और बीकानेरी भुजिया को कौन नहीं जानता?

सच पूछा जाए तो खाना कुछ लोगों के लिए सिर्फ जिंदा रहने का साधन भर है, तो कुछ लोगों के लिए यह रौब-रुतबे की चीज होती है. कुछ के लिए तहजीब, कुछ के लिए आनंद तो कुछ के लिए यह अपनी पहचान है. इंडियाना यूनिवर्सिटी में मानव विज्ञान के प्रोफेसर रिचर्ड विल्क कहते हैं, ''मनुष्य के तौर पर आपका पहला संबंध भोजन से होता है.'' ठीक यही फलसफा राजस्थान का है. राजस्थान के एक बड़े हिस्से के रेगिस्तानी होने की वजह से वहां सब्जियां और फल गिने-चुने ही पैदा होते हैं. लोग ज्यादातर अनाज, बाजरा, दाल वगैरह और मांसाहारी भोजन पर आश्रित रहते हैं. राजस्थान के लोगों की युद्ध जैसी जीवनशैली होने की वजह से ऐसे भोजन की जरूरत होती है जो कई दिन तक टिकाऊ हो. इसीलिए वहां तरह-तरह के चटपटे अल्पाहार का चलन ज्यादा है, जैसे भुजिया, मठरी, खट्टे-मीठे सेव, दालमोठ वगैरह. इसके अलावा प्रदेश में कुछ ऐसी मिठाइयां भी बनाई जाती हैं जो जल्दी खराब नहीं होतीं.
यहां के विभिन्न शहरों के अलग-अलग पकवान हैं और अपने अलहदा स्वाद के लिए जाने जाते हैं. जैसलमेर का कढ़ी-पकौड़ा अलहदा स्वाद के लिए मशहूर है. राजस्थानी कढ़ी की अपनी अलग खासियत है. इसमें बेसन की पकौडिय़ों को हल्की-सी खट्टी दही के साथ पकाया जाता है. जैसलमेर में सफेद मांस भी खूब खाया जाता है. यह नॉनवेज स्वादिष्ट करी है, जो भेड़ या बकरी के बिना हड्डी वाले मांस से पकाई जाती है. वहीं मुर्ग-ए-सब्ज को चिकन के बिना हड्डी वाले टुकड़ों को सब्जियों और स्थानीय मसालों के साथ पकाया जाता है. यहां की मखनिया लस्सी भी काफी लोकप्रिय है. देसी घी में बने घोटुआ लड्डू और पंचधारी लड्डू एक माह तक बिल्कुल ताजा बने रहते हैं. जैसलमेर के किले के पास की गलियों में स्थित धनराज रणमल भाटिया स्वीट्स दस से ज्यादा पीढिय़ों से इन लड्डूओं के लिए मशहूर है.
जयपुर की बात करें तो यहां लाल मांस पसंद किया जाता है. इसमें दही, गरम मसालों और लाल मिर्च का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. यह व्यंजन काफी गरम होता है. लाल मांस को गर्मियों में गेंहू की रोटी और सर्दियों में बाजरे की रोटी के साथ खाया जाता है. जंगल मांस यहां का एक और नॉनवेज पकवान है. इसे तैयार करने के लिए भेड़ या बकरे के गोश्त को घी और लाल मिर्च के साथ कई घंटों तक पकाया जाता है. यह एक तरह का स्नैक्स भी है.
दाल-बाटी चूरमा प्रदेश का बेहद मशहूर व्यंजन है. इसे पूरे राजस्थान में चाव से खाया जाता है. इसकी खासियत यह है कि यह लंबे समय तक खराब नहीं होता और इसमें पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं. इसे तैयार करने में पानी की बहुत कम जरूरत होती है, इसलिए रेगिस्तानी इलाके के लिए यह बहुत मुफीद व्यंजन है. बाटी को दाल के साथ खाया जाता है. बाफला भी बाटी का एक प्रकार है जो बाटी के मुकाबले मुलायम होता है. जयपुर में जौहरी बाजार में एलएमबी मिठाई की दुकान घेवर के लिए काफी मशहूर है.
राजस्थान का अहम शहर उदयपुर नुक्कड़ फूड के लिए अच्छी जगह है. यहां का आयड़ का समोसा मशहूर है. यहां बोहरा गणपति मिष्ठान्न के समोसे लाजवाब होते हैं. वहीं 15 वर्षों से श्री लाला मिष्ठान्न मसालेदार चटपटी कचैरियां बनाता आ रहा है. दिल्ली गेट की जलेबी तो चेतक सर्किल पर चेतक सिनेमा के पास की दुकान की उबले अंडे की भुर्जी को काफी पसंद किया जाता है.
जोधपुर में मिलने वाली मिठाइयां, नमकीन और दूसरे कई व्यंजन सैलानियों को आकर्षित करते हैं. यहां की गट्टे की सब्जी और केर सांगरी की सब्जी आम तौर पर दूसरे पकवानों का सहायक व्यंजन है. यहां अनोखे तरीके से गुलाब जामुन की सब्जी भी बनाई जाती है. यह स्वाद में भी कुछ अलग होती है. सेव टमाटर की सब्जी भी मशहूर है और मावे की कचैरी जोधपुर के अलावा कहीं और नहीं मिलेगी. तेल में तलकर कचैरी को तोड़ लिया जाता है और फिर उसे चाशनी में मिला दिया जाता है. हरी इलायची की खुशबू वाली यह कचैरी बेहद जायकेदार होती है. जोधपुर के गरम और मसालेदार मिर्ची बड़े को आम तौर पर ब्रेड के साथ खाया जाता है.
इनके अलावा माना जाता है कि मशहूर कलाकंद मिठाई की शुरुआत अलवर से ही हुई थी. यहां का मावा दुनिया में मशहूर है. प्रदेश का किशनगढ़ अपने नमकीन और मक्खन बड़े के लिए प्रसिद्ध है. और द्ब्रयावर की तिलपट्टी के तो क्या कहने! बीकानेर भी अपने व्यंजनों के कारण दुनिया के नक्शे पर आ चुका है. बीकानेरी भुजिया अपने बेहतरीन जायके के लिए बहुत पहले से मशहूर है. नमकीन के अलावा यह शहर पूरी, सब्जी और दाना मेथी सब्जी के अलावा चटनी के लिए भी प्रसिद्ध है.
(लेखिका लर्निंग वर्टिकल, वाइआइ सीआइआइ, जयपुर की अध्यक्ष हैं)