वैवाहिक बलात्कार को क्यों बलात्कार माना जाना चाहिए
दुनिया भर में केवल 32 देशों ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध नहीं मानना जारी रखा है. दुर्भाग्य की बात यह है कि भारत भी इन देशों की फेहरिस्त से अब तक बाहर नहीं निकल पाया है

वृंदा भंडारी
मई के दूसरे सप्ताह में दिल्ली हाइकोर्ट ने इस मुद्दे पर विभाजित फैसला सुनाया कि भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की धारा 375 में वैवाहिक बलात्कार का अपवाद होना संवैधानिक है या नहीं. धारा 375 का अपवाद 2 कहता है, ''पुरुष का अपनी पत्नी के साथ संभोग या यौन कृत्य, पत्नी के 15 वर्ष से कम आयु का नहीं होने पर, बलात्कार नहीं है.''
न्यायमूर्ति राजीव शकधर ने वैवाहिक बलात्कार अपवाद (एमआरई) को संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1), 19(1)(ए) और 21 का उल्लंघन मानकर रद्द कर दिया, जबकि न्यायमूर्ति हरिशंकर ने आइपीसी की धारा 375 के अपवाद 2 के तहत एमआरई को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया. विभाजित फैसले और इस मुद्दे के महत्व को देखते हुए जजों ने एकमत से सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की आज्ञा प्रदान की. पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में अपीलें दायर करना शुरू भी कर दिया है. उम्मीद है कि मामले को दिल्ली हाइकोर्ट की तीन जजों की पीठ को भेजने के बजाए इसका फैसला सीधे सुप्रीम कोर्ट में ही होगा. मगर तब तक एमआरई भारत की कानून की किताबों में कायम रहेगा.
विभाजित फैसले से दोनों जजों के दो बिल्कुल अलहदा नजरिये सामने आते हैं. जैसा कि न्यायमूर्ति शकधर कहते हैं, एमआरई का औपनिवेशिक इतिहास बताता है कि यह ''पितृसत्तात्मकता और स्त्री-द्वेष में डूबा'' है और इसने मनुष्य जाति की ओर से अर्जित स्वतंत्रताओं के हनन में योगदान दिया है. उनका फैसला विवाह संस्था के धुंधले पड़ते जाने की पृष्ठभूमि में महिला की स्वायत्तता, गरिमा और निजता को केंद्र में रखता है. इसीलिए वे कहते हैं कि समाज की तरफ से पति के आचरण के प्रति अपनी ''अस्वीकृति'' जाहिर करने के तरीके के तौर पर वैवाहिक बलात्कार को ''बलात्कार कहे जाने की जरूरत'' है.
न्यायमूर्ति हरिशंकर के लिए एमआरई संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत दी गई समानता की गारंटी का उल्लंघन नहीं करता, क्योंकि विवाह के भीतर पति की ओर से किए गए बलात्कार और विवाह के बाहर किए गए बलात्कार (फिर चाहे वह अंतरंग साथी की ओर से किया गया हो या अजनबी द्वारा) के बीच ''सुस्पष्ट अंतर'' है. न्यायमूर्ति हरिशंकर की राय न्यायमूर्ति शकधर की राय से इस लिहाज से बिल्कुल अलहदा है कि यह विवाह संस्था को और विवाह में यौन सुख की ''जायज अपेक्षा'' को महत्व देती है और इस तथ्य को भी कि पति और पत्नी के बीच यौन संबंध ''परम पावन'' है. बावजूद इसके कि वे मानते हैं कि विवाह असमानों के बीच हो सकते हैं, अच्छे या बुरे हो सकते हैं, या सुखद और दुखद हो सकते हैं.
उल्लेखनीय है कि इस सबमें सरकार ने, चाहे वह केंद्र की हो या दिल्ली की, इस मुद्दे पर एमआरई के समर्थन या विरोध में कोई पक्ष नहीं लिया. मुद्दे की अहमियत को देखते हुए केंद्र ने सलाह-मशविरे के लिए ज्यादा समय की मांग भर की.
यह अपवाद क्यों
एमआरई का इतिहास 17वीं सदी के जज सर मैथ्यू हेल की ओर से प्रतिपादित सिद्धांत तक खोजा जा सकता है. मैथ्यू हेल ने 1736 में ''हिस्ट्री ऑफ द प्लीज ऑफ द क्राउन'' नामक लेख प्रकाशित किया था. एमआरई के पक्ष में उन्होंने कहा था कि एक बार जब महिला ने विवाह की अनुमति दे दी, तो ''पत्नी ने स्वयं को पति के हाथों में छोड़ दिया, जिससे वह पीछे नहीं हट सकती.''
इसके अलावा वे महिलाओं को दोयम दर्जे की नागरिक के रूप में देखते थे, जिसे गर्भपात के लिए आपराधिक रूप से दंडित किया जाना चाहिए और जादू-टोने के एक मुकदमे में उन्होंने दो विधवाओं को अपने पड़ोसियों पर ''जादू-टोना करने'' के लिए मौत की सजा सुनाई थी. असल में, थॉमस डॉब्ज बनाम जैक्सन विमेन्स हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन मुकदमे में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की हाल ही में लीक मसौदा राय से पता चला कि न्यायमूर्ति एलीटो ने रो बनाम वेड की ओर से स्थापित गर्भपात अधिकारों के दशकों पुराने न्यायशास्त्र को उलटने के लिए सर मैथ्यू हेल की राय पर ही भरोसा किया.
एमआरई की स्त्रीद्वेषीय और पितृसत्तात्मक उत्पत्ति को देखते हुए, यह शायद हैरानी की बात नहीं है कि अधिकतर देशों में, चाहे वह ब्रिटेन हो या अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, इज्राएल हो या रूस, वैवाहिक बलात्कार को बलात्कार या यौन हमला माना जाता है और इसमें आपराधिक रूप से दंडित किया जाता है. दुनिया भर में केवल 32 देशों—बांग्लादेश, चीन, हैती, लाओस, माली, म्यांमार, नाइजीरिया, सेनेगल, अफगानिस्तान, ताजिकिस्तान, लेबनान, मलेशिया, सिंगापुर, मिस्र, लीबिया, ओमान, यमन और कुवैत—ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध नहीं मानना जारी रखा है. वहीं, दुर्भाग्य की बात है कि भारत भी इन देशों की फेहरिस्त से बाहर नहीं आ पाया.
एमआरई के लिए तर्क क्यों सही नहीं है
एमआरई के समर्थकों ने कुछ दलीलें दी हैं जिन्हें तत्काल छिन्न-भिन्न करने की जरूरत है. पहली यह कि आइपीसी की धारा 375 के अपवाद 2 को रद्द करके अदालत विधायिका की भूमिका में दखल दे रही है और कानून बना रही है. यह दलील अदालत की भूमिका और न्यायिक समीक्षा की शक्ति के बारे में गलत समझ पर टिकी है. कानून के मौजूदा अपवाद को रद्द करना अदालत की ओर से मौजूदा अपराध के बारे में अपनी सीमा से आगे बढ़-चढ़कर कानून बनाने के समान नहीं है. आइपीसी की धारा 375 का अपवाद 2 कानून की किताब में मौजूद है और इसलिए इस प्रावधान की संवैधानिकता की जांच-पड़ताल करना अदालत के दायरे में है.
दूसरे, वैवाहिक बलात्कार को आपराधिक बना दिया गया तो इसका गंभीर दुरुपयोग होगा. भारतीय कानून में स्थापित रुख यह है कि दुरुपयोग की आशंका मात्र किसी कानून को रद्द करने या उसे असंवैधानिक ठहराने का आधार नहीं हो सकती (बुधन चौधरी बनाम बिहार राज्य, 1955). दुरुपयोग की दलीलें तब भी दी गई थीं जब 2005 में घरेलू हिंसा कानून संसद में लाया गया था या जब उसने महिलाओं के विरुद्ध क्रूरता को आपराधिक करार दिया था. दुरुपयोग की चिंताओं को दूर करने के लिए मौजूदा कानूनों तथा कार्यवाही की उचित प्रक्रिया में सुधार लाने और पुलिस की शक्तियों के अनियंत्रित दुरुपयोग पर लगाम लगाने की जरूरत है—जैसा कि फर्ज कीजिए राजद्रोह और आतंक-विरोधी कानूनों के दुरुपयोग पर लगाम लगाने के लिए भी इसकी जरूरत है. मगर इसका जवाब खासकर स्त्री-पुरुष गैर-बराबरी वाले समाज की फितरत को देखते हुए महिलाओं को दी गई सुरक्षा को हटाने या वैवाहिक घर में सरकार को दखल देने से रोकने में नहीं है.
तीसरे, कहा गया कि एमआरई विवाह की पवित्रता को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है—कि पति को पत्नी का बलात्कारी मानने की संभावना को प्रस्तुत करना ''विवाह संस्था मात्र के ही पूरी तरह विरुद्ध'' है (न्यायमूर्ति हरिशंकर के अनुसार). आखिर में हमें सवाल उठाना ही चाहिए कि क्या हम विवाह के उस संस्करण की रक्षा करना चाहते हैं जो पति और पत्नी के बीच गैर-बराबरी को पुख्ता करता है, सहमति और स्वायत्तता को अनदेखा करता है और महिलाओं के साथ दासी की तरह बर्ताव करता है. यह कम से कम वह दुनिया तो नहीं जिसमें मैं अपनी बेटी को बड़ा होते देखना चाहूंगी.
(लेखिका सुप्रीम कोर्ट में स्वतंत्र लीगल प्रैक्टिशनर हैं)