लता मंगेशकरः उन्हें उस्ताद का दर्जा मिलना चाहिए

सलामत-नजाकत खां साब जब-जब इंडिया गए, लता जी बराबर सामने होतीं. खां साब लता जी की बड़ी इज्जत करते थे. उनकी नजर में वे एक बड़ी क्लासिकल सिंगर थीं.

सौजन्य: शाम चौरासी म्युजिक सर्कल
सौजन्य: शाम चौरासी म्युजिक सर्कल

मेहमान का पन्ना/उस्ताद शफकत अली (पाकिस्तान)

लता जी पाकिस्तान के गवैयों को बड़ी मोहब्बत से देखती थीं. इधर के जो भी गवैये सरहद पार गए, उनकी उन्होंने बड़ी कद्र की. मेहदी हसन हों, हुसैन बख्श या फिर सलामत-नजाकत खां साब. वह दौर राजकपूर का था. आरके स्टुडियो में महफिलें जमती थीं (फोटो उसी की). और एक ग्रुप था जिसमें पंडित रामनारायण, दिलीप साहब, देवानंद, मोहम्मद रफी, मुकेश और लता जी वगैरह होते थे.

सलामत-नजाकत खां साब जब-जब इंडिया गए, लता जी बराबर सामने होतीं. खां साब लता जी की बड़ी इज्जत करते थे. उनकी नजर में वे एक बड़ी क्लासिकल सिंगर थीं. वे कहते थे कि सिनेमा में गाना बेशक उन्होंने अपनी मर्जी से चुना, लेकिन राग भी वे उतनी ही आसानी से गातीं, इसमें कोई शक नहीं. खां साहब का कहना था, चार मिनट के गाने में वे सुर का लाजवाब काम करती हैं.

खां साब की राय में लता जी ने फिल्म के जिस भी रंग को गाया, ता-उम्र उन्होंने उसे ईमानदारी से निभाया. जिस किसी भी संगीतकार के लिए गाया, उठाकर देख लें, सीख है, सबक है वो गाना. मदन मोहन ने उनके लिए जो बनाया उसमें वे तभी दिखते हैं जब लता की आवाज उन्हें मिलती है. 

एक फिल्म बन रही थी अमर समाधि. उसमें एक सीन था जिसमें उस्ताद अपने शागिर्द को सिखा रहे हैं. लता जी के उस्ताद की आवाज सलामत अली की थी. उनकी महानता देखिए! उन्होंने कहलवा दिया कि वे खां साब के साथ बैठकर नहीं गाएंगी. सुनकर बाद में अपना हिस्सा गाएंगी.

और बकौल सलामत अली खां, जब गाया तो ऐसा लाजवाब, इतना साफ-सुथरा काम करते हुए उन्होंने ऐसा मेल बिठाया कि हैरानी होती है. बड़ी इंट्रेस्टिंग बात थी कि वे सुन कर ही अपना हिस्सा गा रही हैं. दोनों का गाया राग अडाना और मारवा बंदिश का वह टुकड़ा आज भी मौजूद है. सन् 65 के आसपास का वाकया होगा. हालांकि फिल्म क्यों नहीं बनी, मैं नहीं जानता.

लता जी ने बड़े गवैयों को सुना, इसीलिए उनकी आवाज में गायिकी दिखती है. इसीलिए मैं उनके गाने गाता हूं जबकि उनका 3 मिनट का गीत गाना भी उतना ही मुश्किल है. इसकी वजह है 3 मिनट में वे 3 घंटे का काम कर जाती हैं! अपने फन की इस इकलौती कलाकार को पंडित, उस्ताद का दर्जा मिलना चाहिए.

गाते हुए वे मेरे वालिद की तरह सुरों से खेलती थीं. इन्हीं कारणों से वे मेरी फेवरिट थीं और रहेंगी. दुनिया में जहां-जहां मौसिकी को माना जाता है वहां-वहां लता जी को मान्यता थी. सुरों की जगत मां, जगतगुरु थीं वे. शाम चौरासी घराना उन्हें सैल्यूट करता है. वे जितनी हिंदुस्तान की थीं उतनी ही पाकिस्तान की भी. आज पाकिस्तान भी उतना ही दुखी है.

(उस्ताद शफकत अली पाकिस्तान में शाम चौरासी घराने के शास्त्रीय गायक हैं. आलेख राजेश गनोदवाले से बातचीत के आधार पर)

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