लता मंगेशकरः खां साब! आपकी तारीफ सुनते-सुनते मेरे कान पक गए
मैं क्या-क्या बताऊं उनके बारे में. वे खुश रहने और हंसने-हंसाने वाली महिला थीं. उन्हें लतीफे बड़े पसंद थे. एक बार उनके घर पर हम ऐसे ही बैठे हुए थे.

उस्ताद हुसैन बख्श
मैं पहली बार अपनी जवानी के दिनों में मुंबई गया था. यंग था उस समय. भारत में रागदारी के लिए जो मोहब्बत है, मुझे मालूम थी. भारत की एक महीन आवाज वाली गजल गायिका हैं—मधुरानी, उन्होंने रेडियो से मेरा गाना सुन रखा था. उनका टेलीफोन आया कि वे मिलना चाहती हैं. मैं उनसे मिला. उन्होंने मेरी महफिल रखवाई. उनके ही कहने पर मैं कुछ समय रुक गया.
सिलसिला ऐसा बढ़ा कि अगले कुछ महीने मुझे भारत की मेहमाननवाजी का आनंद लेना पड़ा. भारत में मेरे गाने का दौर भी साथ-साथ चल रहा था. दिल्ली-मुंबई में प्राइवेट महफिलें हो रही थीं और मेरा नाम होने लगा था. बात धीरे- धीरे लता जी तक गई. एक दिन टेलीफोन की घंटी बजी. दूसरी तरफ से बड़ी सुरीली आवाज सुनाई दी: ''खां साब नमस्कार. मैं लता मंगेशकर बोल रही हूं.’’
मुझे तो उम्मीद ही नहीं थी. मैं एक सेकंड खामोश हो गया, फिर कहा, ''हुकुम करिए, कैसे याद किया?’’ खुदा की कसम. जो कह रहा हूं, उसका एक-एक कतरा खरा है. लोग यकीन करें या न करें. लेकिन यह बात सच है, लता जी का कहना था कि ''मेरे कान पक गए हैं आपकी तारीफ सुनते-सुनते. मुझे आप अपना गाना कब सुना रहे हैं?’’ मैं हैरान रह गया! मैंने कहा, ''मैं इस काबिल तो नहीं हूं.
लेकिन हां, आप कह रही हैं तो आपके सामने हाजिरी भर दूंगा. आप हुकुम करिये कब?’’ तो इस तरह से मेरा कार्यक्रम यश चोपड़ा के घर रखा गया. तमाम दिग्गज बैठे थे. नौशाद साहब, दिलीप साहब, लताजी सबसे आगे बैठी हुई थीं. मैं आपको क्या बताऊं, ये ऐसे लोग थे जिनके सामने ''आ’’ करना भी मुश्किल. मेरी उम्र उस समय 28 साल के करीब थीं. मैं स्टुडेंट की तरह सिमटा हुआ बैठा था.
यश चोपड़ा का मैसेज आया कि ''लता जी के पास सिर्फ आधे घंटे का समय है. जो कुछ गाना है, अपने हिसाब से तय कर लें.’’ मैंने कहा, आज तो इज्जत उसके हाथ में है. और सोच-समझकर उस्तादों वाला काम शुरू किया. सबसे पहले राग-रागेश्वरी गाया, जो लगभग ढाई घंटे चला. लता जी सुनती गईं. उसके बाद ठुमरी, फिर गजल का दौर चला. मैं काफी भी गाता हूं, ऐसा लता जी ने सुन रखा था.
अब उनकी तरफ से ''काफी’’ सुनाने की फरमाइश ही आ गई. देखिए, इज्जत ऊपरवाला रखता है, सिलसिला ऐसा जमा कि सुबह करीब सात बजे तक महफिल चली. यश चोपड़ा भी हैरत में! उन्होंने लता जी से पूछा कि वे तो जल्दी निकलने वाली थीं? तो लता जी ने जवाब दिया, ''क्या करूं, खां साब का गाना ही ऐसा चल रहा था.’’
कई बार ऊपर वाला हमारी लाज रख लेता है. उस दिन वैसा ही हुआ. उसके बाद जब तक मैं इंडिया में था, लता जी से लगातार मुलाकात और बात होती रही. मुंबई में ही एक बार मैं बीमार पड़ा. उन्हें कहीं से इस बात की जानकारी हो गई. आपको सुनकर ताज्जुब होगा कि उन्होंने तत्काल अपना पर्सनल डॉक्टर मेरे पास भेजा ताकि मेरा बेहतर इलाज हो सके. कुछ समय के बाद ईद थी. ईद में भी मैं इत्तेफाकन इंडिया में था.
उनको पता था. उन्होंने संदेसा भिजवाया. मैं घर गया. उन्होंने खाने का इंतजाम रखा था और बाकायदा मेरे लिए सिवइयां बनवाई थीं. मुझे अपने हाथों से सिवईं खिलाई. उन्हें हांडी गोश्त पसंद था. एक बार मैं उनके लिए कद्दू गोश्त पकाकर ले गया था. उन्होंने बड़े शौक से खाया.
मैं क्या-क्या बताऊं उनके बारे में. वे खुश रहने और हंसने-हंसाने वाली महिला थीं. उन्हें लतीफे बड़े पसंद थे. एक बार उनके घर पर हम ऐसे ही बैठे हुए थे. गाना-बजाना हो जाने के बाद लतीफों का दौर चला. एक लतीफा वे सुनातीं और एक मैं. हम यही कोई दो घंटे तक एक-दूसरे को हंसाते रहे.
लता जी जैसी आवाज ऊपर वाला सदियों में एकाध बनाता है. लता जी से पहले कोई हुआ और न लता जी के बाद कोई होगा. जमीन और आसमान दोनों उन्हें सलाम करते थे. जितनी नायाब फनकार उतनी पवित्र इनसान. सुर खुद उनसे कहता था, ''मुझे लगाओ!’’
(करीब 80 की उम्र के हुसैन बख्श पाकिस्तान के मशहूर शास्त्रीय गायक हैं. आलेख राजेश गनोदवाले से बातचीत के आधार पर).