लता मंगेशकर विशेषांकः मैं भी इनसान हूं, मेरी भी अपनी तमाम तकलीफें हैं

मैंने हमेशा यह पाया कि जैसे उनकी रूह को सुकून होने के बाद भी इस बात का हमेशा गम रहा कि उनके बाबा मास्टर दीनानाथ मंगेशकर उन्हें असमय छोड़कर चले गए.

यतींद्र मिश्र
यतींद्र मिश्र

यतींद्र मिश्र

मेरे लिए जीवन की यह सबसे बड़ी उपलब्धि रही कि लता जी के साथ एक लंबे अरसे तक करीब रोज ही बात होती थी. मुझे मालूम नहीं था कि साहित्य की दुनिया में आने का इतना बड़ा वरदान मेरे खाते में आएगा कि कभी लता जी मेरे लेखन का विषय बनेंगी. आज उनकी अनुपस्थिति में बहुत सारे ऐसे मंजर याद आते हैं, जिससे उनके विराट किरदार के बारे में सोचते हुए आश्चर्य होता है कि कभी वे सदेह हम सभी से मुखातिब थीं.

आवाज का नूर क्या होता है, यह लता मंगेशकर को सुनते हुए जाना जा सकता है. आवाज की तासीर, उसकी सच्चाई और लगाव कितना पवित्र हो सकता है, यह लता मंगेशकर को पिछले तीस सालों से सुनते हुए मैंने पाया है. मेरी किताब के लिए उन्हें रेकॉर्ड करने के दौरान उन वर्षों में लता जी की उस शख्सियत के बारे में भी पता चला, जिसे शायद बिना उनके संपर्क में आए समझा ही नहीं जा सकता था.

कुछ ऐसी अधूरी और बातचीत के अंतरालों में बसी हुई बातें हैं, जिन्हें साझा करने का मन होता है. मैंने हमेशा यह पाया कि जैसे उनकी रूह को सुकून होने के बाद भी इस बात का हमेशा गम रहा कि उनके बाबा मास्टर दीनानाथ मंगेशकर उन्हें असमय छोड़कर चले गए. अपने संगीत, करियर, अनुभवों और संस्मरणों को सहेजते हुए वे हमेशा उदास हो जाती थीं और पिता को इस तरह याद करती थीं, लगता था जैसे उनके पिता हम दोनों की बातचीत के दौरान वहीं मौजूद हैं.

एक बेचैनी, एक तड़प और ढेर सारा दर्द मैंने हमेशा महसूस किया, जब भी उनके गीतों की उत्कृष्ट अदायगी या सफलताओं पर बात की. वे कहती थीं—''देखिए, मुझे इस बात का मलाल है कि मैं अपने पिता की तरह नहीं बन पाई. उनकी तरह गा नहीं सकी. उनकी तरह धैर्य से बैठकर रागों की साधना करने से रह गई.’’ मैं हैरान होता था कि यह उस पार्श्वगायिका के अंत:करण का आईना है, जिसे साक्षात सरस्वती माना जाता है.

उनसे यह पूछने पर कि आप तो फिल्म संगीत के शिखर पर हैं, मुझे उन्होंने बार-बार यह कहकर टोका—''यह ठीक है कि आप मुझे बहुत चाहते हैं, मेरा सक्वमान करते हैं, लेकिन मुझसे पहले सहगल साहब, नूरजहां, अमीरबाई कर्नाटकी, जोहराबाई अंबालावाली, सुरैया, राजकुमारी और मुकेश भैया का नाम लीजिए.’’

उन्होंने हमेशा इन लोगों को इतने सम्मान से याद किया कि मुझे भी इस बात को सीखने का सलीका हासिल हुआ कि अपने सीनियर्स को लेकर आपका क्या रुख होना चाहिए. वे बहुत सारी खूबियों को समेटे हुए एक ऐसी वत्सल भाव से भरी हुई महिला भी थीं, जिनके हृदय प्रदेश के दरवाजे की सांकल-कुंडी खटखटाने कम लोग ही पहुंच पाते रहे. मालूम नहीं उन्होंने अपने आत्मीयता के परिसर में दूसरों का दाखिला क्यों प्रतिबंधित कर रखा था?

जहां तक मेरा प्रश्न है, मुझे कुछ ऐसे इशारे वहां से जरूर मिले, जिससे यह समझने में मदद मिली कि वे हमारे घर, पड़ोस में मौजूद उस बुजुर्ग महिला की तरह ही हैं, जो अपने नाती-पोतों से अटूट प्रेम करती है. वे फिल्मों के बारे में जवाब देते हुए घर की छोटी-छोटी बातों को तसल्ली से देखती थीं. आज घर में किसका जन्मदिन है, उनके मित्रों में कौन मिलने आया, दूसरे शहर से किस पारिवारिक मित्र ने कोई सौगात या मिठाई भेजी—सभी के ब्यौरे बड़ी आत्मीयता से बताती थीं.

मेरे लिए उन्हें रेकॉर्ड करने के वे दिन सबसे कठिन होते थे, जब भारत क्रिकेट का कोई मैच खेलता था. ''यतींद्र जी, अभी दो दिन रहने दीजिए. मैं क्रिकेट देखूंगी. चार दिन बाद बात करते हैं.’’ चार दिन बाद तब दिक्कत बढ़ जाती थी, जब भारत दुर्भाग्य से कोई मैच हार जाता था. मेरे लिए मुसीबत कि अब लता दीदी का मन हफ्तों खिन्न रहने वाला है और बातचीत का सिलसिला कुछ दिन थमा रहेगा. जब कई दिनों के बाद उनका मूड ठीक होता था और बात फिर से शुरू होती, तब भी उनका अवसाद और उनके पसंदीदा खिलाडिय़ों का आउट होना उन्हें दुखी किए रहता था.

लता जी की निश्छल हंसी, सबको आदर देने का भाव, संगीत को लेकर उनका जुनून, मित्रों और परिवार के लिए उनकी जिम्मेदारी और दुनिया में बढ़ते जा रहे वैमनस्य को लेकर उनकी चिंताएं मुझे बड़ी मानवीय लगती थीं. उनका यह कहना—''मैं भी इनसान हूं, मेरी भी तकलीफें हैं, मुझे भी पीड़ा होती है’’—सुनकर यह भी एहसास जगता था कि भले ही कोई इंसान सफलता के शिखर पर क्यों न हों, उसकी समस्याएं एक आम व्यक्ति की तरह उसे भी प्रभावित करती हैं.

मैं खुशकिस्मत था कि लता मंगेशकर जैसी नेकदिल इंसान के जीवन में मेरा प्रवेश संभव था. आज जब वे नहीं हैं, तो उनके किरदार की ढेरों शानदार बातें मन में कौंधती हैं और मन आदर से भर उठता है.

(यतींद्र मिश्र लता मंगेशकर पर चर्चित पुस्तक लता: सुर गाथा के लेखक हैं)


उन्हें रिकॉर्ड करने के वे दिन सबसे कठिन होते जब भारत क्रिकेट का कोई मैच खेलता था... चार दिन बाद दिक्कत और बढ़ जाती जब भारत मैच हार जाता.

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