कृषि शिक्षा व्यवस्था को बुनियाद से जोड़ने की जरूरत

हरित क्रांति उन्नत बीज, तकनीक और सिंचाई के लिए किए गए उपायों से सफल हुई थी. आज भी इन्हीं से नई क्रांति आ सकती है.

राजीव रंजन प्रसाद
राजीव रंजन प्रसाद

पूरी दुनिया में खेती की तकनीक में बदलाव हो रहे हैं. जुताई, बुआई, खाद तथा कीटनाशकों के प्रयोग, फसल कटाई, भंडारण के क्षेत्र में अब ऐसी तकनीक आ गई है, जिससे किसान का श्रम और समय दोनों बचे हैं और पैदावार भी बढ़ी है.

भारत में भी खेती बदल रही है लेकिन छोटे पैमाने पर यह कुछ ही क्षेत्रों, कुछेक व्यक्तियों तक ही सीमित है. देश का बहुतायत किसान आज भी प्रेमचंद का ''होरी " बना हुआ है. कृषि प्रधान देश होने के बाद भी हमारी सरकारों की प्राथमिकताएं सब्सिडी और लोन जैसे अल्पकालिक विकल्पों की ओर रही हैं, जबकि हमें अपनी परिस्थिति के अनुरूप कृषि तकनीक विकसित करने की आवश्यकता है.

हमारे किसानों के पास जमीन सीमित है और उन्हें बहुत बड़ी जनसंख्या के लिए अनाज उगाना पड़ता है. अमेरिका जैसे देश कृषि तकनीक में आगे इसीलिए हैं कि वहां किसानों के पास हजारों एकड़ जमीन होती है. भारतीय परिस्थिति की तुलना तो कोरिया, जापान और ताइवान जैसे देशों से ही हो सकती है.

लेकिन ये देश उन्नत तकनीक के कारण छोटी जोत से भी भरपूर पैदावार ले पाते हैं. ये देश निरंतर फसल की नवीनतम किस्में विकसित करते रहते हैं जबकि हम अभी दूसरी हरित क्रांति की प्रतीक्षा में हैं.

हरित क्रांति के फलस्वरूप, अनाज की कमी से जूझते देश में उपज 1967-68 में 1.65 करोड़ टन हो गई. 1971-72 तक बुआई 1.91 करोड़ हेक्टेयर तक होने लगी और पैदावार 2.64 करोड़ टन तक पहुंच गई. इस भारी उपलब्धि के बाद भी हरित क्रांति की कुछ आलोचनाएं होती रही हैं.

मुख्य रूप से गेहूं, ज्वार, बाजरा जैसी कुछ विशेष फसलों तक ही हरित क्रांति सीमित रही. भारतीय प्रायद्वीप के मुख्य भोजन चावल में भी इसका कोई विशेष लाभ नहीं देखा गया. हरित क्रांति को राष्ट्रव्यापी सफलता भी नहीं मिली और यह सिर्फ पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु राज्यों तक ही सीमित रही. हरित क्रांति की इसके लिए भी कटु आलोचना होती है कि इससे पूंजीवादी कृषि को बढ़ावा दिया जा रहा है.

तर्क यह है कि बिना समुचित पूंजी के कोई भी किसान अधिक उपज पैदा करने वाले बीज अपने खेतों में नहीं लगा सकता. खाद, सिंचाई, कृषि यंत्रों पर भी बहुत व्यय करना पड़ता है जो छोटे या मझोले किसान की कुव्वत में नहीं है.

इसमें भी संदेह नहीं कि हरित क्रांति में प्रयुक्त कृषि यंत्रों के कारण ग्रामीण जनसंख्या अब रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रही है. यह विचारणीय तथ्य है कि क्या हरित क्रांति के वर्तमान स्वरूप से लाभ उन्हीं किसानों को हो रहा है, जिनके पास निजी पंपिंग सेट, ट्रैक्टर, नलकूप वगैरह हैं? 

हालांकि हरित क्रांति के नाते ही भारत आज सवा सौ करोड़ से अधिक जनसंख्या का भरण-पोषण करने में सक्षम है. आज भी हम अपनी उस सफलता से बहुत आगे नहीं आ सके हैं. जैव तकनीकी तथा आणविक स्तर पर बहुत से शोध कार्य जारी हैं लेकिन अब तक के सभी प्रयास ऊंट के मुंह में जीरा जैसे रहे हैं. किसानों की आत्महत्या हमारी ही सदी की कड़वी सचाई है.

बरसात तथा भूजल पर निर्भर खेती और छोटे-छोटे तालाबों का निर्माण केवल सीमित परिणाम दे सकता है. हमें सिंचित क्षेत्र बढ़ाना होगा. छोटे और मझोले आकार के बांधों का निर्माण करने, नहर-नेटवर्क बनाने और कमांड क्षेत्रों का विकास करने की जरूरत है.

हमारी कृषि-शिक्षा व्यवस्था मंऔ सबसे बड़ी कमी है कि वह अपनी बुनियाद से नहीं जुड़ती. एग्रीकल्चर कॉलेजों से पढ़कर निकले ज्यादातर विद्यार्थी खेती से जुड़े नहीं पाते. कृषि शिक्षा संस्थानों के गंभीर मूल्यांकन की जरूरत है.

हमें समझना होगा कि हरित क्रांति उन्नत बीज, तकनीक और सिंचाई के लिए किए गए प्रयासों से सफल हुई थी. आज भी यही कारक नई क्रांति का आधार बन सकते हैं.

लेखक कृषि विशेषज्ञ हैं और प्रगतिशील कृषि के स्वर्णाक्षर के लेखक हैं

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