इकबालिया बयान के बाद
अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि इकबालिया बयानों से दूसरे गवाह गड़बड़ा सकते हैं. इससे अपराध विज्ञानियों के सामने अपराध की पुष्टि पूर्वाग्रह से प्रभावित हो सकती है.

रायन इंटरनेशनल स्कूल के सात वर्षीय छात्र प्रद्युम्न ठाकुर की हत्या की खबर आने के कुछ घंटे भीतर ही गुरुग्राम पुलिस का बयान आया कि उसने मामला सुलझा लिया है और स्कूल के बस कंडक्टर अशोक कुमार को पकड़ लिया है जो हत्यारा है. पुलिस का दावा था कि कुमार ने ''कुबूल" कर लिया है कि उसने ही प्रद्युम्न की हत्या की. उन्होंने यह दावा भी किया कि उसकी निशानदेही पर वे हत्या के हथियार तक पहुंच गए हैं यानी कानूनी भाषा में कहें तो कुमार के ''बयान" के आधार पर कत्ल में इस्तेमाल किए गए हथियार की ''बरामदगी" की गई.
इस किस्म के ज्यादातर मामलों में यही होता है कि हत्यारे के पकड़े जाने के बाद मामले में मीडिया की दिलचस्पी खत्म हो जाती है. अशोक कुमार की गिरफ्तारी के बाद भी यही होना चाहिए था. ऐसी सूरत में उसकी जमानत खारिज कर दी जानी चाहिए थी, क्योंकि ऐसे गंभीर मामलों में जमानत तब तक नहीं दी जाती जब तक कि दोषी इस बात को स्थापित करने में सक्षम न हो कि अपराध और उसके बीच कोई रिश्ता नहीं था—यह ठीक उलटी बात थी, क्योंकि कुमार के ''इकबालिया बयान" के चलते यह नामुमकिन हो चुका था.
इसके बाद यह होता कि उसका परिवार शुरुआती एक साल में उसे जमानत दिलवाने के लिए किसी महंगे वकील पर अपने सारे संसाधन फूंक देता. फिर अपनी गिरफ्तारी के शायद दो, तीन या चार साल बाद जब उसे अदालत में वादी को चुनौती देने का पहला मौका मिलता, तब तक उसके सारे संसाधन निजी वकील के ऊपर खत्म हो गए होते और उसके पास सस्ते सरकारी वकील के अलावा और कोई रास्ता नहीं रह जाता. फिर उसे इस वकील की मदद से इस धारणा को चुनौती देनी होती कि हत्यारा वही है, चूंकि उसी ने पुलिस को हत्या के हथियार तक पहुंचाया था. ऐसा इसलिए क्योंकि अदालतें आम तौर से ऐसे ही साक्ष्यों के आधार पर दोष तय करती हैं.
भारतीय कानून में पुलिस के सामने दिया गया कुबूलनामा साक्ष्य नहीं माना जाता, फिर भी यह सब कुछ इसी तरह होता.
कुमार की खुशकिस्मती रही कि ऐसा कुछ नहीं हुआ. प्रद्युम्न के माता-पिता पुलिस की ओर से पेश तर्क को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए. उनके पास सुप्रीम कोर्ट तक जाने के संसाधन भी मौजूद थे. उतनी ही अहम यह बात भी रही कि उस स्कूल के दूसरे अभिभावकों ने प्रद्युम्न के माता-पिता का साथ दिया. स्कूल के बाहर प्रदर्शन हुए. पड़ोस के एक शराब के ठेके को फूंक दिया गया. दबाव बढ़ता देख राज्य सरकार ने मामला सीबीआइ को सौंप दिया. सीबीआइ ने कुमार को क्लीन चिट दे दी और स्कूल में ही पढऩे वाले एक किशोर छात्र को कत्ल का दोषी ठहराया.
कुबूलनामा खतरनाक चीज है क्योंकि उससे यह सहज धारणा पुष्ट होती है कि कोई आखिर किसी जुर्म को कुबूल क्यों करेगा अगर उसने न किया हो. इस धारणा के पीछे दरअसल पुलिस की जांच प्रक्रिया और दूसरे पहलुओं से संबंधित अज्ञानता की भूमिका होती है. लोगों को पता नहीं होता कि पुलिस किस तरह से कुबूल करवाती है.
दुनिया भर में आज झूठे कुबूलनामे के प्रतिकूल प्रभावों पर अध्ययन हो रहे हैं. अमेरिका में इनोसेंस प्रोजेक्ट कहता है कि हर चार ''गलत दंड" में से एक झूठे कुबूलनामे का परिणाम होता है. अध्ययन दिखाते हैं कि कुबूलनामा आ जाने के बाद पुलिस अकसर केस को बंद कर देती है और उन साक्ष्यों की उपेक्षा कर देती है जो कुबूलनामे के उलट जा रहे हों. अमेरिका के सेंटर ऑन रांगफुल कनविक्शंस ने 2010 में ऐसे तमाम मामलों का परदाफाश किया जहां जुर्म कुबूल करने वाले पर मुकदमा चला और उसे दंड दे दिया गया, जबकि डीएनए परीक्षण में वह निपराध साबित हो जाता. अध्ययन दिखाते हैं कि कैसे इकबालिया बयान दूसरे साक्ष्यों को विकृत कर देते हैं, फॉरेंसिक के जानकारों में पूर्वाग्रह भर देते हैं और वैसे ही गवाह प्रस्तुत कर दिए जाते हैं जो मुजरिम के बयान की पुष्टि करते हों. विद्वानों ने इस प्रस्थापना को ''भ्रष्ट करने वाले कुबूलनामे"
का नाम दिया है.
यह बात सब जानते हैं कि ज्यादातर मामलों में इकबालिया बयान प्रताडऩा, दबाव और धोखे से लिए जाते हैं. ऐसे झूठे इकबालिया बयानों को पैदा करने वाली जांच की तकनीकों और अन्य परिस्थितिजन्य कारकों पर आजकल काफी अध्ययन हो रहे हैं. अपराधशास्त्र के लिहाज से प्रद्युम्न मर्डर केस के संदर्भ में सबसे अहम सबक हालांकि ''किशोरावस्था" और ''मानसिक बीमारी" की भूमिका से निकलता है, क्योंकि सीबीआइ अब दावा कर रही है कि एक ऐसे किशोर ने जुर्म ''कुबूल्य किया है जिसे मानसिक बीमारी की शिकायत रही है. ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, उक्त किशोर ने अपने कुबूलनामे को यह कहते हुए गलत ठहरा दिया है कि उसे प्रताड़ित किया गया और उसका कुबूलनामा वह नहीं था जो उसने कहा था. इसीलिए यह बात अहम हो जाती है कि इस ताजा ''मुख्य संदिग्ध" के साथ ऐसा बरताव किया जाए जो न्यायपूर्ण हो.
जवाहर राजा दिल्ली के एक अधिवक्ता हैं

