दो-तिहाई बहुमत की जद्दोजहद
संविधान संशोधन विधेयक पर लगे झटके के बाद भाजपा ने दोनों सदनों में एनडीए का संख्याबल बढ़ाने का बीड़ा उठाया, उसके लिए भले कुछ भी करना पड़े

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के टूटने-बिखरने से उठा गर्दोगुबार अभी बैठना शुरू भी नहीं हुआ था कि न्यूज चैनल महाराष्ट्र में भी ऐसी ही अफरातफरी की खबरें दिखाने लगे. शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सांसद दिल्ली आ पहुंचे. पार्टी तोड़ने और महाविकास अघाड़ी की सरकार को धूल-धूसरित करने वाली उस बगावत के चार साल बाद, बाल ठाकरे की विरासत के लिए चल रही लड़ाई अब शायद दूसरे दौर में दाखिल हो रही है.
इस बार संसद में. एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना के एमएलसी कृपाल तुमाने ने दावा किया कि लोकसभा में शिवसेना (यूबीटी) के नौ में से सात सांसद मॉनसून सत्र से पहले पाला बदलेंगे. इसके कुछ ही दिन बाद 17 जून को उनके एक 'धड़े' के लोकसभा स्पीकर से मिलने की खबरें आईं. इस धड़े ने शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के समर्थन का दावा किया, जो दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए जरूरी दो-तिहाई हैं.
यह कदम ठोस शक्ल ले या न ले, एक बात साफ है: मॉनसून सत्र के लिए जो संसद बैठेगी, वह अप्रैल में विशेष सत्र के बाद स्थगित संसद से काफी अलग होगी, खासकर भाजपा की अगुआई में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के संख्याबल के मामले में.
समझने के लिए कि यह क्यों मायने रखता है, याद कीजिए कि पिछली बार संसद के स्थगित होने के समय भाजपा कहां खड़ी थी. उसके कर्ताधर्ताओं के मायूस होने की वजह थी. महिलाओं को तत्काल प्रभाव से 33 फीसद आरक्षण देने और उसे लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने से जोड़ने वाला 131वां संविधान (संशोधन) विधेयक 17 अप्रैल को सदन में 230 के मुकाबले 298 वोटों से गिर गया क्योंकि उसे मिले वोट संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई (528 मौजूद सांसदों में से 352 वोट) से कम थे.
प्रधानमंत्री के पद पर नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में यह पहली हुआ जब कोई संशोधन रोक दिया गया. इस हार ने एक अहम बात जाहिर कर दी कि भाजपा के पास अपने दम पर बहुमत नहीं है और 272 का आंकड़ा पार करने के लिए वह सहयोगी दलों के भरोसे है. यह भी कि एनडीए के पास 293 का समर्थन है और विपक्षी इंडिया गुट के पास 232 का. उस दिन विपक्ष को पता चला कि अगर वह चाहे तो अपनी जमीन पर मजबूती से टिका रह सकता है. सत्तारूढ़ पक्ष ने इससे यह सबक लिया कि जो गणित चुनाव में नहीं बदला जा सकता, उसे चुनावों के बीच बदला जा सकता है. बाद के इन महीनों में वह ठीक उसी कवायद में व्यस्त रहा है.
बदलाव सबसे छोटी संख्या से शुरू हुआ. हाल ही मई-जून में हुए राज्यसभा चुनाव में 26 सीटें भरी गईं. इनमें 24 हर दूसरे साल खाली होने वाली सीटें और दो उपचुनाव थे. भाजपा की अगुआई वाले एनडीए ने इनमें से 21 सीटें हासिल कर लीं. चार सीटें आंध्र प्रदेश से आईं, जिनमें तीन वाइएसआर कांग्रेस (वाइएसआरसीपी) से चंद्रबाबू नायडू की तेलुगुदेशम पार्टी (टीडीपी) की अगुआई वाले गठबंधन को मिल गईं. यह उस गिरावट का ताजातरीन चरण था जिसमें जगन रेड्डी की पार्टी 2019 में विधानसभा की 151 सीटों से गिरकर 2024 में 11 पर और लोकसभा में 22 से गिरकर चार पर आ गई थी.
मध्य प्रदेश में ज्यादा ही तल्ख तमाशा हुआ. निर्वाचन अधिकारी ने कांग्रेस की प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया. लिहाजा दो-एक का संभावित बंटवारा भाजपा के तीनों उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने में बदल गया. राज्यसभा में कुल 245 सीटें हैं, और बहुमत का आंकड़ा 123 है. एनडीए के पास करीब 148 सीटें हैं, जो दो-तिहाई बहुमत से 16 ही कम हैं, जिसमें भाजपा 114 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है.
ऊपरी सदन में यह जो बूंद भर थी, निचले सदन में बाढ़ बन गई. इसकी शुरुआत चुनावों से हुई. मई में भाजपा ने विधानसभा की 294 में से 207 सीटें जीतकर और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को 80 सीटों पर समेटकर पश्चिम बंगाल पर कब्जा कर लिया. हाल के वक्त में अपना गृह राज्य हारने वाली क्षेत्रीय पार्टियां उस चीज से भी हाथ धो बैठी लगती हैं जो उनके सांसदों-विधायकों की महत्वाकांक्षाओं को काबू में रखता है—इनाम की उम्मीद—और इसके झटके जल्द ही संसद में लगते हैं.
तृणमूल के 19 लोकसभा सांसद 14 जून को स्पीकर ओम बिरला से मिले (बीसवीं रचना बनर्जी ने विदेश से अपनी सहमति भेजी) और उन्हें बताया कि वे नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआइ) में विलय कर रहे हैं तथा वे एनडीए का समर्थन करेंगे. एनसीपीआइ त्रिपुरा की गुमनाम पार्टी है, जिसकी लोकसभा में पहले कोई मौजूदगी न थी.
लोकसभा में तृणमूल के कुल 28 सांसदों में से 20 दलबदल विरोधी कानून के तहत विलय के लिए जरूरी दो-तिहाई संख्या पूरी करते हैं. अगर बिरला एनसीपीआइ को मान्यता दे देते हैं, तो यह रातोंरात लोकसभा में टीडीपी के 16 सांसदों को पीछे छोड़कर एनडीए का सबसे बड़ा घटक दल बन जाएगी.
हजारों जख्म
ऊपरी सदन भी लहूलुहान था. पश्चिम बंगाल से तृणमूल के तीन सदस्यों ने एक ही हक्रते में इस्तीफे दे दिए—सुखेंदु शेखर रे, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक. हरेक के खासे साल बाकी थे. अब चूंकि भाजपा को विधानसभा में जबरदस्त बहुमत हासिल है, इसलिए जब भी उपचुनाव होंगे, वह तीनों खाली सीट जीत सकती है, और इस तरह तीन इस्तीफों को अपने तकरीबन तय तीन सीटों के फायदे में बदल सकती है.
यही तरकीब आम आदमी पार्टी (आप) पर पहले ही आजमाई जा चुकी है. अप्रैल में उसके 10 में से सात राज्यसभा सदस्य राघव चड्ढा की अगुआई में इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए. उन्होंने भी उसी विलय की धारा की दुहाई दी और कहा कि दो-तिहाई एक साथ निकले हैं. आप के संजय सिंह ने राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन के सामने इन दलबदलुओं को अयोग्य ठहराने की याचिका दाखिल की है. उनकी दलील है कि इस धारा के तहत मूल पार्टी का विलय जरूरी है, न कि एक सदन में उसके सदस्यों का. मगर फैसले की कोई समय सीमा तो है नहीं.
विपक्ष की 'ढीली पड़ती' पकड़ दक्षिण भी पहुंच गई, वहां उसका रुख एक से ज्यादा दिशाओं में है. तमिलनाडु में ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कलगम (अन्नाद्रमुक) ने भाजपा से दूरी बना ली, जिसे उसके कई कार्यकर्ता पार्टी की पहचान धूमिल करने और चुनाव में सफाए के लिए दोषी ठहराते हैं. लोकसभा में 22 और राज्यसभा में 10 सदस्यों के साथ द्रविड़ मुनेत्र कलगम (द्रमुक) निचले सदन में विपक्ष का तीसरा सबसे बड़ा दल है लेकिन उसकी अपनी अलग चिंताएं हैं.
पार्टी अभी उस सदमे से उबरी नहीं है जिसमें लंबे समय से सहयोगी दल रही कांग्रेस उसे छोड़कर अभिनेता विजय की तमिलगा वेत्रि कलगम (टीवीके) सरकार में शामिल हो गई. डीएमके कह रही है कि वह इंडिया गुट में नहीं है. नतीजा यह है कि केंद्र के प्रति उसके हावभाव नरम पड़े हैं. यह छह महीने पहले तक नामुमकिन लगता था. गठबंधन के युग को एक तार में पिरोने वाली पुरानी हकीकतें तार-तार हो रही हैं, और विपक्ष का भरोसा भीतर से भी उतना ही उधड़ रहा है जितना बाहर से.
इस सबका कुल क्या मतलब है? सामान्य कानून बनाने के लिए भाजपा ने पहले ही निर्णायक बढ़त हासिल कर ली है. तृणमूल के अलावा शिवसेना के छह संभावित दलबदलुओं को मिला लें, तो लोकसभा में उसका गठबंधन 319 पर पहुंच गया है. उच्च सदन में करीब 148 के बहुमत के साथ उस दशक का अब अंत हो सकता है जिसमें विपक्ष का संख्याबल सरकार को ठप कर सकता था.
लक्ष्य: सुपर बहुमत
संवैधानिक संशोधन की दीवार अलबत्ता कहीं ज्यादा ऊंची है. अनुच्छेद 368 हरेक सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत की ही मांग नहीं करता बल्कि मौजूद और वोट दे रहे सदस्यों के दो-तिहाई के समर्थन की मांग करता है. यह पूर्ण लोकसभा में 363 और राज्यसभा में 164 होता है. इसलिए बदलावों को दो तरह से समझा जा सकता है. पहला है तैयारी. सत्तारूढ़ गठबंधन ईंट-दर-ईंट उस सुपर बहुमत की सीढ़ी तैयार कर रहा है जो परिसीमन, एक साथ चुनाव और दूसरे लंबे समय से प्रस्तावित संशोधनों के लिए जरूरी होगा. इस तरह वह उस फासले को कम कर रहा है जिसे चुनाव में नहीं पाट पाया था. दूसरा है विपक्ष में सेंध.
उस सुपर बहुमत की देहरी तक पहुंचने के लिए तृणमूल, आप और शायद शिवसेना (यूबीटी) के सांसदों को तोड़ना एक किस्म की मनोवैज्ञानिक लड़ाई का काम करता है. विरोधी दल भीतर से खोखले हो जाते हैं, कार्यकर्ताओं की ताकत निचुड़ जाती है, और विपक्ष उस एकजुटता से हाथ धो बैठता है जो उसने अप्रैल में कुछ वक्त के लिए हासिल की थी.
आधा काम हो चुका है. शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) टूट चुकी हैं. वाइएसआरसीपी चुनावों में खेत रही. बीआरएस सिकुड़ रही है. तृणमूल ने बंगाल गंवाया और सांसद भी छोड़कर जा रहे हैं. आप दिल्ली हारी और उसके राज्यसभा सदस्यों के दो-तिहाई भी गए. तमिलनाडु के गठबंधनों में आना-जाना लगा हुआ है. फिर भी, बंगाल को छोड़ दें, तो भाजपा की अपनी मौजूदगी में बहुत ज्यादा इजाफा नहीं हुआ.
उसने बस इतना किया कि अपने आसपास टूटी-बिखरी ताकतों को समेटा. यह भी उसने विलय की उस धारा के जरिए किया जिसका वह फायदा उठाने की स्थिति में है, और उन याचिकाओं के जरिए किया जिन पर उसके अपने नामजद लोग ही फैसला देने की स्थिति में हैं.
2024 के जनादेश ने ऐसी गठबंधन सरकार बनाई थी जिसकी सीमाएं थीं. अप्रैल में सदन में यह साबित भी हो गया. बाद के महीने उन सीमाओं को सीट-दर-सीट और दलबदल-दर-दलबदल दूसरे साधनों से धीरे-धीरे कम और कमजोर करने में लगाए गए. मॉनसून सत्र शुरू होते-होते संसद में संख्याबल बदल चुका होगा और साथ ही पार्टियों के भीतर समीकरण भी बदल चुके होंगे. यह सब मतदाताओं से एक बार फिर अपनी पसंद बताने के लिए कहे बिना किया गया होगा.