नाजुक स्थिति में संतुलन

देश में पैसा आने के मुकाबले बाहर जाने की रफ्तार कहीं ज्यादा तेज है. ऐसे में नीति-निर्माता विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए जी-जान से जुटे हैं

इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास/एआइ

पश्चिम एशिया के आसमान में मिसाइलें और ड्रोन फिर मंडराने लगे हैं. ऐसे में ईरान के खिलाफ अमेरिका-इज्राएल के युद्ध से पैदा हुई अनिश्चितता के कारण दुनिया भर के बाजार सहम उठे हैं और वे सबसे बुरे हालात के लिए तैयार हो रहे हैं. इस तनाव ने भारत के लिए भी बाहर से जुड़ी कमजोरियों और छोटे भुगतान संतुलन (बीओपी) के संकट का अंदेशा फिर से पैदा कर दिया है. इससे उदारीकरण से पहले के दौर वाली यादें ताजा हो गई हैं.

आसान शब्दों में भुगतान संतुलन का मतलब है किसी देश में आने वाले और वहां से बाहर जाने वाले पैसे का लेखा-जोखा. इस संतुलन का एक हिस्सा चालू खाता या करंट अकाउंट है—इसमें सामान और सेवाओं का व्यापार, विदेशों में कार्यरत भारतीयों से आने वाली रकम (रेमिटेंस) और विदेशों में किए गए निवेश से होने वाली आय शामिल है. इसका दूसरा हिस्सा पूंजीगत खाता या कैपिटल अकाउंट होता है.

इसमें दोनों तरह के विदेशी निवेश शामिल होते हैं: किसी कारोबार में आया प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) और वित्तीय योजनाओं में आने वाला पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआइ). इसके अलावा दूसरे देशों से लिया गया कर्ज और प्रवासी भारतीयों की जमा राशियां भी इसमें शामिल की जाती हैं. सालों तक चालू खाते के घाटे की भरपाई कैपिटल अकाउंट के सरप्लस (अतिरिक्त राशि) से होती रही थी. अब ऐसा नहीं है.

वित्त वर्ष 26 में भारत का चालू खाते का घाटा (सीएडी) बढ़कर 30.2 अरब डॉलर (2.86 लाख करोड़ रु.) हो गया, जो एक साल पहले 23 अरब डॉलर (2.18 लाख करोड़ रु.) था. ज्यादा चिंता की बात कैपिटल अकाउंट के सरप्लस में भारी कमी आना थी, जो घटकर महज 7.2 करोड़ डॉलर (685 करोड़ रु.) रह गया. दो साल पहले यह 89.4 अरब डॉलर (8.5 लाख करोड़ रु.) था. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के अनुसार, इसका नतीजा यह हुआ कि वित्त वर्ष 26 में भुगतान संतुलन का घाटा 30.8 अरब डॉलर (2.92 लाख करोड़ रु.) हो गया, जबकि वित्त वर्ष 24 में 63.7 अरब डॉलर (6.05 लाख करोड़ रु.) का सरप्लस था.

यह मुद्दा सबकी नजरों में उस वक्त आया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 मई को एक भाषण में नागरिकों से अपील की कि वे ईंधन, सोना और विदेश यात्रा पर खर्च कम करें ताकि बाहर जाने वाली रकम में कमी आए. उन्होंने कोविड-19 के दौर का जिक्र करते हुए स्टैगफ्लेशन (ज्यादा महंगाई और धीमी ग्रोथ) के कगार पर खड़ी अर्थव्यवस्था के बारे में चेतावनी दी. इस चेतावनी की वजह थी, पश्चिम एशिया का संकट.

पर इसका मतलब यह नहीं कि हालात 1991 जितने खराब हैं. उस समय भुगतान संतुलन का संकट आया तो आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई. फिलहाल इस वर्ष मई तक भारत के पास लगभग 697 अरब डॉलर (66.2 लाख करोड़ रु.) का विदेशी मुद्रा भंडार था, जो करीब 10 महीने के आयात के लिए पर्याप्त है. लेकिन यह संदेश सावधान करने के लिए है.

महंगे तेल और गैस, बाहर से आने वाले भारतीयों के पैसों में कमी, विदेशी पूंजी की वापसी में तेजी और चालू खाते के बढ़ते घाटे ने रुपए पर दबाव डाला है. जो रुपया एक साल पहले डॉलर के मुकाबले लगभग 84 पर था, आज वह 95 को चूम रहा है. इन दबावों को लेकर चिंता की लकीरें इतनी गहरी थीं कि नीति निर्माताओं ने 5 जून को कई उपायों की घोषणा की. इन सबका मकसद नई विदेशी पूंजी को लुभाना था.

जाते पैसे की चपत
ऊपरी तौर पर देखें तो वित्त वर्ष 26 विदेशी निवेश के लिए मजबूत साल होना चाहिए था. सकल एफडीआइ की जो आवक वित्त वर्ष 25 में 80.6 अरब डॉलर (7.65 लाख करोड़ रु.) थी, वह वित्त वर्ष 26 में बढ़कर रिकॉर्ड 94.53 अरब डॉलर (8.98 लाख करोड़ रु.) हो गई. लेकिन गौर से देखने पर अलग ही बात सामने आती है. शुद्ध एफडीआइ यानी विदेशी कंपनियों के पैसे वापस ले जाने और भारतीय कंपनियों के विदेशों में निवेश करने के बाद बची हुई राशि घटकर सिर्फ 7.65 अरब डॉलर (72,675 करोड़ रु.) रह गई.

साल भर पहले यह एक अरब डॉलर से भी कम यानी 95.9 करोड़ डॉलर (9,100 करोड़ रु.) रह गई थी. सिस्टमैटिक्स ग्रुप के इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के सीईओ और को-हेड धनंजय सिन्हा का कहना है कि दोनों आंकड़े महामारी से पहले के सालों में देखे गए 30-40 अरब डॉलर (2.8-3.8 लाख करोड़ रु.) के आंकड़े से बहुत कम हैं. आरबीआइ यह नहीं बताता कि किन कंपनियों ने पैसे वापस भेजे. लेकिन इस रुझान ने ये चिंताएं बढ़ा दीं कि लंबे समय के लिए विदेशी पूंजी आकर्षित करने और उसे अपने यहां रोके रखने में भारत कितना सक्षम है.

बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस बताते हैं, ''हमें तीन हिस्सों के बीच फर्क करने की जरूरत है: पहला सकल एफडीआइ, दूसरा पैसे वापस भेजना और तीसरा बाहर जाने वाला एफडीआइ.'' पैसे वापस भेजने का मतलब है मुनाफे, डिविडेंड और एसेट बेचने या विनिवेश से मिली रकम का अपने देश में वापस जाना. सबनवीस कहते हैं, ''पिछले कुछ सालों में यह संख्या तेजी से बढ़ी है, जिसका मतलब है कि कंपनियां कहीं और निवेश करने के लिए यहां से पैसे निकाल रही हैं या अपने निवेशकों को भुगतान कर रही हैं.

वे भारत में फिर से कम रकम ही निवेश कर रही हैं.'' इस तरह के पैसे की निकासी का आंकड़ा वित्त वर्ष 24 में 44.47 अरब डॉलर (4.22 लाख करोड़ रु.) से बढ़कर वित्त वर्ष 26 में 53.58 अरब डॉलर (5.09 लाख करोड़ रु.) हो गया. वे कहते हैं, ''तीसरा हिस्सा बताता है कि भारतीय कंपनियां क्या कर रही हैं. वे विदेश में विलय और अधिग्रहण या विदेशी सब्सिडियरी (सहायक कंपनियों) में ज्यादा निवेश कर रही हैं.'' वित्त वर्ष 2026 में यह विदेशी निवेश बढ़कर 33.29 अरब डॉलर (3.16 लाख करोड़ रुपए) हो गया, जो दो साल पहले के 16.68 अरब डॉलर (1.58 लाख करोड़ रुपए) के निवेश से लगभग दोगुना है.

वित्त वर्ष 2008 में शुद्ध एफडीआइ जीडीपी के 3.5 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर था. अब यह शून्य के आसपास डोल रहा है. सिन्हा के मुताबिक, ''यह रुझान बताता है कि विदेशी पूंजी भारत के घरेलू निवेश चक्र में कोई खास योगदान नहीं दे रही.'' यह प्राइवेट पूंजीगत खर्च (कैपेक्स) की तरह है. कोविड के बाद के सालों में जबरदस्त कॉर्पोरेट मुनाफे के बावजूद पूंजीगत खर्च वित्त वर्ष 2014 से सुस्त बना हुआ है.

सिन्हा के अनुसार, इसके कारण वैश्विक भी हैं और घरेलू भी. 2012 के बाद से बढ़ते संरक्षणवाद ने उभरते बाजारों में एफडीआइ का प्रवाह कम किया है और अमेरिका-चीन व्यापार टकराव ने इसे और भी कम किया. वे कहते हैं, ''विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने कर प्रोत्साहन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर पाबंदियां लगाकर घरेलू निवेश को प्राथमिकता दी. विदेशी पूंजी स्वाभाविक रूप से उन देशों की ओर जाती है जहां प्राइवेट सेक्टर में जोरदार हलचल दिखती है.''

ट्रस्ट म्युचुअल फंड के चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर मिहिर वोरा के अनुसार, फंडों और कॉर्पोरेट निवेश के जरिए सालों तक जो बढ़िया एफडीआइ आया, उसमें मुनाफा वसूली के साथ विदेशी निवेशकों के निकलने की संभावना हमेशा ही थी. वे कहते हैं, ''फंडों की अवधि 7-15 साल होती है. 2021 के बाद शेयर बाजार में आई तेजी ने उन्हें मुनाफा बुक करने और अपना इंटरनल रेट ऑफ रिटर्न कमाने का मौका दिया.'' बढ़ते वैल्युएशन ने भी कई विदेशी कंपनियों को भारतीय शेयर बाजार में उतरने का मौका दिया और इस सूचीबद्धता के बाद ''जुटाए गए पैसे का बड़ा हिस्सा उन्होंने अपने देश भेज दिया''.

लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि मुनाफा वापस ले जाने और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निवेश निकालने के बीच फर्क है. जहां मुनाफा वसूली चालू खाते में शामिल की जाती है, वहीं विनिवेश पूंजी खाते में दर्ज होता है. व्यापार विशेषज्ञ विश्वजीत धर पूछते हैं, ''अपने देश मुनाफा वापस भेजना स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन निवेश निकाला क्यों जा रहा है? शुद्ध एफडीआइ कम होना चिंता की बात है क्योंकि एफडीआइ स्थिर और लंबे समय के लिए निवेश होता है. उसके साथ मैनेजमेंट की विशेषज्ञता और रणनीतिक प्रतिबद्धता आती है.

भारत इन फंड को लंबे समय के लिए क्यों नहीं बनाए रख पा रहा?'' इसका थोड़ा जवाब तो भारत की अपनी ही चुनौतियों में है. कागज पर तो आर्थिक विकास मजबूत दिखता है लेकिन यह मैन्युफैक्चरिंग और रोजगार देने वाले दूसरे सेक्टरों में बड़े पैमाने पर मौकों में नहीं बदल पाया है. वित्त वर्ष 14 और वित्त वर्ष 19 के बीच निफ्टी कंपनियों की आय में औसत वृद्धि महज 3.5 प्रतिशत रही, जबकि हाल के रुझानों से संकेत मिलता है कि लाभ में कमी आ रही है. 2012 के बाद से रुपए का भी तेजी से अवमूल्यन हुआ है और यह उभरते बाजारों के करेंसी इंडेक्स की तुलना में लगभग दोगुनी रफ्तार से गिरा है. इस कारण भी विदेशी निवेशकों के लिए डॉलर में रिटर्न कम हो गया है.

इस बीच, चालू खाते के मामले में थोड़ी राहत मिली है. भारत ने वित्त वर्ष 26 की चौथी तिमाही में 7.1 अरब डॉलर (67,500 करोड़ रु.) का सरप्लस दर्ज किया, जबकि इससे पिछली तिमाही में 15.5 अरब डॉलर (1.47 लाख करोड़ रु.) का घाटा हुआ था. किसी वित्तीय वर्ष की आखिरी तिमाही में इस तरह का सरप्लस सामान्य बात है. इस बार सेवाओं के व्यापार में मजबूत सरप्लस ने इसमें योगदान दिया. लेकिन यह राहत थोड़े ही समय की हो सकती है.

क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी कहते हैं, ''हमें उम्मीद है कि मौजूदा वित्त वर्ष में सीएडी बढ़कर जीडीपी का 2.2 प्रतिशत हो जाएगा, जो पिछले वित्त वर्ष में 0.6 प्रतिशत था.'' उनका कहना है कि कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और फर्टिलाइजर की बढ़ती कीमतों से भारत के आयात बिल में इजाफा होने की उम्मीद है. खाड़ी देशों से आने वाले भारतीयों की रकम पर भी दबाव है जो देश के कुल रेमिटेंस का लगभग 38 प्रतिशत है.

विदेशी धन जुटाने के जतन
ऐसे हालात में बाहरी खातों पर बढ़ते दबाव से निबटने के लिए भारत ने 5 जून को पहला बड़ा कदम उठाया. रिजर्व बैंक ने विदेशी पूंजी लुभाने के लिए कई उपायों का ऐलान किया. इनके तहत सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की बाहरी वाणिज्य उधारी (ईसीबी) की लागत घटाने के लिए 30 सितंबर तक अस्थायी सुविधा दी गई. साथ ही, प्रवासी भारतीयों को उनकी विदेशी कमाई को भारतीय बैंकों में स्थिर विदेशी मुद्राओं में नई फिक्स्ड-टर्म जमा के रूप में रखने के लिए प्रोत्साहन दिए गए.

केंद्र सरकार ने भी आरबीआइ के प्रयासों को मजबूती दी और सरकारी प्रतिभूतियों में कहीं ज्यादा एफपीआइ आकर्षित करने के उपाय किए. इनमें निवेश के आसान नियम, सरकारी बॉन्डों तक बेहतर पहुंच और ब्याज आय तथा कैपिटल गेन पर टैक्स छूट शामिल है. आरबीआइ गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा, ''इन उपायों (ईसीबी आदि) और बॉन्ड और व्यापार समझौतों पर सरकार की पहल के कारण हमें उम्मीद है कि भुगतान संतुलन की स्थिति बहुत अच्छी रहेगी.''

विशेषज्ञों का कहना है कि इन कदमों से विदेशी मुद्रा की आवक बेहतर होगी, बॉन्ड बाजार मजबूत होंगे, लिक्विडिटी को सहारा मिलेगा और रुपए को कुछ राहत मिलेगी. भारतीय स्टेट बैंक के ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर सौम्य कांति घोष कहते हैं, ''कई सुधारों की घोषणा से नीति के प्रगतिशील रुख और साहसी दिशा का पता चलता है. यह अर्थव्यवस्था और बाजारों के लिए अच्छा है और इससे ग्रोथ की रफ्तार बनी रहेगी.''

फिर भी ये उपाय समस्या के एक हिस्से का ही हल हैं. इनसे और ज्यादा विदेशी निवेश आ सकता है और भारतीय कंपनियों को विदेश से धन जुटाने में मदद मिल सकती है, लेकिन शुद्ध एफडीआइ में गिरावट रोकने के लिए और ज्यादा सुधारों की जरूरत होगी. 

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