प्रधान संपादक की कलम से

नियमों की जकड़बंदी से मुक्ति, अगर अब तक दिखी ऊर्जा के साथ आगे बढ़ी, तो प्रधानमंत्री मोदी के ऐतिहासिक तीसरे कार्यकाल की सबसे टिकाऊ उपलब्धि साबित हो सकती है. जिस पल भारतीय राज्य अपने लोगों पर भरोसा करना सीख जाएगा

इंडिया टुडे हिंदी अंक (24 जून 2026)
इंडिया टुडे हिंदी अंक (24 जून 2026)

- अरुण पुरी

करीब सैंतालीस साल पहले इंडिया टुडे अंग्रेजी ने 'रूल ऑफ द बाबूज' शीर्षक से कवर स्टोरी छापी थी. उसमें यह बात उठाई गई थी कि भारत को अपनी पूरी आर्थिक क्षमता हासिल करने से रोकने वाली सबसे बड़ी बाधा पूंजी और प्रतिभा की कमी या बाजार का आकार नहीं है बल्कि असली बाधा है नागरिकों पर भरोसा करने में राज्य की नाकामी. मैंने तब लिखा था: ''शायद अब समय आ गया है कि सरकार को ज्यादा जवाबदेह बनाने के लिए आम जनता सवाल पूछना और मूल्यांकन करना शुरू करे, ताकि अपने जीवन पर सरकारी नियंत्रण के अंधाधुंध विस्तार से खुद को बचा सके.''

ठीक 12 साल बाद, 1991 में वह क्षण आया जब नरसिंह राव सरकार ने लाइसेंस राज को खत्म किया. कारोबार को आजादी देने की दिशा में यह पहला कदम था लेकिन यह सर्जरी की तरह नहीं बल्कि होम्योपैथी दवा जैसा था. यह ऐसा था जैसे किसी को जेल से बाहर तो निकाल दिया जाए लेकिन बेड़ियां लगी रहें. विभिन्न उपायों के जरिए नियंत्रण की वही प्रवृत्ति सामने आती रही.

परमिट, नियम, उपनियम, कंप्लायंस फाइलिंग, कानूनों में दबी आपराधिक धाराएं, जिन्हें कोई तब तक नहीं पढ़ता जब तक इंस्पेक्टर दरवाजे पर न आ जाए. रेगुलेशन के इस मकड़जाल से सिर्फ बड़ी कंपनियां ही नहीं डरतीं, बल्कि 7.47 करोड़  से ज्यादा सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उपक्रम (एमएसएमई) भी डरते हैं, जो भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 35 फीसद का योगदान देते हैं और गैर-कृषि कार्यबल के 62 फीसद लोगों को रोजगार देते हैं.

एक साधारण एमएसएमई को सालाना 1,400 से ज्यादा कंप्लायंस का सामना करना पड़ सकता है. अप्रैल 2025 में हमारी कवर स्टोरी 'लालफीताशाही के खात्मे की दरकार' ने इस मोर्चे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शुरुआती सुधार कदमों पर रिपोर्ट की थी. इस हफ्ते हम देख रहे हैं कि वे इस सुधार को किस तरह तेज कर रहे हैं. इसके लिए उन्होंने शीर्ष नौकरशाहों की एक टीम लगाई है, ताकि ''21वीं सदी के मुताबिक आधुनिक, लचीला, लोगों के अनुकूल और भरोसे पर आधारित रेगुलेटरी ढांचा'' बनाया जा सके.

भारतीय राज्य की बुनियादी सोच यही रही है कि उसका नागरिक नियम तोड़ने वाला है और सरकार का काम उस चूक पर नजर रखना और उल्लंघन करने वाले को सजा देना है. नतीजा: ढेर सारे ऐसे नियम जिन्होंने उद्यमिता की भावना का गला घोंट दिया. जाहिरा तौर पर, कमजोर विदेशी निवेश और भारतीय पूंजी के बाहर जाने के दौर में सोच में बड़ा बदलाव जरूरी था.

इस बदलाव की कमान गैर वित्तीय नियामक सुधारों की उच्च स्तरीय समिति (एचएलसी-एनएफआरआर) के हाथ में है, जिसकी अगुआई पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गाबा कर रहे हैं. अगस्त 2025 में बनी समिति पूरे सरकारी तंत्र को साथ लेकर चलने की सोच पर काम कर रही है और इसमें उद्योग जगत के प्रमुख चेहरे भी शामिल हैं.

इसके 11 वर्किंग ग्रुप्स को एक साल का समय दिया गया, साथ में हर महीने समीक्षा का सिस्टम रखा गया. इसलिए विचार सिर्फ कागज पर नहीं हैं, लागू भी हो रहे हैं: 20-30 फीसद गहरी सफाई हो चुकी है, 30 फीसद पर काम चल रहा है, और 40 फीसद अभी बाकी है. कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन की अगुआई वाली टास्क फोर्स यह सुनिश्चित करती है कि यह सोच सिर्फ नई दिल्ली तक सीमित न रह जाए, जो ऐतिहासिक रूप से नेक इरादों की कब्रगाह रही है, बल्कि राज्यों तक पहुंचे, जहां कारोबारियों को कंप्लायंस की भारी दिक्कतें झेलनी पड़ती है.

एचएलसी की सोच छोटे-मोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने की उस प्रक्रिया से सीधे जुड़ गई, जो जन विश्वास बिल, 2023 से शुरू हुई थी. इसके पीछे हुए कामों से काफी बड़ा बिल निकला है, जो अप्रैल 2026 में पास हुआ और 23 मंत्रालयों के तहत आने वाले 79 केंद्रीय कानूनों में बदलाव करता है. जेल की सजा वाले 717 प्रावधान साफ हटा दिए गए.

पहली बार गलती करने वालों के लिए चेतावनी का प्रावधान भी जोड़ा गया. लोग अक्सर यह समझ नहीं पाते कि सिस्टम कितना बेतुका और जरूरत से ज्यादा कड़ा था: दुकान का लाइसेंस ठीक से न दिखाना, फाइलिंग छूट जाना, गलत एंट्री हो जाना, ये सब किसी उद्यमी को जेल पहुंचा सकते थे. ऐसे अपराध हमारे अदालती मामलों के 15 फीसद हैं. फिर भी अधिकारी उनसे चिपके रहे, जबकि डेटा दिखा रहा था कि उनका कोई उपयोगी मकसद नहीं बचा.

अब जरा क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (क्यूसीओ) व्यवस्था को देखिए. मूल रूप से इसे घटिया विदेशी सामान की डंपिंग रोकने के लिए एक जायज सुरक्षा कवच के रूप में बनाया गया था. लेकिन समय के साथ क्यूसीओ एक अलग तरह की विकृति में बदल गए. इनका दायरा 2016 में 70 से कम उत्पादों से बढ़कर 2025 तक करीब 790 उत्पादों तक पहुंच गया.

इसकी धाराएं सप्लाइ चेन के शुरुआती इनपुट पर भी असर डालने लगीं. निर्यात पर निर्भर छोटी टेक्सटाइल इकाइयों को घरेलू कच्चा माल 10-30 फीसद ज्यादा कीमत पर खरीदने को मजबूर होना पड़ा, जबकि वियतनाम और बांग्लादेश में उनके प्रतिस्पर्धी वैश्विक सप्लायरों से आराम से माल खरीद सकते थे.

हैरानी नहीं कि बड़े खिलाड़ी क्यूसीओ के पक्ष में थे. एक समीक्षा में पाया गया कि भारत के परिधान निर्यात में गिरावट की एक वजह क्यूसीओ से पैदा हुई लागत थी. कुल मिलाकर करीब 208 क्यूसीओ सप्लाइ चेन और विकास में बाधा डालते पाए गए. इनमें से 116 को वापस ले लिया गया है, टाल दिया गया है या निलंबित कर दिया गया है. बाकी की समीक्षा चल रही है.

यह देखकर अच्छा लगता है कि एचएलसी पिछली कोशिशों, जिन्हें मैंने होम्योपैथी कहा था, से अलग अब सर्जरी जैसी किसी चीज की कोशिश कर रही है. यह समयसीमा से बंधी है, सिर्फ सिफारिश करने के बजाए लागू की जा रही है. जमीनी बारीकियों में उतरना और छोटी-छोटी गड़बड़ियां ठीक करना शायद वीरतापूर्ण गवर्नेंस जैसा न लगे. लेकिन नियमों की जकड़बंदी से मुक्ति, अगर अब तक दिखी ऊर्जा के साथ आगे बढ़ी, तो प्रधानमंत्री मोदी के ऐतिहासिक तीसरे कार्यकाल की सबसे टिकाऊ उपलब्धि साबित हो सकती है. जिस पल भारतीय राज्य अपने लोगों पर भरोसा करना सीख जाएगा, अर्थव्यवस्था ऐसे जवाब देगी जैसा कोई एक नीतिगत ऐलान कभी नहीं दे सकता.

ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा की इस हफ्ते की कवर स्टोरी आपको इस सुधार प्रक्रिया के भीतर ले जाती है, ठीक उस समय जब यह आकार ले रही है. यह गवर्नेंस में बदलाव की कहानी है, जो सीमा संघर्ष जितनी नाटकीय नहीं और बजट जितनी दिखने वाली नहीं. लेकिन अगर रफ्तार बनी रही, तो इसके असर इन दोनों से ज्यादा लंबे समय तक टिकेंगे और भारतीय अर्थव्यवस्था को सपनों जैसी राह पर डाल सकते हैं.

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